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*‘कजिन मैरिज’ को बढ़ावा देने में जुटी ब्रिटेन सरकार,इसको लेकर जमकर बवाल* 

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‘कजिन मैरिज’ को लेकर दुनिया में कई शोध हुए हैं और इसके आधार पर होने वाले नुकसान की चर्चा हो रही है। वहीं, ब्रिटेन की सरकार ने इसको फायदेमंद बताया है। ब्रिटेन की नेशनल हेल्थ सर्विस ने ‘कजिन मैरिज’ के फायदों को प्रमोट किया और उनके जेनेटिक खतरे की तुलना देर से बच्चा पैदा करने या गर्भावस्था के दौरान धूम्रपान और शराब पीने से की। इसी के बाद अब इसकी आलोचना की जा रही है।

आलोचकों ने मुस्लिमों में प्रचलित इस रिवाज को महिलाओं के साथ दुर्व्यवहार से भी जोड़ा है। ऐसे दंपति के बच्चों को आनुवांशिक बीमारियों की संभावना पर भी चर्चा अब तेज हो गई है।

2021 की जनगणना के अनुसार, यूनाइटेड किंगडम यूरोप का सबसे बड़ा मुस्लिम आबादी खासकर पाकिस्तानी मुस्लिमों का सबसे बड़ा केन्द्र बन गया है। इनकी जनसंख्या 16 लाख से ज्यादा है। पिछले कुछ वर्षों में यह आँकड़ा तेजी से बढ़ रहा है। हालाँकि, यह पश्चिमी देश सिर्फ लोगों को ही नहीं, बल्कि उनके रीति-रिवाजों को भी संरक्षण दे रहा है। यहाँ क्राइम रेट काफी बढ़ गए हैं। ग्रूमिंग गैंग के केस लगातार सामने आते रहते हैं।

फिर भी, अधिकारी और मीडिया नस्लवाद के आरोपों से बचने के लिए ‘उदारवाद’ के नाम पर मुस्लिम अपराधों को छिपाने की कोशिशों में लगे रहते हैं। अब मुस्लिम समुदाय में प्रचलित कुप्रथा ‘कजिन मैरिज’ के होने वाले दुष्परिणाम को महत्वहीन बताने की कोशिश की गई है।

राष्ट्रीय स्वास्थ्य सेवा (जीनोमिक्स शिक्षा कार्यक्रम) ने मुसलमानों, खासकर पाकिस्तानी मूल के लोगों में प्रचलित ‘कजिन मैरिज’ को सही ठहराने के लिए अजीब दावा किया है। उन्होने ऐसी मैरिज से होने वाले संभावित लाभ को गिनाया है। वित्तीय लाभ (संसाधन, संपत्ति और विरासत को घरों के बीच विभाजित करने के बजाय एक साथ रखा जा सकता है) और खानदानी नेटवर्क के फायदे बताए हैं।

दिलचस्प बात यह है कि विश्लेषण में यह माना गया है कि ऐसे रिश्तों से आनुवंशिक बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है। इसमें ब्रिटिश ब्रॉडकास्टिंग कॉर्पोरेशन (बीबीसी) की एक रिपोर्ट का भी हवाला दिया गया है, जिसमें कहा गया है कि ब्रैडफोर्ड में यूनाइटेड किंगडम के अन्य हिस्सों की तुलना में आनुवंशिक रोगों वाले बच्चे ज्यादा पैदा हुए हैं। इस क्षेत्र में ब्रिटिश पाकिस्तानियों की एक बड़ी आबादी है, जिनमें ‘कजिन मैरिज’ आम है। लेख में बताया गया है कि कैसे इस आनुवंशिक रोग के कारण ‘एक के बाद एक बच्चे’ मर गए।

फिर भी, इसे ‘मुस्लिमों को दोष देने’ और ‘समस्या के सरलीकरण’ के रूप में लिया गया। ब्रिटेन में ‘कजिन मैरिज’ पर प्रतिबंध के खिलाफ तर्क दिया गया। ब्रिटिश सोसाइटी फॉर जेनेटिक मेडिसिन (बीएसजीएम) ने कहा कि इस प्रथा को गैरकानूनी घोषित करने के लिए स्वास्थ्य को आधार बनाना अनुचित है।

रिपोर्ट के ख़िलाफ तीखी प्रतिक्रिया और माफ़ी की माँग
रिपोर्ट पर यूनाइटेड किंगडम में तीखी प्रतिक्रिया हुई है। डेली मेल की रिपोर्ट के अनुसार, ऑक्सफ़ोर्ड स्थित फ़ारोस फ़ाउंडेशन के सामाजिक विज्ञान अनुसंधान विभाग के निदेशक और धार्मिक क़ानून के विशेषज्ञ डॉ. पैट्रिक नैश ने इस दिशानिर्देश की निंदा करते हुए इसे ‘वास्तव में निराशाजनक’ बताया है।

