अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा 50 साल से भी अधिक समय के बाद चंद्रमा पर इंसानों को भेजने की तैयारी कर रही है. आर्टेमिस II मिशन के तहत नासा का सबसे शक्तिशाली रॉकेट चंद्रमा की परिक्रमा के लिए तैयार है. इसे फ्लोरिडा के कैनेडी स्पेस सेंटर से 6 फरवरी को लॉन्च किया जा सकता है. यह 6,85,000 मील (11,02,400 किलोमीटर) की लंबी यात्रा होगी जो लगभग 10 दिनों में पूरी होगी. इस मिशन में ओरियन कैप्सूल पृथ्वी से करीब 3,70,000 किलोमीटर की दूरी तक जाएगा. यह दूरी चंद्रमा के पीछे के हिस्से तक पहुंचने के लिए तय की जाएगी. नासा का शक्तिशाली रॉकेट अंतरिक्ष में 39,400 किलोमीटर प्रति घंटे की प्रचंड रफ्तार से उड़ान भरेगा. इस मिशन में चार अंतरिक्ष यात्री ओरियन कैप्सूल में रहकर जीवन रक्षक प्रणालियों का परीक्षण करेंगे. अमेरिका और चीन के बीच चंद्रमा पर पहले पहुंचने की जबरदस्त प्रतिस्पर्धा है. चीन ने 2030 तक चंद्रमा पर अपने अंतरिक्ष यात्री भेजने का लक्ष्य रखा है. आइए जानते हैं आर्टेमिस II मिशन और इस महाशक्तिशाली रॉकेट के बारे में.
आर्टेमिस II मिशन नासा के महत्वाकांक्षी चंद्र कार्यक्रम का सबसे महत्वपूर्ण पड़ाव है. यह मिशन 1972 के अपोलो 17 के बाद पहली बार इंसानों को चंद्रमा के पास ले जाएगा. इस बार नासा अपने स्पेस लॉन्च सिस्टम (SLS) रॉकेट का उपयोग कर रहा है. यह रॉकेट अब तक का सबसे शक्तिशाली रॉकेट माना जा रहा है. अंतरिक्ष यात्री ओरियन कैप्सूल के अंदर रहेंगे और गहरे अंतरिक्ष में संचार प्रणालियों का परीक्षण करेंगे.
इस मिशन में कुल चार अंतरिक्ष यात्री शामिल हैं. इनमें रीड वाइजमैन, विक्टर ग्लोवर और क्रिस्टीना कोच नासा के अनुभवी यात्री हैं. जेरेमी हैनसेन इस मिशन में शामिल कनाडा के पहले अंतरिक्ष यात्री होंगे. क्रिस्टीना कोच चंद्रमा की यात्रा करने वाली पहली महिला बनकर इतिहास रचेंगी. वहीं विक्टर ग्लोवर गहरे अंतरिक्ष में जाने वाले पहले अश्वेत व्यक्ति होंगे.
चंद्रमा पर दोबारा जाने का उद्देश्य केवल वहां पहुंचना भर नहीं है. नासा वहां एक परमानेंट बेस बनाने की दिशा में काम कर रहा है. आर्टेमिस II मिशन सफल होने पर अगला कदम आर्टेमिस III होगा. आर्टेमिस III के तहत नासा अगले साल चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर इंसानों को उतारेगा. यह मिशन भविष्य में मंगल ग्रह की यात्रा के लिए एक ट्रेनिंग ग्राउंड की तरह काम करेगा.
नासा का SLS रॉकेट और ओरियन कैप्सूल लगभग 100 मीटर ऊंचे हैं. इस रॉकेट में इतना ईंधन होता है कि उससे एक ओलंपिक आकार का स्विमिंग पूल भरा जा सके. जब यह रॉकेट उड़ान भरता है तो इसकी रफ्तार 24,500 मील प्रति घंटा तक पहुंच जाती है. इतनी ताकत इसे चंद्रमा तक पहुंचने के लिए जरूरी थ्रस्ट प्रदान करती है. रॉकेट को लॉन्चपैड तक ले जाने की प्रक्रिया भी काफी जटिल है.
नासा का ‘क्रॉलर-ट्रांसपोर्टर 2’ इस 5,000 टन के रॉकेट को धीरे-धीरे लॉन्चपैड तक पहुंचाता है. चार मील की यह छोटी सी यात्रा पूरी करने में लगभग 12 घंटे का समय लगता है. लॉन्चिंग से पहले रॉकेट का ‘वेट ड्रेस रिहर्सल’ किया जाता है. इसमें रॉकेट में 7,00,000 गैलन से अधिक ईंधन भरकर पूरी प्रक्रिया की जांच होती है. नासा के इंजीनियर यह सुनिश्चित करते हैं कि लॉन्चिंग के समय कोई भी चूक न हो.
चंद्रमा की यह यात्रा किसी रोमांचक सफर से कम नहीं होगी. अंतरिक्ष यात्री पृथ्वी के दो चक्कर लगाने के बाद चंद्रमा की ओर प्रस्थान करेंगे. इस दौरान उन्हें ओरियन कैप्सूल को मैन्युअल रूप से चलाने का अभ्यास भी करना होगा. यह भविष्य के उन मिशनों के लिए जरूरी है जहां डॉकिंग और अनडॉकिंग की आवश्यकता होगी. अंतरिक्ष यात्री चंद्रमा के पिछले हिस्से से गुजरते हुए एक विशाल घेरा बनाएंगे.
यात्रा के दौरान सबसे बड़ी चुनौती अंतरिक्ष विकिरण (रेडिएशन) से निपटने की होगी. ओरियन कैप्सूल के अंदर एक विशेष रेडिएशन शेल्टर बनाया गया है. यह खतरनाक सौर ज्वालाओं (Solar Flares) से अंतरिक्ष यात्रियों की रक्षा करेगा. 10 दिनों के इस मिशन में यात्रियों को आपातकालीन प्रक्रियाओं का भी परीक्षण करना होगा. यदि कोई समस्या आती है तो उन्हें कैप्सूल के अंदर ही उसे ठीक करना होगा.
नासा सुरक्षा को लेकर कोई समझौता नहीं करना चाहता है. हाल ही में रॉकेट के फ्लाइट टर्मिनेशन सिस्टम में एक मुड़ा हुआ केबल पाया गया था. इसके अलावा ओरियन कैप्सूल को प्रेशराइज करने वाले वाल्व में भी कुछ खराबी देखी गई थी. ऑक्सीजन पंप करने वाले उपकरणों में भी कुछ लीकेज की समस्याएं सामने आई थीं. नासा के तकनीशियन इन सभी खामियों को दूर करने के लिए दिन-रात काम कर रहे हैं.
6 फरवरी की लॉन्चिंग तभी होगी जब हर उपकरण पूरी तरह से सुरक्षित होगा. यदि मौसम खराब होता है या तकनीकी समस्या बनी रहती है तो नासा के पास 14 अन्य तारीखें उपलब्ध हैं. नासा के प्रशासक जेरेड इसाकमैन ने स्पष्ट किया है कि अंतरिक्ष यात्रियों की सुरक्षा सर्वोपरि है. वे तभी उड़ान भरेंगे जब वे पूरी तरह से तैयार होंगे. हर रॉकेट लॉन्च एक बड़ी चुनौती होता है लेकिन नासा को अपनी तैयारियों पर पूरा भरोसा है.

