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भारतीय भक्ति काव्य परम्परा, ‌‌ संगीत‌ की संगत में ‌ गुज़रे तीन दिन!

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प्रोफेसर राजकुमार जैन

विंध्य पर्वतमाला की तलहटी में‌‌ सैकड़ो एकड़ में ‌बने, हजारों पेड़ों, पौधों‌ फूलों लताओं,‌ से ‌‌आच्छादित,‌ आनंदित, शैक्षणिक ‌माहौल में‌ गुरु श्री तेग बहादुर साहब जी की शहादत के 350वी जयंती वर्ष के अवसर पर‌‌ श्री गुरु नानक देव जी ‌ के विचारों एवं जीवन ‌ पर आईटीएम विश्वविद्यालय ग्वालियर‌ में आयोजित‌ विचार गोष्ठियों, ‌ गुरुवाणी-शबद-शास्त्रीय ‌कीर्तन (संगीत)‌ की रस गंगा में गोते लगाता रहा।

किसी भी लोकतांत्रिक मुल्क में तालीम की जिम्मेदारी वहां की सरकारों की होनी चाहिए ताकि सबको समान शिक्षा मिल सके। परंतु हिंदुस्तान में सरकारी नाकारापन के कारण बेशुमार प्राइवेट यूनिवर्सिटी/ कॉलेज आज इस कार्य में लगे हैं।
वहां की कार्य प्रणाली सिर्फ पाठ्यक्रम (सिलेबस) की तालीम देने तक ही महदूद होती है। विद्यार्थियों को केवल और केवल उनके पाठ्यक्रम की उचित व्यवस्था कर उनको उच्च शिक्षित कर डिग्री प्रदान ‌ करती‌ है, ताकि भारी भरकम तनख़ा (पैकेज) उनके विद्यार्थियों को मिल सके। हिंदुस्तान की अधिकतर प्राइवेट यूनिवर्सिटी इसी फार्मूले पर चलती है।
परंतु ग्वालियर स्थित आईटीएम विश्वविद्यालय ‌ इस संदर्भ मेंअलग ‌ राह का राही है। बुनियादी रूप से यह टेक्नोलॉजी/मैनेजमेंट की शिक्षा देने का केंद्र है। टेक्नोलॉजी, ‌ मैनेजमेंट में इसकी कितनी श्रेष्ठता है, वह तो इसके विद्यार्थी अथवा इन विषयों के विशेषज्ञ ही बता सकते हैं, मेरी जानकारी इस बारे में नगण्य है।
आईटीएम विश्वविद्यालय ‌ विद्यार्थियों के सर्वांगीण विकास के लिए निर्धारित पाठ्यक्रम के अतिरिक्त कला, साहित्य, संगीत, ‌ पौराणिक आख्यानों, ‌‌ ऐतिहासिक ‌ भारतीय वांग्मय ‌‌ की विभिन्न धाराओं, ‌ सूफी संतों, ‌ राजनीतिक विचारको‌, नाटक, ‌ मुशायरों (इबारत) ‌ पेंटिंग तथा वास्तु कला‌ (स्कल्पचर्स) ‌ की बहुमूल्य कृतियों से विश्वविद्यालय के दोनों कैंपस‌ अटे-पटे हैं,‌ उस पर‌ देसी विदेशी शिल्पकारों ‌ के हुनर से वाकिफ कराने के लिए ‌ कार्यशाला ‌ निरंतर आयोजित होती रहती है। ‌ समसामयिक विषयों पर ‌ अलग-अलग राय रखने वाले‌ मुल्क के नामवर विद्वान‌‌ ‌ सेमिनार सिंपोजियम ‌‌ मैं शिरकत करते रहते हैं।
