14 अक्टूबर 2025 को हुई कोलेजियम की बैठक में, सरकार द्वारा की गई पुनर्विचार की मांग पर विचार करते हुए यह निर्णय लिया गया कि — मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस अतुल श्रीधरन को छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट की बजाय इलाहाबाद हाईकोर्ट में ट्रांसफर करने की सिफारिश की जाती है।
इसका मतलब यह हुआ कि पहले कोलेजियम ने जस्टिस अतुल श्रीधरन को छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट भेजने की सिफारिश की थी, लेकिन केंद्र सरकार ने इस पर पुनर्विचार का आग्रह किया। अब कोलेजियम ने नया फैसला लेकर उनका ट्रांसफर इलाहाबाद हाईकोर्ट के लिए कर दिया है।
जस्टिस अतुल श्रीधरन को जम्मू-कश्मीर से तब ट्रांसफर कर दिया गया था, जब वे मुख्य न्यायाधीश बनने वाले थे (आरोप है कि उनके उदारवादी रुख के लिए)। अब उन्हें मध्य प्रदेश से भी ट्रांसफर कर दिया गया (भाजपा के विजय शाह के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने के निर्देश देने के कारण, जिन्होंने मुसलमानों के खिलाफ अपमानजनक टिप्पणी की थी)।
जस्टिस अतुल श्रीधरन का स्थानांतरण एक ऐसा विषय है जिसने न्यायपालिका की स्वतंत्रता और कोलेजियम प्रणाली पर फिर से सवाल खड़े किए हैं।
मध्य प्रदेश में नंबर 2 के न्यायाधीश रहे श्रीधरन ने सोफिया कुरैशी के अपमान के मामले में स्वतः संज्ञान लेते हुए एक साहसिक कदम उठाया था, जिसके बाद उनका स्थानांतरण हुआ।
कोलेजियम ने जस्टिस अतुल श्रीधरन के स्थानांतरण की सिफारिश क्यों की? श्रीधरन ने मध्य प्रदेश के मंत्री द्वारा सोफिया कुरैशी के अपमान के मामले में स्वतः संज्ञान लिया था, जो एक संवेदनशील मुद्दा था।
मोदी सरकार ने स्थानांतरण के स्थान पर पुनर्विचार क्यों मांगा? सरकार ने अनुरोध किया कि उन्हें छत्तीसगढ़ की बजाय उत्तर प्रदेश (जहां वे सीनियरिटी में 7वें नंबर पर होते) भेजा जाए, जबकि छत्तीसगढ़ में वे नंबर 3 होते और कोलेजियम का हिस्सा बनते।
कोलेजियम सरकार के अनुरोध पर सहमत हुआ, क्या इसका मतलब है कि वे उन्हें मध्य प्रदेश से हटाना चाहते थे, किसी विशिष्ट हाईकोर्ट में भेजने की विशेष मंशा नहीं थी? यह सवाल न्यायपालिका की स्वतंत्रता और निर्णय प्रक्रिया पर ऐसा सवाल उठाता है जिसके उत्तर नदारद हैं!
