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अनवरत तपस्या से डोलते सिंहासन

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सहीराम

अब जी, धरती के सिंहासन तो डोलते ही रहते हैं-जनतंत्र जो है। कभी किसान हिला देते हैं, कभी मजदूर। कई बार तो कवि भी हुंकार लगा देते हैं कि सिंहासन खाली करो। वे कभी भी घोषणा कर देते हैं-बोल अरी ओ धरती डोल, राज सिंहासन डांवांडोल। धरती के सिंहासन सिर्फ इसीलिए नहीं डोलते कि जनतंत्र है, तानाशाही हो तो भी डोल जाते हैं। इसीलिए तो फैज साहब कह देते हैं—हम देखेंगे, जब तख्त गिराए जाएंगे, जब ताज उछाले जाएंगे। पर जी, यह ऊपर वाले का सिंहासन क्यों डोल रहा है।

हालांकि ऊपर भी कई सिंहासन हैं। लेकिन वहां क्षीर सागर वाला सिंहासन या कैलाश पर्वत वाला सिंहासन भी कभी नहीं डोलता। पर इंद्रासन अक्सर डोल जाता है। उसके डोलने के कई किस्से भी चलते हैं। कभी वह किसी की तपस्या से डोल जाता है तो कभी वह किसी के अच्छे कर्मों से डोल जाता है। अपने सिंहासन को स्थिरता प्रदान करने के लिए इंद्र महाराज कई तरह के दंद-फंद करते हैं। कभी किसी अप्सरा को सिंहासन हिलाने वाले की तपस्या भंग करने के लिए भेज देते हैं तो कभी किसी सत्कर्म करने वाले को बरगलाने के लिए कोई प्रपंच रच देते हैं।

यह सब करते हुए वे अक्सर हमारे ही शासक लगते हैं कि सिंहासन को स्थिरता प्रदान करने के लिए दलबदल करा लिया या किसी की सीडी निकाल दी। आजकल कभी सीबीआई को पीछे लगा दिया जाता है तो कभी ईडी को। इन एजेंसियों का इस्तेमाल वे अक्सर वैसे ही करते हैं जैसे इंद्र भगवान तपस्याएं भंग करने के लिए अप्सराओं का इस्तेमाल करते हैं। हमारे यहां भी आजकल स्थिर सरकार की बड़ी डिमांड रहती है। ऐसी स्थिरता के लिए अक्सर अपने विरोधियों की फाइलें खोलना जरूरी होता है। लालफीताशाही को चाहे कितना ही कोस लो, सरकार की स्थिरता के लिए फाइलें बहुत ही जरूरी होती हैं। सरकार चलाने के लिए भी और सरकार की स्थिरता के लिए भी।

इधर लगता है इंद्रासन फिर डोल रहा है। देश के किसान दिल्ली के बॉर्डरों पर जमे तो थे, अपनी सरकार को हिलाने के लिए लेकिन उनके इस जमावड़े से इंद्रासन कब डोलने लगा, पता ही नहीं चला। इसीलिए इंद्र ने कुपित होकर बेमौसम की ऐसी बारिश की कि पहले ही ठंड से त्रस्त किसान और बेहाल हो गए। अब भई, तुम कोई नरों के इंद्र यानी नरेंद्र तो हो नहीं कि आंदोलनकारी किसानों पर पानी की बौछार मारोगे या आंसू गैस के गोले दागोगे। लेकिन लगता है देवों का इंद्र भी कंफ्यूज हो गया है। उसने अपने को नरों का इंद्र यानी नरेंद्र समझ लिया है और इसलिए वह भी पानी और ओलों की बौछार मारने लगा है। फिर भी किसानों की तपस्या तो जारी है। अब उससे चाहे नरों के इंद्र का सिंहासन डोले या देवों के इंद्र का सिंहासन डोले।

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