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संविधान में डिप्टी CM का जिक्र नहीं, फिर क्यों इतनी ताकतवर है यह कुर्सी?

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मुंबई: दिवंगत अजित पवार की पत्नी सुनेत्रा पवार ने महाराष्ट्र में डिप्टी सीएम की कुर्सी संभाल ली है. संविधान में डिप्टी सीएम के पद का जिक्र नहीं है. यह पद अक्सर राजनीतिक नफा-नुकसान से अस्तित्व में आता है. गठबंधन सरकारों में यह सत्ता संतुलन और पावर शेयरिंग का सबसे बड़ा टूल बन चुका है. गृह और वित्त जैसे बड़े विभाग मिलने से यह कुर्सी मुख्यमंत्री के बराबर ताकतवर नजर आने लगती है.

सुनेत्रा पवार ने शनिवार शाम को महाराष्ट्र की 13वीं डिप्टी सीएम के तौर पर शपथ ली. वह इस पद पर बैठने वाली राज्य की पहली महिला नेता बन गई हैं. दिलचस्प बात यह है कि भारत के संविधान में डिप्टी सीएम जैसे किसी पद का कोई जिक्र ही नहीं है. इसके बावजूद गठबंधन वाली राजनीति में यह पद सत्ता का असली केंद्र बनकर उभरा है. आखिर क्यों इस कुर्सी के लिए बड़े-बड़े दिग्गज नेता लाइन में लगे रहते हैं? डिप्टी सीएम का पद औपचारिक रूप से केवल एक कैबिनेट मंत्री का होता है. संविधान के आर्टिकल 164 के तहत मुख्यमंत्री की नियुक्ति होती है और उनकी सलाह पर राज्यपाल मंत्रियों को चुनते हैं. इसी प्रक्रिया में किसी एक या ज्यादा मंत्रियों को डिप्टी सीएम का टाइटल दे दिया जाता है. कानूनी तौर पर उनके पास मुख्यमंत्री जैसी कोई विशेष शक्तियां नहीं होतीं. वे बाकी कैबिनेट मंत्रियों के बराबर ही माने जाते हैं. फिर भी महाराष्ट्र की राजनीति में इस पद का वजन किसी मुख्यमंत्री से कम नहीं आंका जाता है.
क्या संविधान में वाकई डिप्टी सीएम का पद नहीं है?
संविधान के मुताबिक राज्य सरकार का मुखिया सिर्फ मुख्यमंत्री होता है. संविधान केवल मंत्रिपरिषद की बात करता है जिसका नेतृत्व मुख्यमंत्री करता है. डिप्टी सीएम का पद पूरी तरह से राजनीतिक जरूरतों की उपज है. सुप्रीम कोर्ट भी अपने कई फैसलों में साफ कर चुका है कि डिप्टी सीएम का पद केवल एक नाम है. शपथ लेते समय भी वे एक मंत्री के रूप में ही शपथ लेते हैं. उनके पास ऐसी कोई स्वतंत्र शक्ति नहीं होती जिससे वे मुख्यमंत्री के फैसलों को पलट सकें. यह पद केवल गठबंधन के साथियों को खुश रखने का एक जरिया मात्र है.

सुनेत्रा पवार को कौन से मंत्रालय मिले हैं?

शपथ ग्रहण से पहले गवर्नर आचार्य देवव्रत (दाएं से दूसरे), सीएम देवेंद्र फडणवीस (बाएं), और डिप्टी सीएम एकनाथ शिंदे का अभिवादन करतीं सुनेत्रा पवार.

गठबंधन की मजबूरी या पावर शेयरिंग का फॉर्मूला?

जब किसी एक पार्टी को बहुमत नहीं मिलता तब यह पद सबसे ज्यादा अहम हो जाता है. महाराष्ट्र में पिछले कई दशकों से गठबंधन की सरकारें चल रही हैं. ऐसे में सहयोगी दलों को सत्ता में बराबर की हिस्सेदारी दिखाने के लिए डिप्टी सीएम बनाया जाता है. यह पद क्षेत्रीय और जातीय समीकरणों को साधने का भी काम करता है. अगर मुख्यमंत्री किसी एक खास क्षेत्र या समुदाय से है तो डिप्टी सीएम दूसरे बड़े समुदाय से बनाया जाता है. इससे जनता के बीच यह मैसेज जाता है कि सरकार में सबका प्रतिनिधित्व है.

महाराष्ट्र में कब और कैसे शुरू हुआ यह सिलसिला?

महाराष्ट्र में डिप्टी सीएम पद का इतिहास साल 1978 से शुरू हुआ था. उस वक्त नासिकराव तिरपुड़े राज्य के पहले डिप्टी सीएम बने थे. उस दौरान राज्य में राजनीतिक अस्थिरता का दौर चल रहा था. हालांकि इस पद को असली पहचान 1995 में मिली थी. तब शिवसेना-बीजेपी सरकार में गोपीनाथ मुंडे डिप्टी सीएम बने थे. उन्होंने इस पद की गरिमा और ताकत को एक नई ऊंचाई पर पहुंचाया. इसके बाद 1999 से कांग्रेस-एनसीपी गठबंधन में यह पद सत्ता का अनिवार्य हिस्सा बन गया. अजित पवार अब तक सबसे लंबे समय तक इस पद पर रहने वाले नेता हैं.

बिना पावर के भी डिप्टी सीएम इतने शक्तिशाली क्यों?

डिप्टी सीएम की असली ताकत उनके पास मौजूद विभागों से आती है. महाराष्ट्र में अक्सर डिप्टी सीएम को गृह या वित्त जैसे बेहद महत्वपूर्ण पोर्टफोलियो दिए जाते हैं. गृह मंत्रालय के जरिए पुलिस और प्रशासन पर कंट्रोल रहता है. वहीं वित्त मंत्रालय के पास सरकारी खजाने की चाबी होती है. जब कोई दिग्गज नेता इन विभागों के साथ डिप्टी सीएम बनता है तो उसकी ताकत मुख्यमंत्री के लगभग बराबर हो जाती है. इसके अलावा पार्टी के विधायकों पर उनकी पकड़ और गठबंधन में उनकी हैसियत उन्हें पावरफुल बनाती है. महायुति सरकार में वित्त मंत्रालय दिवंगत अजित पवार संभाल रहे थे. हालांकि, अब इसकी कमान खुद फडणवीस के हाथों में होगी.

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