पश्चिम बंगाल में नए डीजीपी की नियुक्ति को लेकर भारी कानूनी पेंच फंस गया है. यूपीएससी ने ममता सरकार द्वारा भेजी गई आईपीएस अधिकारियों की लिस्ट को रिजेक्ट कर दिया है. आयोग ने सरकार को सुप्रीम कोर्ट जाने की कड़ी सलाह दी है. यह विवाद मुख्य रूप से नियमों के उल्लंघन और पैनल भेजने में हुई देरी के कारण पैदा हुआ है. 31 जनवरी को मौजूदा डीजीपी राजीव कुमार रिटायर हो रहे हैं.
पश्चिम बंगाल में पुलिस महानिदेशक यानी डीजीपी की नियुक्ति को लेकर बहुत बड़ी कंट्रोवर्सी खड़ी हो गई है. राज्य के मौजूदा डीजीपी राजीव कुमार का कार्यकाल इसी महीने 31 जनवरी को खत्म हो रहा है. लेकिन उनके उत्तराधिकारी का नाम अभी तक फाइनल नहीं हो पाया है. इसी बीच यूपीएससी ने ममता सरकार को एक बहुत बड़ा झटका दिया है. आयोग ने राज्य सरकार द्वारा भेजी गई आईपीएस अधिकारियों की लिस्ट को वापस लौटा दिया है. यूपीएससी ने साफ तौर पर कहा है कि सरकार को इस मामले में सुप्रीम कोर्ट से परमिशन लेनी चाहिए. यूपीएससी के निदेशक नंद किशोर कुमार ने मुख्य सचिव नंदिनी चक्रवर्ती को चिट्ठी लिखकर यह सख्त सलाह दी है. इस फैसले के बाद राज्य के प्रशासनिक गलियारों में हड़कंप मच गया है. अब यह मामला कानूनी पेचीदगियों में बुरी तरह फंसता नजर आ रहा है. सरकार के सामने अब कोर्ट जाने के अलावा कोई दूसरा विकल्प नहीं बचा है.
आखिर क्यों UPSC ने बंगाल सरकार की भेजी गई लिस्ट को वापस लौटा दिया है?
- यूपीएससी ने राज्य सरकार की सिफारिश को तकनीकी और कानूनी आधार पर रिजेक्ट कर दिया है. दरअसल राज्य सरकार ने नए डीजीपी के चयन के लिए कुछ वरिष्ठ अधिकारियों के नाम भेजे थे. लेकिन आयोग ने इस लिस्ट पर विचार करने से ही इनकार कर दिया है.
- यूपीएससी का कहना है कि पुरानी प्रक्रियाओं में कई खामियां छोड़ी गई थीं. इसके चलते वर्तमान नियुक्ति प्रक्रिया को सही नहीं माना जा सकता है. नियमों के मुताबिक सरकार को एक तय समय सीमा के भीतर यह लिस्ट भेजनी चाहिए थी.
- अब यूपीएससी ने फाइल वापस भेजकर गेंद फिर से राज्य सरकार के पाले में डाल दी है. इससे बंगाल पुलिस के नए मुखिया की रेस अब और भी ज्यादा पेचीदा हो गई है. अधिकारियों के बीच भी इस अनिश्चितता को लेकर काफी चर्चा हो रही है.
क्या नियमों की अनदेखी की वजह से ममता सरकार के लिए मुश्किलें बढ़ गई हैं?
इस पूरे विवाद की असली जड़ दिसंबर 2023 के फैसलों में छिपी हुई है. उस समय तत्कालीन डीजीपी मनोज मालवीय रिटायर हो रहे थे. नियमानुसार सरकार को उनके जाने से पहले ही नए डीजीपी का पैनल तैयार करना था. लेकिन ममता सरकार ने उस समय राजीव कुमार को ‘कार्यवाहक डीजीपी’ बना दिया था. यूपीएससी को यह तरीका बिल्कुल पसंद नहीं आया. आयोग ने इसे नियमों का उल्लंघन माना है.
सरकार ने बाद में स्थायी नियुक्ति के लिए नाम भेजे पर तब तक काफी देर हो चुकी थी. यूपीएससी का तर्क है कि जब शुरुआती प्रक्रिया ही सही नहीं थी तो अब उसे कैसे आगे बढ़ाया जाए. इसी वजह से अब पुराने विवाद को सुलझाने के लिए सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप की जरूरत महसूस की जा रही है.
इस पूरे विवाद में सुप्रीम कोर्ट के 2018 के आदेश का क्या कनेक्शन है?
- सुप्रीम कोर्ट ने साल 2018 में डीजीपी की नियुक्ति को लेकर बहुत सख्त गाइडलाइन्स जारी की थीं. कोर्ट ने आदेश दिया था कि किसी भी राज्य में ‘एक्टिंग’ या कार्यवाहक डीजीपी की नियुक्ति नहीं होगी. साथ ही नए डीजीपी का चयन वर्तमान डीजीपी के रिटायर होने से तीन महीने पहले शुरू हो जाना चाहिए. बंगाल सरकार ने इसी डेडलाइन को मिस कर दिया है.
- आयोग के अनुसार सरकार को सितंबर 2023 में ही नामों का पैनल भेज देना चाहिए था. चूंकि ऐसा नहीं किया गया इसलिए अब मामला अवैध श्रेणी में आ गया है. यूपीएससी ने सुप्रीम कोर्ट के उसी पुराने फैसले का हवाला देकर अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लिया है. अब सारा दारोमदार कोर्ट के अगले आदेश पर टिका हुआ है.
क्या अटॉर्नी जनरल की सलाह बंगाल सरकार के लिए आखिरी चेतावनी साबित होगी?
यूपीएससी ने इस गंभीर मामले में भारत के अटॉर्नी जनरल से भी कानूनी राय मांगी थी. अटॉर्नी जनरल ने भी आयोग की बात का समर्थन किया है. उन्होंने कहा है कि राज्य सरकार को नियमों के उल्लंघन के मामले में कोर्ट की शरण लेनी चाहिए. इस कानूनी सलाह ने यूपीएससी के स्टैंड को और भी ज्यादा मजबूत कर दिया है. अब अगर सरकार बिना कोर्ट की अनुमति के कोई फैसला लेती है तो वह गैर-कानूनी होगा.
ममता सरकार के पास अब बहुत कम समय बचा है क्योंकि 31 जनवरी के बाद पुलिस विभाग में नेतृत्व का संकट खड़ा हो जाएगा. राजीव कुमार का कार्यकाल खत्म होने से पहले नए नाम पर मुहर लगना बहुत जरूरी है. अब देखना यह है कि राज्य सरकार कितनी जल्दी सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाती है.

