तेजपाल सिंह ‘तेज’
(लेखक : वरिष्ठ कवि/लेखक/आलोचक तेजपाल सिंह तेज एक बैंकर रहे हैं। वे साहित्यिक क्षेत्र में एक प्रमुख लेखक, कवि और ग़ज़लकार के रूप ख्यातिलब्ध हैं। उनके जीवन में ऐसी अनेक कहानियां हैं जिन्होंने उनको जीना सिखाया। उनके जीवन में अनेक यादगार पल थे, जिनको शब्द देने का उनका ये एक अनूठा प्रयास है। उन्होंने एक दलित के रूप में समाज में व्याप्त गैर-बराबरी और भेदभाव को भी महसूस किया और उसे अपने साहित्य में भी उकेरा है। वह अपनी प्रोफेशनल मान्यताओं और सामाजिक दायित्व के प्रति हमेशा सजग रहे हैं। इस लेख में उन्होंने अपने जीवन के कुछ उन दिनों को याद किया है, जब वो दिल्ली में नौकरी के लिए संघर्षरत थे। अब तक उनकी दो दर्जन से भी ज्यादा पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। हिन्दी अकादमी (दिल्ली) द्वारा बाल साहित्य पुरस्कार (1995-96) तथा साहित्यकार सम्मान (2006-2007) से भी आप सम्मानित किए जा चुके हैं। अगस्त 2009 में भारतीय स्टेट बैंक से उपप्रबंधक पद से सेवा निवृत्त होकर आजकल स्वतंत्र लेखन में रत हैं।)
जिंदगी होने का वहम पाले हुए हैं हम सब…
कुछ लोग इस स्मृति लेख को एक कहानी समझ सकते हैं और कुछ वक्त के साथ गुजरे हुए मेरे जीवन के उस अनकहे भाग का हिस्सा भी। कुछेक घटनाओं को सीधे-सीधे शब्दों में बयान किया जा सकता है और कुछेक को अंतर्मन की भावनाओं के चित्रण के माध्यम से। यहाँ मैंने वक्त के एक ऐसे अंश को भावनाओं के लबादे में लपेटकर और वह भी उत्तम पुरुष की कलम के जरिए व्यक्त किया गया है। इस प्रकार का वक्त किसी का भी गुजरा कल हो सकता है।
दरअसल, वक्त का बेपरवाह परिंदा अपनी उड़ान कुछ इस बेपरवाही से बदलता है कि खुशी और गम का आसमान समय के साथ-साथ लगातार बदलता रहता है। बहुत बार मासूमियत के वक्त का परिंदा भी अच्छे दिनों की उड़ान से गुजरकर बुरे वक्त की डाल पर बैठ गया होता है। जब बेफिक्र पंछी पर जीवन का बोझ आ जाता है तो सिर पर घर की बहुत सारी जिम्मेदारी भी आ जाती हैं। मेरी समझ नहीं आ रहा होता है कि इस विपत्ति भरी जिंदगी की दलदल से कोई कैसे बाहर निकलें। सबके अपने-अपने दर्द और अपनी-अपनी राय होती थी।
दुखों का पहाड़ उसी पर टूटता है जिसे संभलना आता है। लेकिन जिम्मेदारी तो उन लोगों की होती है जिनकी भावनाएं दिल से बाकी सारी चीजें निकालकर अपनी जगह बना लेती हैं। और बहुत सी घटनाओं की तपिश जीवन भर बनी रहती है। लेकिन इतना तय है कि समय का ठंडा पानी कई बार घटनाओं की कठोरता को नरम कर देता है। लेकिन यह भी जानने की बात है कि हर औरत एक जैसी नहीं होती। सबके अपने-अपने मिजाज और पारवारिक मसले होते हैं। इनमें कुछ परिवार को बांधकर रखने के सपने भी हो सकते और कुछेक को एकाकी जीवन जीने का पक्षधर मार्ग पर चलने का भाव भी। जब भी समय का पक्षी अपने पंख फड़फड़ाता है, सुख और दुःख का दिन आता है। समय भी शिक्षक है जो मनुष्य को उसके कर्मों का पाठ पढ़ाता है।
