जब अमेरिका जैसे बड़े बाजार भारत पर टैरिफ लगाते हैं, तो चिंता स्वाभाविक होती है. हाल ही में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा भारत से आयात होने वाले उत्पादों पर 50% टैरिफ लगाने का फैसला सामने आया, जिसने कई उद्योगों और व्यापारियों को चिंता में डाल दिया. लेकिन ये कहानी सिर्फ एकतरफा नहीं है. इतिहास गवाह है कि जब-जब भारत पर अंतरराष्ट्रीय दबाव बढ़ा है, तब-तब देश ने उसे अवसर में बदला है.
सीधे शब्दों में कहें तो टैरिफ यानी इंपोर्ट ड्यूटी- वो टैक्स जो किसी देश की सरकार दूसरे देश से आयात होने वाले माल पर लगाती है. अमेरिका ने यह टैक्स अपने उपभोक्ताओं पर लगाया है, लेकिन असर भारत के एक्सपोर्टरों और उनसे जुड़े लाखों लोगों तक पहुंचता है.
उदाहरण के लिए, मान लीजिए आप सूरत के हीरा व्यापारी हैं. आप अमेरिका को 10,000 रुपये का एक हार भेजते हैं. टैरिफ के बाद अब अमेरिकी ग्राहक को वही हार 15,000 रुपये में मिलेगा. इससे वहां के व्यापारी महंगा माल खरीदने से बचेंगे, या तो कम ऑर्डर करेंगे या किसी सस्ते देश जैसे वियतनाम या थाईलैंड से माल मंगवाएंगे. इससे भारत में हीरे तराशने वाले कारीगरों की रोजी-रोटी पर असर पड़ सकता है.
तीन प्रमुख क्षेत्र जो सबसे ज्यादा प्रभावित होंगे
1. कपड़ा और रेडीमेड गारमेंट्स (तिरुपुर का संकट)
तमिलनाडु के तिरुपुर से भारत अमेरिका को हर साल लगभग 90,000 करोड़ रुपये का वस्त्र निर्यात करता है. भारत से अमेरिका को होने वाले कुल टेक्सटाइल एक्सपोर्ट का 27% हिस्सा यहीं से आता है. लेकिन 50% टैरिफ के चलते भारतीय कपड़ा अब अमेरिकी बाजार में महंगा पड़ने वाला है, जिससे अमेरिकी कंपनियां सस्ते विकल्प तलाशेंगी. इसका सीधा असर तिरुपुर की फैक्ट्रियों और वहां काम कर रहे लाखों मजदूरों की नौकरी पर पड़ सकता है.
2. हीरे और आभूषण (सूरत और मुंबई की चिंता)
सूरत और मुंबई जैसे शहर अमेरिका को हर साल 83,000 करोड़ रुपये के हीरे और आभूषण निर्यात करते हैं. भारत के कुल आभूषण निर्यात का 40% हिस्सा अकेले अमेरिका में जाता है. अगर टैरिफ लागू हो जाता है, तो लगभग 20 लाख कारीगरों की आजीविका खतरे में पड़ सकती है.
3. सीफूड एक्सपोर्ट (झींगे पर संकट)
विशाखापट्टनम, चेन्नई, ओडिशा और पश्चिम बंगाल जैसे तटीय क्षेत्रों से अमेरिका को 20,000 करोड़ रुपये के झींगे और अन्य समुद्री उत्पाद एक्सपोर्ट किए जाते हैं. यह भारत के समुद्री उत्पाद निर्यात का 40% है. टैरिफ के कारण ये उत्पाद अमेरिकी बाजार में प्रतिस्पर्धा नहीं कर पाएंगे, जिससे मछलीपालकों और प्रसंस्करण उद्योग को बड़ा झटका लग सकता है.
टैरिफ का व्यापक प्रभाव
यह असर सिर्फ कुछ उद्योगों तक सीमित नहीं रहता. जब एक मजदूर कम कमाता है, तो उसकी खर्च करने की क्षमता भी घटती है. तिरुपुर का मजदूर कमाएगा तो वह कम खर्च करेगा, जिससे आसपास की दुकानों, सेवाओं, और अन्य छोटे कारोबारों की आमदनी भी घटेगी. सूरत का कारीगर यदि बेरोजगार होता है, तो वह वहां के बाजार में कम खरीदारी करेगा. यह असर धीरे-धीरे पूरे आर्थिक तंत्र पर फैलता है.
विशेषज्ञों का अनुमान है कि इस तरह के टैरिफ से भारत की जीडीपी में 0.2% से 0.6% तक की गिरावट आ सकती है. इसका मतलब है कि सरकार के पास विकास कार्यों, जैसे स्कूल, सड़क और अस्पताल बनाने के लिए कम पैसा होगा.