उन्होंने कहा, “कजिन मैरिज पूरी तरह गलत है, और इसे तत्काल प्रतिबंधित किया जाना चाहिए । राष्ट्रीय स्वास्थ्य सेवा के रिपोर्ट को बेहद भ्रामक बताते हुए तुरंत माफी माँगने को कहा है। इसमें कहा गया है कि जनता को किसी भी तरह से गुमराह नहीं किया जाना चाहिए।”

टोरी सांसद रिचर्ड होल्डन ने डेली मेल से बात करते हुए कहा, ” राष्ट्रीय स्वास्थ्य सेवा (एनएचएस) को हानिकारक और दमनकारी सांस्कृतिक प्रथाओं के आगे घुटने टेकना बंद कर देना चाहिए। कंज़र्वेटिव भी ‘कजिन मैरिज’ प्रथा को समाप्त होते देखना चाहते हैं, लेकिन लेबर इन वाजिब माँगों के प्रति उदासीन है।”

उन्होंने आगे कहा कि ब्रिटेन का हर समुदाय इस प्रथा को खत्म करने के पक्ष में है। वे ऐसे विधेयक का समर्थन कर रहे हैं जो चचेरे भाई-बहनों के आपस में निकाह करने पर प्रतिबंध लगाएगा।

महत्वपूर्ण बात यह है कि इन विवाहों से पैदा हुए बच्चों में सिकल सेल रोग या सिस्टिक फाइब्रोसिस जैसी बीमारियों से पीड़ित होने की संभावना कहीं अधिक होती है, जिससे एनएचएस को अरबों पाउंड का नुकसान होता है। आँकड़ों के अनुसार, शेफ़ील्ड, ग्लासगो और बर्मिंघम जैसे इलाकों में आनुवांशिक बीमारियों से ग्रस्त बच्चों का इलाज बड़ी संख्या में किया जा रहा है। यहाँ इलाज करा रहे बीमारों में हर पाँच में से एक बच्चा पाकिस्तानी मूल का है।

पोर्टों से पता चलता है कि ‘कजिन मैरिज’ के पैदा हुए ब्रिटिश-पाकिस्तानी बच्चे बड़ी संख्या में स्वास्थ्य संबंधी दिक्कतों से जूढ रहे हैं। ऐसे विवाहों से पैदा होने वाले बच्चों में कई तरह की स्वास्थ्य संबंधी दिक्कतें आ जाती हैं। बीबीसी के अपने लेख में इसका खुलासा किया है।

बॉर्न इन ब्रैडफोर्ड रिपोर्ट के अनुसार, शोधकर्ताओं ने 2007 से 2010-11 के बीच वेस्ट यॉर्कशायर शहर में करीब 13,500 नवजातों की जाँच की। इसके बाद बचपन से लेकर किशोरावस्था और अब बड़े होने तक इनके स्वास्थ्य पर नजर रखी गई। इनमें पाकिस्तानी मूल के 37% विवाहित जोड़े चचेरे भाई-बहन थे।

लिवरपूल विश्वविद्यालय के एक अध्ययन के अनुसार, बच्चों का सेरिबेलम छोटा था और उनके कंकाल मनुष्यों की तुलना में वानरों से ज्यादा मिलते-जुलते थे। पारिवारिक विवाह और प्रजनन को इस सिंड्रोम से जोड़ा गया था, जिससे पता चला कि यह एक ऑटोसोमल रिसेसिव बीमारी है।

ब्रिटिश कार्यकर्ता ने सोशल मीडिया पर ब्रिटिश-पाकिस्तानी जोड़ों को लेकर रिपोर्ट साझा किया। ब्रिटिश कार्यकर्ता टॉमी रॉबिन्सन ने जुलाई में एक वीडियो शेयर करते हुए कहा कि ब्रिटेन में 33% जन्मजात विकृतियाँ ब्रिटिश-पाकिस्तानियों के कारण होती हैं, जो आबादी का लगभग 3% हिस्सा हैं और ब्रैडफोर्ड में 76% पाकिस्तानी अपने कजिन से निकाह करते हैं। उन्होंने इस विकृतियों को पारंपरिक इस्लामी रीति-रिवाजों से जोड़ा और तर्क दिया कि इससे ब्रिटेन की स्वास्थ्य सेवा प्रणाली पर भारी बोझ पड़ता है।