अपने सेवा निवृत्त होने से पहले और बाद में मैंने मौन बने रहने के पीछे जो भावना पाली थी, वह ये रही है कि मैंने सुना था कि एक चुप सौ को हराता है किंतु मेरे मौन रहने का ये भाव जैसे बिखर कर रह गया। सबकी सुनी। सबकी चाहत को जैसे-तैसे चाहे/अनचाहे पूरा किया लेकिन मेरी अपनी रोजमर्रा की जिन्दगी पर कोई सकारात्मक प्रभाव नहीं पड़ा। यह भी कि मैं अपने जीवन में जी गई बहुत सी घटनाओं को कविता अथवा कहानी के जरिए घटना के तुरंत बाद व्यक्त करता रहा हूँ। यह भी एक ऐसी ही कहानी है।
“जीवन में न जाने कितने ही पड़ाव आते हैं… बाल्य-काल, बचपन, यौवनावस्था और आखिरिश बुढ़ापा…सबको इन हालातों से गुजरना होता है, किंतु हैरत कि कोई भी जीवन की सच्चाई को स्वीकार नहीं करता, उल्टे उसे कदम-कदम पर चेतावनी देने या फिर नकारने पर उतारू होता है… जो एक मिथ्या विचारधारा का अंग है….समूचे जीवन का तर्क-शास्त्र तो इसे नहीं कहा जा सकता।
लोगों का अक्सर यह मत हो गया है कि जो भी कवि अथवा कहानीकार उत्तम/प्रथम पुरुष में कोई कहानी अथवा कविता लिखता है तो पाठक उसे कहानीकार/कवि विशेष के जीवन से जोड़कर या तो मजाक बनाते हैं या साहित्यिकता का लुत्फ उठाते हैं या फिर कहानीकार/कवि विशेष के जीवन में झाँकने का काम करते हैं।जो साहित्यिक मापदंडों के अनुसार न केवल अनुचित है अपितु साहित्य की गरिमा के प्रतिकूल भी है।… खैर! मैं फिर एक कहानी प्रथम/उत्तम पुरुष बनकर लिख रहा हूँ… इस कहानी के पात्र भी मेरे अपने ही हैं। अब जिस पाठक को जो समझना है समझे,इसकी मुझे इसलिए चिंता नहीं क्योंकि भारतीय समाज के प्रत्येक घर की एक जैसी ही कहानी है। सवाल केवल स्वीकारने और न स्वीकारने का है।
“बेटे! आपको मेरा ये पत्र पहला भी है और शायद आखरी भी। और हां! इसे पढ़मे के बाद तुरंत भाड़ देना। ऐसा करने से तुम्हें उस मानसिक पीड़ा से थोड़ी सी राहत तो जरूर मिल जाएगी जो तुम्हे इस पत्र को पढ़ने के उपरांत जन्मेगी। वैसे इस पत्र की विषय वस्तु केवल मेरी ही नहीं है अपितु ये एक सामान्य बात का खुलासा भर है। कोई इस सच को मान लेता है कोई नहीं। मुझे लगता है तुम्हारी माँ के लिए तो मैं जाने कब का मर चुका हूँ। उसे मेरे जैसे व्यक्ति की कतई आवश्यकता नहीं रही होगी। किंतु मिल गया एक अनाथ भूखा-नंगा वैचारिक व्यक्ति… जो केवल रोटी कमाने में ही लगा रहा। रोटी मिलना शुरू हुई तो घर-मकान और न जाने आने वाली पीढ़ी के सुख-सुविधा के लिए किस-किस उपक्रम में उलझता चला गया। कभी भी मन में कामना का भाव/ज्वार उस स्तर का नहीं रहा जो शायद एक स्त्री को चाहिए। इस एक मात्र कमी ने मुझे असली जीवन में अपने परिवार से जैसे अलग ही कर दिया। मैं सामजिक लाज-लिहाज के चलते आज तक इसको केवल इसलिए झेलता आ रहा हूँ कि बच्चों के लालन पालन का सवाल था। यदि यकीन न हो तो कभी अकेले में शांत मन से सोचना कि इसके भाई-भाभी तक हमारे घर पर नहीं फटकते… क्यो? बुरा तो लगेगा तुम्हें, किंतु सच ये है कि आज का व्यक्ति केवल और केवल सामाजिक मजबूरियों के चलते ही साथ–साथ रहने को मजबूर रहे हैं। पिछली बीमारी मुझे लील न गई, ये मेरे लिए मेरे जीवन की सबसे बुरी घटना रही है