इसी कड़ी में पिछले ‌ 17 वर्षों से आईटीएम संगीत सम्मेलन आयोजित होता रहा है इस वर्ष 18वां आईटीएम संगीत सम्मेलन ‌ ‘भारतीय भक्ति परंपरा’ के‌ अंतर्गत गुरु तेग बहादुर जी की शहादत के 350वे जयंती वर्ष के अवसर पर‌ गुरु नानक देव जी के विचार दर्शन और मानव सेवा ‌ के साथ-साथ ‌ गुरुवाणी शब्द- शास्त्रीय कीर्तन‌, रागों‌ पर आधारित था आयोजित हुआ। इसी प्रकार गत वर्ष महाकवि गोस्वामी तुलसीदास ‌ पर‌ आधारित‌ कार्यक्रम संपन्न हुआ था, ‌ तथा आगामी वर्ष ‌ सूफी संत ‌‌ अमीर खुसरो ‌‌ के वैचारिक दर्शन, संगीत पर‌ कार्यक्रम आयोजित करने की मंशा विश्वविद्यालय के ‌ संचालकों के द्वारा प्रकट की गई है।
तीन दिन के इस आयोजन को‌ प्रत्येक दिन दो सत्रों‌ मैं विभाजित किया गया। आयोजन के प्रथम दिन‌ के प्रथम सत्र में ‌ विश्वविद्यालय के तुरारी‌ परिसर‌ के अलाउद्दीन खान सभागार में‌
गगन में थाल‌ (मंगलाचरण)
पंजाब विश्वविद्यालय की प्रोफेसर निवेदिता सिंह ने अपनी मधुर वाणी से ‌ प्रस्तुति दी। उनके शिष्य‌ सुरदीप सिंह ने‌ तबले पर संगत करते हुए ‌ माहौल को‌ संगीतमय बना दिया।
उन्होंने ‌ धनाश्री राग में‌ आरती का गायन किया जिसके बोल थे ‘गगन में थाल रवि चंद्र दीपक बने, तारिका मंडल जनक मोती….। उन्होंने, जब लग दुनिया रहिए, नानक किछू सुनिए’…. भी सुनाया। उन्होंने ‌ आरती के अर्थ और भाव को विस्तार से समझाते हुए बताया कि गुरु नानक देव जी ने इस रचना के माध्यम से यह संदेश दिया कि संपूर्ण प्रकृति ही ईश्वर की आरती कर रही है। यह आरती केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं बल्कि प्रकृति के प्रति आभार और सम्मान का प्रतीक है। गुरु नानक देव ने इस आरती की रचना उड़ीसा स्थित भगवान जगन्नाथ के प्रसिद्ध मंदिर में मंदिर में की थी।
इस गोष्ठी में गुरु नानक देव वाणी की सांगीतिक‌ संरचना, गुरु नानक देव के दर्शन में मानव सेवा की अवधारणा‌ विषयों पर व्याख्यान हुए। गायन के साथ-साथ विषय के सैद्धांतिक पक्ष पर विवेचना करते हुए‌ प्रोफेसर निवेदिता ने ‌ गुरु नानक देव की आध्यात्मिक भावना और प्रकृति के प्रति उनके दृष्टिकोण से परिचित कराया। ‘गुरु नानक वाणी की सांगीतिक ‌ संरचना‌’ विषय पर व्याख्यान देते हुए उन्होंने कहा ‌ गुरु नानक देव ने संगीत को केवल कला नहीं,‌‌ बल्कि समाज से संवाद का प्रभावी माध्यम बनाया। उन्होंने बताया की गुरु नानक देव ने लगभग 27000 मील की यात्राएं कर‌ विभिन्न संस्कृतियों और समुदायों के लोगों तक अपने‌ संदेश पहुंचाए। उन्होंने राग आशा, ‌ तैलंग और गोरी जैसे रागों के माध्यम से अपनी वाणी को जन-जन तक पहुंचाया।
इसी सत्र के ‌ अन्य वक्ता इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र नई दिल्ली के सदस्य सचिव डॉ सच्चिदानंद जोशी ने गुरु नानक देव के दर्शन में मानव सेवा की अवधारणा विषय पर विचार रखते हुए कहा गुरु नानक का दर्शन केवल धार्मिक विचार नहीं, ‌ बल्कि मानवता को जोड़ने और समाज को बेहतर बनाने का मार्ग है। आज के दौर में लोग वास्तविक जीवन से अधिक रील लाइफ में जीने लगे हैं,‌ जिससे संवाद और संबंध कमजोर हो रहे हैं। जबकि हमारे युग पुरुषों ने हमेशा यह सिखाया कि मनुष्य को मनुष्य से जुड़ना चाहिए उन्होंने कहा कि मानव का मानव प्रेम करना स्वाभाविक है और इसमें कोई बुराई नहीं है क्योंकि यही भाव समाज को आगे बढ़ाता है। आज की युवा पीढ़ी ही भारत का भविष्य है इसलिए उन्हें गुरु नानक देव के विचारों से प्रेरणा लेकर समाज के लिए सकारात्मक कार्य करने चाहिए। उन्होंने कहा कि आज गुरु तत्व, ईश्वर तत्व,देव तत्व, मानव तत्व को समझना जरूरी है। हमारी संस्कृति में पैर छूने का आशय यह था कि मैं अपने अहंकार को आपके चरणों में रखता हूं। लेकिन एआइ के समय में हमारे जीवन से संवाद खत्म सा होता जा रहा है। हम मानवता से दूर होते जा रहे हैं धीरे-धीरे मशीन में परिवर्तित होते जा रहे हैं।।युवाओं को गुरु नानक के विचारों से प्रेरणा लेकर समाज में सकारात्मक परिवर्तन लाना चाहिए उन्होंने युवाओं को सफलता के लिए चार ‘सी’कमिटमेंट, ‌ क्रिएटिविटी, ‌ कंटेंटमेंट, ‌ और कंपैशन का सूत्र भी बताया।
आईटीएम यूनिवर्सिटी के वाइस चांसलर प्रोफेसर डॉक्टर योगेश उपाध्याय ने कहा की शिक्षा के साथ-साथ छात्राओं का सर्वांगीण विकास होना चाहिए उन्होंने गुरु पद के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि हम तो केवल सांसारिक ज्ञान देने वाले लोग हैं, जबकि सच्चे गुरु वही होते हैं जो मानवता, समाज सेवा ‌ और शांति के मार्ग पर चलकर देश में एकता और सद्भाव बनाए रखते हैं। ऐसे ही महान गुरु थे गुरु नानक देव जी। उन्होंने आगे कहा कि अध्यात्म वह परंपरा है जो मनुष्य को जीवन भर ही नहीं बल्कि अनंत काल तक मार्गदर्शन देती हैं।
गोष्टी के बाद सवाल जवाब के सत्र में छात्रों द्वारा कई प्रश्न किए गए। एक छात्रा का सवाल था कि गुरु नानक ने किसी व्यक्ति को अंतिम गुरु बनाने के बजाय गुरु ग्रंथ साहब को गुरु का स्थान क्यों दिया? इसके उत्तर में वक्ता ने कहा गुरु को किसी एक व्यक्ति में नहीं बल्कि उनके विचारों और वाणी में खोजा जाना चाहिए। साथ ही यह भी संभव है कि गुरु नानक देव को स्वयं यह अनुमान नहीं रहा होगा कि आगे चलकर उन्हें गुरु के रूप में इतनी व्यापक मान्यता मिलेगी। एक अन्य प्रश्न में पूछा गया की अधिकांश धमों ने धन और शक्ति के माध्यम से अपना प्रचार किया। ऐसे में सिख धर्म किस प्रकार अलग है। उत्तर में बताया गया जहां धर्म में आडंबर बढ़ जाता है वहां वह अपने मूल उद्देश्य से भटकने लगता है। सिख धर्म की विशेषता यह है कि इसकी नींव किसी एक व्यक्ति पर नहीं बल्कि विचारों पर आधारित है। इसमें विभिन्न संतों‌ और गुरुओं की वाणी शामिल है। जिस धर्म में सेवा और आदर की भावना होती है वह अपने आप लोगों के जीवन में स्थान बना लेता