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*यह इन्दोर का वह दौर था जब शादी मे घर घर बुलव्वे दिए जाते थे*

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@सत्येन्द्र हर्षवाल

भारत मे आज शादी एक बहुत बड़ी इंडस्ट्री बन गई है,एक दौर वह भी था जब शादी की पत्रिका का प्रचलन वैसा ही था जैसे आज कल E इनविटेशन का,कोरोना के दौर से शुरू हुवा E इनविटेशन अब पूर्ण प्रचलन का हिस्सा बन पाया है कोरोना काल के बाद अधिकतर लोगो ने E इनविटेशन को प्राथमिकता नही दी उनका सोचना था कि मेजबान घर आ कर ही पत्रिका दे,हालांकि इस E इनविटेशन को प्रचलन में आने में समय लगा उसी तरह जब उस दौर में बुलव्वा  नही देते हुवे पत्रिका दी जाने लगी, हम जब छोटे थे तो उस समय (तेड़े/ बुलव्वा) एक प्रकार का निमंत्रण होता था जिसमे एक शख्स घर घर जा कर आवाज  लगाता था ……..

*श्याम जी शर्मा मनोहर जैन जी के यहां को बुलव्वो हे 3 तारीख को सगड़ा मनक ने नार नोली धर्मशाला आणो है,सवेरे कच्ची रसोई है ने शाम के पक्की रसोई है*

70से 80 के दशक में इस  तरह की आवाज लगाकर निमंत्रण दिया जाता था और जब यह आवाज पूरे मोहल्ले,गवाड़ी 

(गवाड़ी एक तरह की जगह जहां10 से 15  परिवार रहते थे )

उस गवाड़ी में यह आवाज जब गूंजती तो हम समझ जाते थे कि फला कें यहा शादी है,आज तो शायद ही बुलव्वे देने वाले बचे हो,उसी प्रकार  शादी के घर मे एक छोटे बच्चे को बिनायक बनाया जाता था जिसे गणेश जी का स्थान दिया जाता था  सभी कार्य मे प्रथम उसे ही आगे रखते थे,मन्दिर जाना हो भोजन का समय हो पहले बिनायक को ही भोजन कराया जाता था,दूल्हे के घोड़े पर पहले बिनायक (जो एक छोटा सा बालक होता था) को आगे बिठाया जाता था, फिर दूल्हा बैठता था अब समय बदला ,बदले रीति रिवाज ओर बदले तोर तरीके और ढंग ,दौर तो आज का भी अच्छा है ,यह तो जब बीत जाएगा उसके दस पंद्रह साल बाद शायद आज का यह दौर भी अच्छा लगने लगे,क्यो की इंसान की फितरत ही ऐसी है जो है उसकी कद्र नही ओर जो नही है उसके पीछे भागना उसकी इच्छा भी ओर शायद नियति भी। 

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