सुप्रीम कोर्ट ने आज (27 अक्टूबर) दिल्ली दंगों की व्यापक साजिश के मामले में उमर खालिद, शरजील इमाम, मीरान हैदर, गुलफिशा फातिमा और शिफा उर रहमान की जमानत याचिकाओं पर जवाबी हलफनामा दाखिल करने के लिए दिल्ली पुलिस के दो हफ्ते के समय के अनुरोध को अस्वीकार कर दिया।
यह कहते हुए कि पर्याप्त समय पहले ही दिया जा चुका है, न्यायमूर्ति अरविंद कुमार और न्यायमूर्ति एनवी अंजारिया की पीठ ने मामले की सुनवाई शुक्रवार 31 अक्तूबर के लिए स्थगित कर दी और दिल्ली पुलिस से इस बीच जवाबी हलफनामा दाखिल करने को कहा।
दरअसल, जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस एनवी अंजारिया की बेंच के सामने अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल (एएसजी) एसवी राजू ने जवाब दाखिल करने के लिए कुछ और समय देने की मांग की थी। इसके बाद कोर्ट ने सुनवाई की तारीख आगे बढ़ा दी। पीठ ने अपनी टिप्पणी में कहा, “साफ तौर पर कहें तो, जमानत मामलों में जवाब दाखिल करने की आवश्यकता नहीं होती।”
उमर खालिद की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने इस बात पर ज़ोर दिया कि याचिकाकर्ता 5 साल से ज़्यादा समय से जेल में हैं। वरिष्ठ अधिवक्ता एएम सिंघवी ने कहा कि पूरा मामला मुकदमे में देरी का है और सुनवाई में और देरी नहीं होनी चाहिए। अंततः, पीठ मामले की अगली सुनवाई शुक्रवार को तय करने पर सहमत हो गई।
न्यायमूर्ति कुमार ने परोक्ष रूप से यह सुझाव देते हुए पूछा, “श्री राजू, यह भी देखिए कि क्या आप कुछ निष्कर्ष निकालने के बारे में सोच सकते हैं…।” उन्होंने इस पर विचार करने का सुझाव दिया कि क्या देरी के आधार पर रियायत के आधार पर ज़मानत दी जा सकती है।
एएसजी ने जवाब दिया, “मुझे इस पर एक नज़र डालने दीजिए, लेकिन कभी-कभी दिखावा भ्रामक हो सकता है।” न्यायमूर्ति कुमार ने कहा, “हम यह नहीं कह रहे हैं कि हमने पूरी बात पढ़ ली है, आख़िरकार, यह ज़मानत का मामला है… उन्होंने 5 साल पूरे कर लिए हैं।”
याचिकाकर्ताओं ने 2 सितंबर को दिल्ली उच्च न्यायालय के उस आदेश को चुनौती दी है, जिसमें उनकी जमानत याचिका खारिज कर दी गई थी। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट में 22 सितंबर को भी सुनवाई हुई थी, तब दिल्ली पुलिस को नोटिस जारी कर जवाब मांगा था।
इससे पहले दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा था कि नागरिकों की तरफ से प्रदर्शनों या विरोध के नाम पर साजिशन हिंसा स्वीकार नहीं की जा सकती। मामले में उमर खालिद और शरजील इमाम के अलावा गुलफिशा फातिमा, मीरान हैदर, मोहम्मद सलीम खान, शिफा-उर-रहमान, अतर खान, अब्दुल खालिद सैफी और शादाब अहमद की भी याचिकाएं खारिज कर दी गई थीं। एक अन्य आरोपी तसलीम अहमद की याचिका भी 2 सितंबर को अलग पीठ ने खारिज की थी।
अदालत ने अपने आदेश में कहा था कि संविधान नागरिकों को शांतिपूर्ण, व्यवस्थित और कानूनसम्मत विरोध का अधिकार देता है, परंतु यह अधिकार पूर्ण नहीं है और उस पर उचित प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं। निर्णय में यह भी कहा गया था कि अगर विरोध का असीमित अधिकार दिया जाए तो वह सांविधानिक ढांचे और कानून-व्यवस्था के लिए खतरा बन सकता है।
उमर खालिद, शरजील इमाम और अन्य आरोपियों पर फरवरी 2020 के उत्तर-पूर्वी दिल्ली दंगों की “साजिश रचने” का आरोप है। यह हिंसा नागरिकता (संशोधन) अधिनियम और राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर के विरोध प्रदर्शनों के दौरान भड़की थी, जिसमें 53 लोगों की मौत हुई थी और 700 से अधिक घायल हुए थे। सभी आरोपी इन आरोपों से इनकार करते रहे हैं और 2020 से जेल में बंद हैं। ट्रायल कोर्ट से जमानत खारिज होने के बाद उन्होंने हाईकोर्ट और अब सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है।