है। फिर सवाल दागा गया की गुरु नानक के विचार आज के समय में बढ़ती हिंसा ‌ और युद्ध की स्थितियों से बाहर निकलने में किस प्रकार सहायक हो सकते हैं। जवाब में वक्ता ने कहा कि हिंसा और संघर्ष की परिस्थितियों से बाहर निकलने का मार्ग हमारे मूल गुणो और मूल्यों में ही निहित है। गुरु परंपरा में शब्द गुरू की अवधारणा‌ इसी उद्देश्य से स्थापित की गई थी, ‌ जिससे मनुष्य को सही दिशा और समाधान मिल सके।
पहले दिन का दूसरा सत्र जो की‌ अपराहन 3:00 बजे‌ विश्वविद्यालय के ‌ तुरारी परिसर‌ मैं नवनिर्मित ‌ भव्य, विशालकाय मल्टीपरपज ‌ इंडोर एरिना‌ हाल‌ जिसकी ऊंचाई तकरीबन 45 फीट तथा 2500 ‌ से अधिक ‌ श्रोताओं ‌ के बैठने की क्षमता‌ है‌, मैं‌ हरमंदिर साहिब अमृतसर के हजूरी रागी भाई गुरमीत सिंह शांत द्वारा गुरु वाणी शब्द कीर्तन ‌ से शुरू हुआ। उन्होंने कहा कि सिख परंपरा में गुरु ग्रंथ साहिब को जीवंत गुरु का स्थान दिया गया है। 31 रागों में गुरु ग्रंथ साहब की वानी (वाणी) है। इसमें कुछ शास्त्रीय संगीत है और गुरुमत संगीत। शास्त्रीय संगीत और गुरुमत संगीत वह है जो गुरु की वाणी गुरु के राग हैं, जो गुरु ग्रंथ साहिब में दर्ज हैं। उन्होंने शास्त्रीय गीत के रागों के बारे में बताते हुए कहा कि शास्त्रीय गीत के राग पुरातन राग, प्राचीन राग हैं, जो सतयुग में, द्वापर युग में त्रेता युग में पीछे से आ रहे राग हैं। गुरु साहब ने अपने रागों का आविष्कार किया है। पहला राग श्रीराग, जो पुरातन राग है, जिसे गुरुओं ने गुरु ग्रंथ साहिब में दर्ज किया है। माझ राग के बारे में बताते हुए कहा कि भारतीय संगीत में किसी भी धर्म, किसी भी ग्रंथ में माझ राज नहीं है। यह राग सिर्फ और सिर्फ गुरु ग्रंथ साहिब का गुरुओं का राग है। जैसे मियां तानसेन ने बहुत सारे रागों का आविष्कार किया, जैसे मियां की टोड़ी, मियां के सारंग, मियां मल्हार बनाए। इसी तरह गुरु नानक साहिब, गुरु रामदास और गुरु अर्जन देव की वाणी माझ राग में है। गुरमत संगीत और शास्त्रीय संगीत का मेल इसलिए है क्योंकि गुरु साहब ने अपने मुख से अपनी रचना से उनका उच्चारण किया। पीछे से चले आ रहे हैं रागो में गुरु ने वाणी प्रकट की। जैसे श्रीराग, गूजरी राग सहित कई राग शामिल है। उन्होंने कहा कि गुरु तेग बहादुर जी की वाणी 15 शुद्ध और दो राग मिश्रित राग कुल 15 रागों की वाणी है। भाई गुरमीत सिंह शांत ने ‌ अपना कीर्तन धनाश्री राग से ‌ शुरू किया। गुरु तेग बहादुर जी के शबद‌ जिसके बोल थे-‌ काहे रे बन खोजन जाई,सरब निवासी सदा अलेपा‌ तोही संग समाई…। गायन के साथ-साथ उन्होंने शब्द की रचनाओं का अर्थ बताते हुए कहा की गुरु तेग बहादुर जी संदेश दे रहे हैं कि ईश्वर को भगवान को खोजना है तो हृदय में खोजो। वह आपके ही हृदय में समाया हुआ है। इसके बाद उन्होंने तिलंग राग, तिलंग काफी राग की प्रस्तुति दी। साथ ही उन्होंने ठुमरी पेश की, जिसके बोल थे जग रचना सब झूठ है, जान लियो रे मीत…।
