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मनुष्य तन पाकर जो दूसरे के लिए जीते हैं, वहीं दधीचि कहलाते हैं- सत्तन

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बड़े भाग मानुष तन पावा, तुलसी बाबा का यह कथन आज भी प्रासंगिक है कि मनुष्य तन पाकर जो दूसरे के लिए जीते हैं, वहीं दधीचि कहलाते हैं।

लोकप्रिय कवि पं. सत्यनारायण सत्तन ने चंद्रशेखर व्यास की 43वीं पुण्यतिथि पर गुरुवार को आयोजित कार्यक्रम में यह बात कही। अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में उन्होंने कहा कि चंद्रशेखर आज भी हमारे बीच में हैं क्योंकि वह राष्ट्रहित के लिए जिया था, वह दधीचि की परंपरा का व्यक्तित्व है। डॉ. मिथिला प्रसाद त्रिपाठी ने कहा कि महर्षि दधीचि जनहितार्थ और आसुरी प्रवृत्तियों के विनाश के लिए अपना तन न्यौछावर करने वाले पहले ऋषि थे। उन्होंने ही देहदान की परंपरा इस धरा पर अपनी ही देह दान कर प्रारंभ की। नृत्य-गुरु पद्मश्री पुरु दाधीच ने कार्यक्रम को प्रेरणा प्रदान करने वाला बताया और हिंदी साहित्य समिति से अपने पूर्व प्रसंगों पर विचार व्यक्त किए।

चंद्रशेखर व्यास के कृतित्व और व्यक्तित्व पर प्रकाश डाला

डॉ. योगेंद्रनाथ शुक्ल ने स्व. चंद्रशेखर व्यास के कृतित्व और व्यक्तित्व पर प्रकाश डालते हुए उनके जीवन से जुड़े हुए कई प्रसंग सुनाए। इस अवसर पर डॉ. मिथिला प्रसाद त्रिपाठी द्वारा लिखित महर्षि दधीचि एक अनुशीलन का लोकार्पण किया गया।

देवकीनंदन तिवारी, सुभाष शर्मा, नंदकिशोर व्यास, राजेंद्र दाधीच, के.के. तिवारी, सुरेश व्यास, जितेंद्र जैसवाल, सुनील व्यास, रमेश दाधीच, सुरेशचंद्र करेसिया, राजनारायण शर्मा आदि ने अतिथियों का स्वागत कर स्मृति चिन्ह प्रदान किए। कार्यक्रम में गंभीर शर्मा, गिरधारीलाल शर्मा, रमेश पंचोली, डॉ. सुरेखा भारती, गिरेंद्र सिंह भदौरिया, रामचंद्र अवस्थी, मुकेश तिवारी, प्रवीण जोशी आदि काफी संख्या में सुधीजन उपस्थित थे। कार्यक्रम का संचालन हरेराम वाजपेयी ने किया। संयोजक प्रकाश व्यास ने आभार माना।

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