यह अध्ययन इस मामले में सबसे बड़ी जाँच थी। जिन बच्चों पर अध्ययन किया गया, उनमें से छह में से एक के माता-पिता कजिन थे। साथ ही ये पाकिस्तानी समुदाय से जुड़े थे।

मशहूर वैज्ञानिक ग्रेगर मेंडल ने आनुवंशिकी का मानक सिद्धांत की खोज की। इसके अनुसार, यदि माता-पिता दोनों में अप्रभावी जीन मौजूद हो, तो बच्चे में अप्रभावी जीन दिखने की संभावना चार में से एक होती है। इसके अतिरिक्त, यदि माता-पिता दोनों रिश्तेदार हों, तो दोनों के ‘जीन वाहक’ होने की संभावना अधिक होती है। सामान्य जनसंख्या के 3% की तुलना में, कजिन कपल के बच्चों के आनुवांशिक रोगी होने की संभावना 6% होती है।

शोधकर्ताओं ने बच्चों के बोलने और भाषा सीखने की क्षमता को भी बताया। उन्होंने पाया कि ब्रैडफोर्ड में ‘कजिन मैरिज’ करने वाले कपल के बच्चे में वाणी और भाषा संबंधी दिक्कतें 11% बच्चों में थी, जबकि जिन बच्चों के माता-पिता रिश्तेदार नहीं हैं, उनके लिए यह 7% थी।

ऐसा ही बच्चों के विकास को लेकर बताया गया है कि जिनके माता-पिता भाई-बहन हैं, उन बच्चों में 54 फीसदी कम विकसित होते हैं। जबकि सामान्य माता-पिता के 36% बच्चों का कम विकास हो सकता है।

कजिन कपल के बच्चों को तीन गुणा ज्यादा अस्पताल के चक्कर लगाने पड़ते हैं। उनकी निगरानी ज्यादा करनी पड़ती है। आँकड़ों के अनुसार, खून के विकार से होने वाली बीमारियों की समस्या इनमें ज्यादा होती है।

जन्मजात असामान्यताएँ और दूसरी समस्या
जन्मजात बीमारियों की वजह से ‘कजिन मैरिज’ वाले पैरेंट्स के बच्चों में मृत्यु दर ज्यादा होती है। जाँच में सामने आया है कि गैर-रक्त-संबंधी जोड़ों (सभी जातीय समूहों के) के लिए यह दर 2.5% थी, जबकि ‘कजिन मैरिज’ वाले बच्चों में यह दर 6.5% थी।

‘कजिन मैरिज’ से होने वाले संतानों में उनर टैन सिंड्रोम (यूटीएस) आम तौर पर देखा जाता है। इससे प्रभावित व्यक्ति चौपायों पर चलने लगते हैं और अक्सर उनमें सीखने की क्षमता में कमी आ जाती है। यह कथित तौर पर ‘उल्टा विकासित’ होने लगते हैं।

इसका पता तब चला, जब तुर्की के उल्लास परिवार के कुछ सदस्यों को चारों पैरों पर चलते हुए देखा गया। 2006 में आई बीबीसी की एक डॉक्यूमेंट्री ने पहली बार इसका वर्णन किया था। चार बहनें और एक भाई इस अजीबोगरीब बीमारी के साथ पैदा हुए थे, जबकि परिवार के एक छठे सदस्य, जिसमें यह विशेषता नहीं थी, उसकी मृत्यु हो गई।

ब्रिटिश पाकिस्तानियों ने किया ‘कजिन मैरिज’ का समर्थन
इस बीच ब्रिटिश पाकिस्तानियों ने ‘कजिन मैरिज’ का पुरजोर समर्थन किया। बीबीसी से बातचीत में एक जोड़े ने कहा, “यह ईश्वर की इच्छा है, कोई कुछ नहीं कह सकता। अगर आप परिवार से बाहर भी शादी करते हैं, तब भी ऐसा हो सकता है।” उन्होंने सभी सबूतों को नजरअंदाज करते कहा, “बहुत से लोगों ने परिवार से बाहर शादी की है और फिर भी उनका एक बच्चा विकलांग हो गया।”

एक अन्य मुस्लिम व्यक्ति ने बताया कि पाकिस्तान या भारत में (विशाल मुस्लिम आबादी को देखते हुए) ‘कजिन मैरिज’ असामान्य नहीं हैं।

2021 के एक अध्ययन के अनुसार, लगभग 55% ब्रिटिश पाकिस्तानियों में निकाह चचेरे भाई-बहनों से होती है, जो देश में होने वाली सभी शादियों का लगभग 3% है। बर्मिंघम में इस तरह का निकाह आम है, जहाँ ब्रिटिश पाकिस्तानियों की एक बड़ी आबादी रहती है।