दाताबंदी छोड़ गुरुद्वारा किला‌ ग्वालियर से दस बादशाहियों की जोत श्री गुरु ग्रंथ साहिब की पालकी में सुशोभित होकर कार्यक्रम स्थल पर पूरी गुरु मर्यादा के साथ पहुंचे। और गुरु महाराज जी का प्रकाश हुआ। पूरा हाल‌ विद्यार्थियों, ‌ शिक्षकों, कर्मचारियों ‌ के अतिरिक्त ग्वालियर शहर और उसके आसपास के ग्रामीण अंचलों ‌ के श्रद्धालु स्त्री पुरुषों, नवयुवको से खचाखच भरा हुआ ‌ अनुशासित रूप में‌ गायन का‌ भक्ति भाव से आनंद ले रहा था। ‌‌ कार्यक्रम के दूसरे दिन ‌ के प्रथम सर्ग‌ की शुरुआत विश्वविद्यालय के सिधौली‌ कैंपस के डॉ राममनोहर लोहिया सभागार में,
एक नूर ते सब जग उपज्या,
विषयों पर‌ व्याख्यान हुए।
प्रोफेसर जगबीर सिंह ने‌ ‘गुरु नानक देव जी के दर्शन में समता का आदर्श’ विषय पर बोलते हुए कहा कि‌ गुरुवाणी का आरंभ गुरु ग्रंथ साहिब में आने वाले मूल मंत्र + एक ओंकार सतनाम+ से होता है। प्रायः इसका‌ अंग्रेजी में अनुवाद+‌ गॉड इज वन+‌ कर दिया जाता है, ‌ लेकिन वास्तव में ‌ इस वाक्य का अर्थ केवल अनुवाद से पूरी तरह व्यक्त नहीं किया जा सकता। गुरुवाणी को समझने के लिए भारतीय सभ्यता और सांस्कृतिक परंपरा को समझना आवश्यक है। भारतीय ज्ञान परंपरा की अपनी शब्दावली, अपनी दार्शनिक परिभाषाएं और अपनी गहराई है, इसलिए इन अवधारणाओं को समझने के लिए उस परंपरा की दृष्टि से समझना आवश्यक है। प्रोफेसर सिंह ने कहा की ‘ओमकार’ ब्रह्म का प्रतीक है, ‌ और भारतीय परंपरा में ज्ञान और धर्म की समृद्ध विचारधारा विद्यमान है। उन्होंने बताया कि हमारे वेद विश्व के सबसे प्राचीन ज्ञान ग्रंथ है और भारतीयं सभ्यता का दृष्टिकोण संसार को देखने की एक विशिष्ट और व्यापक दृष्टि प्रदान करता है। उन्होंने भ्रम की अवधारणा को स्पष्ट करते हुए कहा कि ब्रह्म एक विचार है और दार्शनिक चिंतन है, जो पूरे ब्रह्मांड में व्याप्त है। गुरु वाणी को उन्होंने काव्य‌ और संगीतात्मक वाणी का अद्भुत संयम बताया। उनके अनुसार जो व्यक्ति इस विराट ब्रह्मांड की अनुभूति कर लेता है, वह अहंकार और ईगो से मुक्त हो जाता है। इसी संदर्भ में उन्होंने गुरु अर्जन देव का संदेश उद्वित करते हुए कहा -न को बैरी, नहीं बिगाना, सगल संग हम कऊ आई,…। उन्होंने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा में जीवन के गूढ सत्य को कविताओं और काव्य के माध्यम से सरलता से समझाया गया है। गुरु नानक देव जी मध्यकालीन भक्ति काव्य परंपरा के महत्वपूर्ण स्तंभ हैं, जिन्होंने अपने आध्यात्मिक संदेशों