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प्रकृति संरक्षण का देता है संदेश,होली में गोबर के कंडों का प्रयोग

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पूरे देश में होलिका उत्सव प्रेम और उत्साह के साथ मनाया जा रहा है। गांवों में मुख्य स्थान पर और नगरों में गली-गली में होलिका दहन के कार्यक्रम आयोजित किये जा रहे हैं। गांवों में आज भी होलिका दहन के लिए लकड़ी का प्रयोग किया जाता है। कंडों की मात्रा बहुत न्यूनतम हुआ करती है। वैसे भी अब पर्यावरण के प्रति स्नेह और वनों का क्षेत्रफल लगातार कम होता देख देश में पूर्ण रूप से होली कंडों से जलाई जाने की परंपरा आरंभ हो चुकी है। इसी कड़ी इंदौर में होलकर शासकों की होली राजबाड़े के सामने पिछले 296 वर्ष से हो रही है। यह होलिका दहन संध्या सात बजे पूजन के साथ विधिवत रूप से की जाती है। राजबाड़े की समीप होली में लकड़ी की मात्रा कम और कंडों की संख्या अधिक थी। 

होली सिर्फ त्योहार या परंपरा नहीं, बल्कि यह पर्यावरण से लेकर सेहत के लिए भी बेहद महत्वपूर्ण है। रंगों के पर्व पर ध्यान रखा जाए तो उत्सव की रौनक बढ़ने के साथ ही खुशी भी दोगुनी हो जाएगी। होलिका दहन पर बुराइयों को जलाकर समाज में अमन व शांति की कामना की जाती है। पहले होलिका दहन में गोबर के कंडे जलाए जाते थे जो पर्यावरण को भी ठीक रखते थे, लेकिन अब लकड़ियों को जला रहे हैं। यह पर्यावरण को तो प्रदूषित करता ही, साथ ही पेड़ों की भी आहूति देनी पड़ती है। हालांकि अब फिर से गोबर के कंडों का प्रयोग चलन में आ गया है।

इंदौर में अधिकतर स्थानों पर होलिका दहन पर्यावरण संरक्षण के साथ कंडों से पूर्णतः होली दहन किया जा रहा है। लकड़ी का संकट और पर्यावरण को ध्यान में रखते हुए नगर में करीब आठ से दस हजार स्थानों पर होलिका दहन होने वाला है और 99 प्रतिशत स्थानों पर कंडों और घास के साथ होलिका दहन किया जा रहा है। कंडों के उपयोग से गोशालाओं में गोबर का उपयोग हो जाता है और इससे आर्थिक लाभ भी होता है। साथ ही पर्यावरण के लिए भी उचित रहता है। नगर में कई स्थानों पर कंडों की दुकानें सजी है। होली दहन के प्रायोजक खरीददार कंडे और घास की काठिया खरीद कर होलिका दहन कर रहे है। भमोरी और रामबाग में कंडों की अधिक संख्या में दुकानें सजी हैं।

दस रुपए प्रति कंडे का भाव
भमोरी में एमआर 10 के समीप के गांव से अनोखीलाल एक बड़े वाहन में चलित कंडों की दुकान लिए सामग्री बेच रहे है वे 100 रुपए में 11 और 10 रुपए प्रति कंडों को बेच रहे हैं।  रामबाग में सुनीता बाई कहती हैं कि हम दो महीने से गोबर खरीदकर कंडे बना रहे हैं और होली के लिए कंडे बेच रहे हैं, उनका भी भाव दस रुपए प्रति कंडा है।

300 कंडे और 20 घास की काठिया
विजय नगर में पिछले 20 सालों से होलिका दहन आयोजित करने वाले लाला भैया बताते हैं लकड़ी कि अपेक्षा कंडे सस्ते रहते हैं और पर्यावरण हित में भी। धार्मिक कार्यक्रम चंदे से होते है और गली-गली में होलिका दहन होता है। चंदा भी कम प्राप्त होता है, इसलिए कंडे सस्ते रहते हैं। एक सामान्य छोटी होलिका में करीब 300 कंडे और 20 घास की काठिया लग जाती है। 

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