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मजदूर परिवार के यहां जन्मी तीन बेटियां का पीटी ऊषा जैसा बनने का सपना

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बीना/सागर

फादर्स डे पर पढ़िए कहानी बीना के करोंद गांव में रहने वाले मजदूर पिता के मजबूत और बुलंद हौसले की। यह परिवार भी हरियाणा के फोगाट परिवार जैसा है। इस मजदूर परिवार के यहां जन्मी तीन बेटियां विश्व प्रसिद्ध धावक पीटी ऊषा जैसा बनने का सपना देख रहीं हैं। पिछले पांच साल से यह पिता अपनी बेटियों को दौड़ना सिखा रहा है। खेत की मेढ़ व निर्माणाधीन थर्ड रेलवे ट्रैक पर रोज 5 घंटे की कड़ी मेहनत और रफ्तार से दो बेटियां नेशनल खेल चुकी हैं। तीसरी बेटी भी राज्य स्तर पर दौड़ चुकी है।

पिता का सपना अपनी बेटियों को ओलंपिक में खेलते देखने और अफसर बनाने का है। पिता हाई स्कूल तक पढ़ा है। कभी भी उसने दौड़ में भाग नहीं लिया, लेकिन पिछले पांच वर्षों से वह बच्चों के साथ साथ दौड़ने लगा है। पिता का कहना है, धावक का सिलेक्शन दौड़ तय करने के समय के आधार पर होता है। इसमें भ्रष्टाचार की गुंजाइश नहीं, इसलिए यही खेल चुना।

पिता विनोद रजक ने बताया कि बेटियां रोज ही खेत में मेरे साथ अभ्यास करती हैं। उन्हें कमर में टायर बांध कर दौड़ लगवाना, लंबी कूद, ऊंची कूद समेत कई प्रकार से ट्रेनिंग देता हूं। रोजाना 20 से 25 किमी की दौड़ाया जाता है। मेरा सपना पूरा करने के लिए बेटियां भी सहयोग कर रही हैं। मेहनत और लगन के बाद दो बेटियां नेशनल खेली और कई मेडल जीते। उन्होंने बताया, बेटियां पढ़ने में भी अच्छी हैं। गांव से 22 किमी दूर शहर पढ़ने को आती हैं। बेटियों के साथ 12 वर्षीय बेटा निहाल भी ट्रेनिंग ले रहा है।

विनोद का कहना है, पारिवारिक स्थिति ठीक नहीं है। सरकार से भी मदद नहीं मिलती है, लेकिन बेटियों को शिखर तक पहुंचाने में पैसों की कमी हुई तो खेत भी बेचकर उनकी पूर्ति करेंगे। उनका कहना है कि बेटियों ने संभाग की सभी मैराथन दौड़ जीती है। मैराथन व अन्य दौड़ से जो भी राशि पुरस्कार के रूप में मिलती है, वह राशि बेटियों पर ही खर्च कर दी जाती है। बेटियों को प्रतिदिन चना, गुड एवं दूध दोनों समय दिया जाता है।

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