के माध्यम से समाज को समता, प्रेम और मानवता का मार्ग दिखाया। प्रोफेसर सिंह ने कहा कि सन 1885 में लॉर्ड मैकाले द्वारा शिक्षा प्रणाली में किए गए परिवर्तन के बाद भारतीय भाषाओं और पारंपरिक ज्ञान प्रणाली को धीरे-धीरे पीछे कर दिया गया। उन्होंने मूल मंत्र की व्याख्या करते हुए बताया की ब्रह्म पूरे ब्रह्मांड में व्याप्त है और गुरुवाणी अहंकार से मुक्ति का मार्ग दिखाती है। इसलिए आज आवश्यकता है कि हम अपनी ज्ञान परंपरा को उसके मूल संदर्भ में समझे।‌‌

‘भारतीय भक्ति काव्य परंपरा में गुरु नानक देव जी का योगदान‌, विषय पर बोलते हुए प्रोफेसर माधव हाड़ा ‌ ने अपने व्याख्यान में ‌ कहा की गुरु नानक देव केवल सिख समुदाय के ही नहीं, बल्कि संपूर्ण भारतीय समाज की साझा विरासत है। उनका संदेश संपूर्ण मानवता के लिए है। गुरु नानक देव जी की वाणी और विचार पूरे देश के लिए है और इस परंपरा को बनाए रखना हमारा दायित्व है। उन्होंने बताया कि भारतीय परंपरा की विशेषता विविधता में एकता है। प्रोफेसर हाड़ा ने‌ लंगर और सेवा जैसी परंपराओं का‌ उल्लेख करते हुए कहा कि सच्चा प्रेम ही ईश्वर तक पहुंचने का सबसे बड़ा साधन है।
इसी सत्र में प्रोफेसर सुमैल सिंह सिद्धू‌ ने ‘गुरु ग्रंथ साहब की निर्मित का इतिहास’‌ पर अपने व्याख्यान में रेखांकित किया कि‌ भारतीय बौद्धिक परंपरा में हरिशंकर परसाई, ‌ कालिदास और ज्ञान रंजन जैसे रचनाकारों का महत्वपूर्ण स्थान है। छात्र आंदोलनों ‌ और वैचारिक ‌ बहसों की भी‌ एक समृद्ध परंपरा रही है। उन्होंने डॉ राममनोहर लोहिया के कथन का उल्लेख करते हुए कहा की ‘धर्म दीर्घकालीन राजनीति है‌ और राजनीति अल्पकालीन धर्म।’यह विचार समाज और इतिहास को समझने की एक महत्वपूर्ण दृष्टि प्रदान करता है। उन्होंने आगे कहा की गुरु ग्रंथ साहिब सिख आंदोलन की वैचारिक आधारशिला है और सिख परंपरा केवल जन्म से नहीं, बल्कि विचार और जीवन दृष्टि से जुड़ी हुई है। गुरु नानक देव ने बाहरी अनुष्ठानों से अधिक आचरण और सत्य पर बल दिया।

कार्यक्रम‌ के अंतिम दिन‌‌ संगीत नाटक अकादमी ‌ द्वारा सम्मानित, गुरमत संगीत चेयर, ‌ पंजाबी विश्वविद्यालय पटियाला‌ के भाई डॉक्टर अलंकार सिंह जी का संगीतमय गुरुवाणी -शबद – शास्त्रीय कीर्तन‌ द्वारा समापन हुआ। भारतीय ‌ शास्त्रीय ‌ संगीत‌‌‌,‌ और गुरमत संगीत ‌‌ के गहन जानकार‌‌ भाई अलंकार सिंह ने‌ रागों पर आधारित अपने कीर्तन ‌‌ मैं संगीत‌ के स्वरो की‌ जब छठा बिखेरी‌ तो ‌ उसके रूहानी असर ने ‌ श्रोताओं को‌ भक्ति रस में सराबोर कर दिया। उसकी एक झलक दिखाने के लिए ही मैंने अपनी इस समीक्षात्मक ‌ प्रस्तुति में उनके गायन की ‌ तस्वीर भी पेश की है।
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