चचेरे भाई-बहनों के निकाह वाले देश
इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि चचेरे भाई-बहनों के निकाह को इस्लामी समाज में मान्यता है। इस वर्ष के आँकड़ों से पता चला है कि पाकिस्तान 61.2% ऐसे ही निकाह हुए हैं, उसके बाद कुवैत, कतर, संयुक्त अरब अमीरात और सूडान का स्थान आता है। मुस्लिम समुदाय में प्रचलित यह कुप्रथा, हानिकारक प्रभावों के बावजूद आज भी जारी है।

2022 के डीडब्ल्यू अध्ययन के अनुसार, इस प्रथा के कारण युवाओं में आनुवंशिक समस्याओं की संख्या असामान्य रूप से बढ़ गई है। हालाँकि, देश भर के कई इलाकों में चचेरे भाई-बहनों के बीच निकाह अभी भी आम है, भले ही लोग इसके दुष्परिणामों से वाकिफ हों।

‘जन्मजात दोषों के प्रमुख कारक’ शीर्षक से 2013 में प्रकाशित एक अध्ययन के अनुसार, बच्चों में जन्मजात विकलांगताओं के 77% मामलों में एक ही गोत्र में विवाह अहम कारण था। इसे लीड्स विश्वविद्यालय ने ब्रैडफोर्ड विश्वविद्यालय के सहयोग से प्रकाशित किया था।

ज़फ़र इक़बाल के अध्ययन, ‘सगोत्र परिवारों में बौद्धिक अक्षमता के लिए ज़िम्मेदार जीन की पहचान’, में बताया गया है कि पाकिस्तान में सगोत्र निकाह दर अपेक्षाकृत अधिक (>60%) है। इसमें यह भी कहा गया है कि पाकिस्तान में लगभग 17% से 38% सगोत्र मैरिज चचेरे भाई-बहनों के बीच होते हैं। यह पाकिस्तान में शिशु मृत्यु के प्रमुख कारणों में से एक है। इसके अलावा, अगर बच्चा जीवित रहता है, तो उसमें आनुवंशिक असामान्यता या दीर्घकालिक स्वास्थ्य संबंधी समस्या विकसित होने की संभावना बहुत अधिक होती है।

पाकिस्तान का आनुवंशिक रोगों से जुड़ा डेटाबेस कोहाट विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय जैसे पाकिस्तानी संस्थानों द्वारा बनाए जाते है। यह उन बीमारियों का पता लगाता है और उनकी निगरानी करता है जो मुख्य रूप से पाकिस्तानी बच्चों में अंतःप्रजनन के कारण होते हैं।

इस डेटा से पता चलता है कि 130 अलग-अलग आनुवंशिक बीमारियों में 1,000 से ज़्यादा म्यूटेशन हैं, जो विभिन्न स्थानों, जैसे पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर, संघ प्रशासित जनजातीय क्षेत्र (FATA), पंजाब, खैबर पख्तूनख्वा, बलूचिस्तान, सिंध और गिलगित-बाल्टिस्तान की वजह से आए हैं।

पाकिस्तानी बच्चों में आम है थैलेसीमिया

एक वंशानुगत रक्त विकार थैलेसीमिया की बीमारी पाकिस्तानी बच्चों में ज्यादा मिलती है। इस बीमारी में लाल रक्त कोशिकाएँ ऑक्सीजन नहीं ले पाती हैं। पाकिस्तानी बच्चों में यह सबसे आम आनुवंशिक स्थिति है।

द टेलीग्राफ ने 2015 में चेतावनी दी थी कि ब्रिटेन में पाकिस्तानी समुदायों में चचेरे भाई-बहनों के निकाहों की वजह से लगातार आनुवांशिक बीमारी से ग्रस्त बच्चों का जन्म हो रहा है।

जिस तरह ब्रिटिश प्रशासन और उसके मीडिया ने पाकिस्तानी मुस्लिम ग्रूमिंग गिरोहों द्वारा अपनी नाबालिग लड़कियों के शोषण को कम करके आँकने की कोशिश की, उसी तरह अब वे पाकिस्तानी मुस्लिम समुदाय में अंतःप्रजनन के मुद्दे को भी कम महत्व दे रही है।

सबूत के बावजूद इस पर ध्यान नहीं दिया जा रहा है। लगातार बच्चों के जीवन को खतरे में डालने की कोशिश हो रही है। यहाँ तक कि वैज्ञानिक तथ्यों को भी खारिज किया जा रहा है।

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