मैं लगभग दस बजे फिजिओथैरेपी के लिए घर से निकल जाता हूँ। वहाँ से आने के बाद के समय मैं किस अवस्था से होकर गुजारता हूँ….मैं ही जानता हूँ। तुमने तो कभी मेरी मूकता का कारण जानने की कोशिश तक भी नहीं की। फिर भी मैं कुछ घरेलू और सामाजिक मजबूरियों को कंधे पर लादे लगभग दोपहर को घर से निकलकर शाम को ही घर आ जाता हूँ। घर से हर समय बाहर रहना मेरा शौक नहीं है… मजबूरी है। मेरा घर पर लौट आना किस को कितना भला लगता है… यह भी मेरी सोच से परे है। पूरी कहानी को शब्द-शब्द कहना शायद मेरे बूते बाहर हो चला है। वह इसलिए कि मैं नहीं समझता कि आप घर के हालात से अपरिचित हैं।
मैं जानता हूँ कि तुम्हें मेरी ये बातें शूल की तरह चुभ रही होंगी…. इसलिए नहीं कि तुम्हें मेरी दशा पर तर्श आ रहा होगा… बल्कि इसलिए कि मैं तुम्हारी माँ के अप्रिय व्यवहार को लेकर… बात कर रहा हूँ। खैर चलो! मैं अपनी बातें खत्म कर रहा हूँ। बस! इतना और कि इस सबके लिए मैं ही जिम्मेदार हूँ… मैंने ही सारी की सारी चल-अचल सम्पत्ति में तुम्हारी माँ के नाम को भी दर्ज करा रखा है। किंतु मेरी ये सादगी और मानवता का भाव अर्थात यही उपक्रम मेरे खिलाफ चला गया। ऐसा होने के बाद .वो पहलवान बन गई और मैं…जैसे कोई नकारा…. है। काश! ऐसा तुम्हारे साथ न हो…. वैसे देर-सवेर सबके साथ ऐसा होता ही है। मैं ही नादान हूँ… पता नहीं मैं ही क्यूँ ऐसे सार्वभौम सत्य से परे होकर संवेदनशील हो बैठता हूँ? इस खत में बस इतना ही…शेष आप समझदार हैं, मेरी स्थिति के बारे में सबकुछ जानती ही है। मैं जानता हूँ कि तुम्हें मेरी बातों पर कतई यकीन नहीं होगा। शायद आपको ये मेरा आखरी पत्र है…कब क्या होने वाला है, किसे मालूम? मैं भी नहीं जानता…मैं जानता हूँ कि तुम्हे ही नहीं किसी को भी मेरी बातों पर यकीन नहीं होगा क्योंकि मैं सबकी नजरों में नकारा हूँ।
यहाँ यह कहना अतिशयोक्त न होगा कि इस प्रकार का व्यवहार करना किसी व्यक्ति विशेष पर ही लागू नहीं होता, अपितु समूचे समाज का व्यवहार लगभग एक जैसा ही होता है….कोई इसे स्वीकार लेता है, किंतु ज्यादातर लोग इस सच्चाई को छुपाने का ही प्रयास करते है। जिन्दगी का स्वाद उम्र के हिसाब से बदलता रहता है। बचपन में माँ का प्यार बच्चों के लिए केवल प्यार होता है। जवानी में प्रेमिका अथवा पत्नि का शारीरिक प्यार केवल प्यार होता है। जवानी का यह समय ही सबसे खतरनाक होता है जिसमें सामान्यता पुरुष तमाम दूसरे दायित्वों को भुलाकर केवल और केवल पत्नि की जायज और नाजायज माँगों का शिकार होकर अपने आगे-पीछे के तमाम दायित्वों को भूल जाता है। उसे लगने लगता है कि केवल पत्नि ही उसका आखिरी सहारा है। यही भूल उसे सारी जिन्दगी परेशान करती है। अब उसके अपने बच्चे भी जवान हो जाते हैं, वो भी अपनी मम्मी की भाषा बोलने लग जाते हैं। हमारे समाज में केवल माँ को पूजनीय बनाकर पति के साथ सबसे बड़ा धोखा है, जब्कि माँ तो बच्चे को नौ माह में पेट में पालने भर से ही महान बना दी जाती है और वो ;पिता जो बच्चों की तमाम जरूरतें पूरी करने के बाद अधम माना जाता है। समाज को यह भी तो समझना चाहिए कि कि यदि माँ के पैरों जन्न्त है तो पिता के पैरों में दौलत है। बेचारा पिता हर अवस्था में चौराहे पर खड़ा मिलता है। उसे यह भी पता नहीं होता कि वो जीवित क्यों है….