कहानी का दूसरा पहलू: सुधार की राह
जहां एक ओर यह टैरिफ भारत की अर्थव्यवस्था पर दबाव डाल सकता है, वहीं दूसरी ओर सरकार मूलभूत सुधारों के जरिए घरेलू बाजार को मजबूत करने की दिशा में आगे बढ़ रही है. सबसे अहम कदमों में से एक है:
जीएसटी (GST) में कटौती की योजना
वर्तमान में भारत में चार प्रमुख जीएसटी स्लैब हैं- 5%, 12%, 18% और 28%. लेकिन सरकार इसे केवल दो स्लैब (5% और 18%) में बदलने की तैयारी कर रही है. यदि ये बदलाव लागू होते हैं (संभावना है कि दिवाली तक यह हो जाए), तो कई उपभोक्ता वस्तुएं जैसे कि साइकिल, कपड़े, घरेलू सामान आदि सस्ते हो जाएंगे.
उदाहरण के लिए, अभी पटना में 5000 रुपये की एक साइकिल पर 12% टैक्स लगता है, यानी 600 रुपये. लेकिन अगर यह टैक्स घटाकर 5% कर दिया गया, तो टैक्स केवल 250 रुपये होगा. इस तरह उपभोक्ता की 350 रुपये की बचत होगी, जिसे वह अन्य वस्तुओं या सेवाओं पर खर्च करेगा. यह पैसा देश की अर्थव्यवस्था में घूमेगा और उसे गति देगा.
SBI रिसर्च के अनुसार, यह जीएसटी कटौती लगभग 1.98 लाख करोड़ रुपये की अतिरिक्त खपत पैदा कर सकती है, जो टैरिफ के असर को काफी हद तक संतुलित कर सकती है.
नए बाजारों की तलाश और प्रोत्साहन योजनाएं
सरकार सिर्फ घरेलू खपत पर ही नहीं, बल्कि एक्सपोर्टरों को नई अंतरराष्ट्रीय मार्केट खोजने में भी सहायता कर रही है. सूरत के हीरा व्यापारी अब दुबई, ब्राजील, रूस, ओमान और यूरोपीय बाजारों की ओर देख रहे हैं.
सरकार लगभग 25,000 करोड़ रुपये की निर्यात प्रोत्साहन योजना पर काम कर रही है, जिसमें उद्योगों को सस्ते कर्ज, सब्सिडी और लॉजिस्टिक्स में सुधार जैसी सुविधाएं दी जाएंगी. इसके अलावा, भारत तेजी से फ्री ट्रेड एग्रीमेंट्स (FTAs) को अंतिम रूप दे रहा है, जिससे अगले कुछ वर्षों में 1.34 लाख करोड़ रुपये के नए निर्यात के अवसर खुल सकते हैं.
इतिहास के आईने में देखें तो…
भारत का इतिहास बताता है कि वह संकट के समय किस तरह से खुद को साबित करता आया है:
- 1991 में जब विदेशी मुद्रा संकट के कारण भारत को सोना गिरवी रखना पड़ा, उसी समय आर्थिक उदारीकरण हुआ और भारत वैश्विक IT शक्ति बना.
- 1960 के दशक में जब अमेरिका ने गेहूं भेजना बंद किया, तो भारत ने हरित क्रांति के जरिए खाद्य आत्मनिर्भरता हासिल की.
- 1974 और 1998 में परमाणु परीक्षणों के बाद अमेरिका ने प्रतिबंध लगाए, लेकिन भारत ने अपने वैज्ञानिक कार्यक्रम को और मजबूत किया. बाद में वही अमेरिका 2008 में भारत के साथ न्यूक्लियर डील करने को मजबूर हुआ.
- 1980 में अमेरिका ने सुपरकंप्यूटर देने से इनकार किया, भारत ने खुद PARAM सुपरकंप्यूटर बनाया.
रॉकेट तकनीक रोके जाने पर भारत ने खुद का PSLV तैयार किया और अब चंद्रयान, गगनयान जैसे मिशनों से दुनिया को चौंका रहा है.
तो क्या इस बार भी भारत कहानी बदलेगा?
अगर सरकार का जीएसटी सुधार और निर्यात प्रोत्साहन योजना सटीक तरीके से लागू होती है, तो भारत फिर से एक बड़ी छलांग लगा सकता है. भारत का घरेलू बाजार 2 ट्रिलियन डॉलर से ज्यादा का है- एक विशाल उपभोक्ता वर्ग जो खुद एक नई अर्थव्यवस्था बना सकता है.
जहां टैरिफ का असर जीडीपी के 2% हिस्से को प्रभावित करता है, वहीं यदि 140 करोड़ लोगों की खपत शक्ति को बढ़ाया जाए तो यह किसी भी बाहरी झटके से निपटने की क्षमता रखता है.