सत्ता के आगे सुप्रीम कोर्ट इस कदर बिका हुआ है कि कर्नल सोफिया कुरैशी के खिलाफ आपत्तिजनक बयान देने वाले एमपी के मंत्री के खिलाफ स्वतः संज्ञान लेने वाले एक ईमानदार जज को आज इलाहाबाद ट्रांसफर कर दिया।ये उसी कॉलेजियम का फैसला है, जो जज बनाने बाभन, ठाकुर, बनिए को चुनता है–बगैर बैकग्राउंड देखे। सत्ता के इशारे पर। चाहे वह बीजेपी प्रवक्ता ही क्यों न रहा हो।
ये वही जज हैं, जिन्होंने एमपी में जातिगत अपराधों पर स्वतः संज्ञान सुनवाई की थी। करप्शन के दलदल में गले तक दबे न्यायपालिका में कुछ दिलेर जज ही बचे रह गए हैं।
अब उनका भी हौसला टूटने लगा है। जस्टिस अतुल श्रीधरन ने जम्मू–कश्मीर हाइकोर्ट का चीफ जस्टिस बनने के मौके की परवाह न करते हुए इंसाफ और मज़लूमों को कानूनी संरक्षण का रास्ता चुना था।
उल्लेखनीय है कि जस्टिस श्रीधरन को 2016 में मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय का न्यायाधीश नियुक्त किया गया था.इससे पहले एक वकील के रूप में उन्होंने इंदौर में अपनी प्रैक्टिस शुरू करने से पहले पांच साल तक वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल सुब्रमण्यम के चैंबर में प्रैक्टिस की थी।
2023 में उन्होंने स्वेच्छा से मध्य प्रदेश से बाहर स्थानांतरण की मांग की थी, यह कहते हुए कि उनकी बेटी इंदौर में अपनी प्रैक्टिस शुरू करेंगी। इसके बाद उनका तबादला जम्मू-कश्मीर और लद्दाख उच्च न्यायालय में कर दिया गया और 2025 में वे वापस मध्य प्रदेश आ गए।
श्रीनगर में अपने कार्यकाल के दौरान जस्टिस श्रीधरन ने निवारक निरोध मामलों की न्यायिक जांच को और अधिक व्यापक बनाया और जन सुरक्षा अधिनियम के तहत कई मामलों को रद्द कर दिया था।
वहीं, मध्य प्रदेश हाईकोर्ट में जस्टिस श्रीधरन उस खंडपीठ का हिस्सा थे जिसने मीडिया में आई उन रिपोर्टों के बाद मामले का स्वतः संज्ञान लिया था, जिनमें कहा गया था कि राज्य के मंत्री विजय शाह ने भारतीय सेना की अधिकारी कर्नल सोफिया कुरैशी के खिलाफ कथित तौर पर भड़काऊ टिप्पणी की थी.इस मामले में अदालत ने सुनिश्चित किया था कि राज्य पुलिस द्वारा मंत्री के खिलाफ एफआईआर दर्ज की जाए।
गौरतलब है कि तब मंत्री ने कहा था, ‘भारत ने पहलगाम आतंकी हमले के लिए जिम्मेदार लोगों को उनकी ही बहन (उनकी समाज की बहन के जरिए) सबक सिखाया है। ’विजय शाह की इस टिप्पणी पर तीखी प्रतिक्रिया देखने को मिली थी और अदालत ने उन्हें फटकार लगाई थी।
हाल ही में मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की जस्टिस अतुल श्रीधरन और जस्टिस प्रदीप मित्तल की बेंच ने दमोह जिले में ओबीसी समुदाय के एक व्यक्ति को पैर धोकर पानी पीने के लिए मजबूर करने की घटना पर स्वत: संज्ञान लेते हुए गंभीर टिप्पणी की है।
अदालत ने इस मामले में राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (रासुका) के तहत कार्रवाई का निर्देश देते हुए कहा कि यदि इस मामले में जल्द कार्रवाई नहीं हुई, तो सामाजिक अशांति और हिंसा फैल सकती है।
इस मामले की सुनवाई के दौरान बेंच ने मामले में सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि जातीय हिंसा और भेदभाव की घटनाएं बार-बार सामने आ रही हैं. यही वह राज्य है, जहां एक सामान्य वर्ग के व्यक्ति ने एक आदिवासी पर मूत्र त्याग किया था और तब मुख्यमंत्री ने उस पीड़ित के पैर धोकर माफी मांगी थी।
अदालत ने इस घटना को ‘गहरा जातिगत भेदभाव और मानवीय गरिमा पर गंभीर हमला’ करार दिया और पुलिस को भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की धारा 351 और 133, तथा धारा 196(2) के तहत कड़े आरोप जोड़ने का निर्देश दिया। अदालत ने वायरल वीडियो में दिखाई दे रहे सभी लोगों पर राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (एनएसए) लगाने का भी आदेश दिया।
पीठ ने कहा कि पीड़ित को भीड़ ने घेर लिया और उसे आज्ञा मानने के लिए मजबूर किया। यह जबरदस्ती और धमकी का दंडनीय कृत्य है।