और किसके लिए? क्या उनके लिए, जो उसे केवल साध्य समझते हैं, या फिर उनके लिए, जो कभी उसके सुख और दुख में कभी ही शामिल ही नहीं हुए। कभी–कभी तो बच्चों के बाप को चढ़ी उम्र में ये लगने लगता है कि वो चाहे भी तो मर नहीं सकता है और हर अवस्था में जिन्दा रहने को मजबूर होता है।, क्योंकि ये उसके अपने हाथ की बात नहीं। कहने का अर्थ ये है कि मनुष्य के सामने मरने और जीने की मजबूरी है और कुछ नहीं…यदि ऐसा न होता तो जन-मानस अपने हिसाब से जीने और मरने की तारीख खुद तय करता और प्रकृति के तमाम कारणों को नकार देता। यहाँ यह कहना बेमानी नहीं होगा कि बुढ़ापे में जीने के लिए किसी को भी चुप रहने की सलाह दी जाती है…..जो यूँ ही नहीं है….सभी बुजुर्ग अनुभवी लोगों यही समस्या रही होगी कि बुढ़ापे में कैसे जिया जाए या फिर कैसे अपने अनुभवों के बल पर अपने वजन को बनाए रखने का उपक्रम करें… किंतु ये सारे के सारे उपक्रम बेकार ही चले जाते हैं…. बाप के हिस्से में तो कम से कम शत-प्रति-शत बाप का नकार ही होता है। और माँ भी बच्चों के बड़े हो जाने पर ;पति की उपेक्षा करने लगती है। किंतु लोग इस सच्चाई को कतई भी स्वीकार नहीं करेंगे। आज की महिला “स्त्री सशक्तिकरण” के चलते हर समय पुरुष पर सवार होने को तत्पर रहती ही नहीं है, अपितु पुरुष पर सबारी करना अपना हक मानने लगी है। सन्युक्त परिवारों का विखरना इस बात का प्रमाण है।“
खैर! हर परिवार में एक ऐसा जहरीला इंसान जरूर होता है जिसे आप कितनी भी इज्जत दे दो ; कितना ही मान-सम्मान दे दो लेकिन वह आपकी इज्जत कभी नहीं करेगा और बेचारा बनकर आप बड़े सारे इल्जाम दूसरों पर लगाता रहेगा जब उसको आपसे कोई स्वार्थ होगा तो वह तीन-चार दिन पहले से ऐसा व्यवहार करना शुरू कर देगा जैसे कि कुछ हुआ ही नहीं है और जैसा ही उसका काम निकल जाएगा वह फिर से अपनी औकात दिखा देगा। ऐसे लोगों से सतर्क रहें।
बेटा! कभी गंगा नहाने मत जाना
महाकुंभ के दौरान गंगा में मिला फेकल बैक्टीरिया जो मल में रहता मौजूद रहता है शरीर के लिए बहुत खतरनाक होता है। करोड़ों लोग महाकुंभ में गंगा स्नान कर चुके हैं और कई अभी भी प्रयागराज जा रहे हैं। लेकिन इस बीच गंगा को लेकर एक चौंकाने वाली रिपोर्ट आई है। जिसमें बताया गया है कि इसके अंदर फेकल कोलीफॉर्म बैक्टीरिया बहुत ज्यादा फैल गया है। इसके स्वास्थ्य पर कई नकारात्मक प्रभाव हो सकते हैं। लाखों करोड़ों लोगों ने महाकुंभ मेला में आस्था की डुबकी लगाई। माना जाता है कि गंगा स्नान करने से पाप धुल जाते हैं। वैज्ञानिक भी मानते हैं कि गंगाजल में ऐसे गुण होते हैं जो उसे खराब नहीं होने देते। इनके अंदर बीमार करने वाले बैक्टीरिया व वायरस नहीं पैदा हो पाते। लेकिन महाकुंभ के दौरान गंगा को लेकर सेंट्रल पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्ड (CPCB) की रिपोर्ट ने चौंका दिया है।
टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक सीपीसीबी की रिपोर्ट में बताया गया है कि महाकुंभ के दौरान प्रयागराज में मौजूद गंगा बैक्टीरिया से प्रदूषित है। इस बैक्टीरिया का नाम फेकल कोलीफॉर्म बैक्टीरिया है, जो आमतौर पर इंसानों व जानवरों के मल और वहां से सीवेज के पानी में मिलता है। यह पानी की क्वालिटी को बिगाड़ देता है और शरीर के लिए नुकसानदायक हो सकता है।
रिपोर्ट के मुताबिक नहाने के पानी की 100 ml में 2500 यूनिट फेकल कोलीफॉर्म की अधिकतम मात्रा हो सकती है। लेकिन प्रयागराज के क्षेत्र में गंगा के अंदर इससे ज्यादा मात्रा मिली है। इंद्रप्रस्थ अपोलो हॉस्पिटल के डॉक्टर ने बताया कि कुंभ से आने वाले लोगों को किस तरह की दिक्कतें हो रही हैं।(Credit: DD News Hindi)
यथोक्त के आलोक में मुझे अपने दिवंगत बड़े मामा जी – रामदयाल जी ने एक बार गंगा स्नान करने के बारे में एक घटना का हवाला देते हुए मुझसे कहा था कि बेटा! कभी गढ़ मुक्तेश्वर गंगा स्नान करने कतई भी मत जाना। जब मैंने इसका कारण पूछा तो उन्होंने बताया – मैं भी एक बार परिवार के साथ गंगा स्नान करने गया था तो गंगा नदी के किनारे-किनारे लोग/लुगाए खुले में मल त्याग करने को मजबूर थी। सब जगह सड़ाद फैली हुई थी। फिर भी हम जब कोई साफ सा घाट देखकर गंगा नहाने गया तो गंगा में डुबकी लगाकर जैसे ही पानी से बाहर सिर निकाला तो मिलासिर पर हाथ फेरते समया अपने सिर पर सूखे हुए मल का टुकड़ा मिला। वो दिन था कि मैं उसके बाद कभी भी गंगा स्नान करने नहीं गया। इसलिए तुमसे भी ये कह रहा हूँ कि कभी गंगा नहाने मत जाना। पंडित/पुजारियों ने जनता के मन में एक ऐसा भय पैदा कर रखा है कि यदि कोई गंगा में स्नान करेगा तो उसके तमाम पाप धुल जाते हैं। पता नहीं इन भूखे लोगों के सिर कौन सा पाप चढ़ा होता है जो ये गरीब/निरीह लोग/लुगाई गंगा नहाने की दौड़ में शामिल हो जाते हैं। मामा जी ने तंज कसा कि इन्हें रोजी-रोटी कमाने से फुरसत नहीं मिलती, पता नहीं इन्हें पाप करने का मौका कब मिल जाता है?
इस बारे में अचानक मुझे तथागत बुद्ध के एक वचन की और याद हो आई। तथागत कहते है – आदमी डर के कारण भगवान की पूजा करता है। उसने डर के कारण मंदिर बनवाया। वह डर के कारण प्रार्थना करता है। कभी वृक्ष की पूजा करता है, कभी पत्थर की पूजा करता है, लेकिन गौर से देखना। कभी मंदिर में मूर्ति की पूजा करता है, तो कभी मस्जिद में मूर्तिविहीन मूर्ति की पूजा करता है। लेकिन गौर से देखना – मंदिर में, मस्जिद में, गुरुद्वारे में, चैत्य में, शिवालय में, गिरिजाघर में, आदमी डर के बल पर खड़ा है। बुद्ध आगे कहते हैं, जो भय के बल पर खड़ा है, वह कभी सत्य को नहीं जान सकेगा।
यथोक्त कथन के माध्यम से मेरा उद्देश्य किसी भी धार्मिक समुदाय या विचारधारा का अनादर करना नहीं है बल्कि जनता के सामने सही जानकारी रखने का एक प्रयास भर। यहाँ खुले दिमाग से सोचने की जरूरत है। वैसे मामा जी की बातें यकीनन उन्हीं की हैं। 0000