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हम बस मांग ही करते हैं पर सरकार सुनती कहां है…महंगाई ने तोड़ दी कमर, परिवार चलाना मुश्किल…

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Union Budget 2026 को लेकर इस बार आम जनता की उम्मीदें कुछ ज्यादा ही हैं. वजह साफ है लगातार बढ़ती महंगाई, कमजोर रोजगार और रोजमर्रा के खर्चों का बढ़ता बोझ. 1 फरवरी को वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण लगातार नौवीं बार केंद्रीय बजट पेश करने जा रही हैं. ऐसे में भोपाल से लेकर देश के हर कोने तक लोग यही जानना चाहते हैं कि क्या इस बार बजट आम आदमी को राहत देगा या फिर उम्मीदें एक बार फिर कागजों तक ही सिमट कर रह जाएंगी.

भोपाल के बाजारों में बजट को लेकर चर्चा तेज
मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल में बजट को लेकर खासा माहौल बना हुआ है. न्यू मार्केट से लेकर कॉलोनियों तक हर जगह महंगाई और रोजगार ही चर्चा का विषय है. सड़क किनारे दुकान लगाने वाले, गृहिणियां और नौकरीपेशा लोग सभी की नजरें बजट पर टिकी हैं. लोगों का कहना है कि इस बार सरकार को सिर्फ आंकड़ों की नहीं, जमीन पर जी रहे लोगों की भी सुननी चाहिए.

‘दो रुपये कमाने को तरस रहा आम आदमी’
न्यू मार्केट में सड़क पर दुकान लगाने वाले राजकुमार माली कहते हैं कि सरकार से बस यही उम्मीद है कि खाने-पीने की चीजों पर राहत मिले. आज हालत ये है कि इंसान दो-दो रुपये कमाने को तरस रहा है. महंगाई तो बहुत बढ़ गई है, लेकिन रोजगार उतना नहीं बढ़ा. अगर बड़ी फैक्ट्रियां लगें तो कई लोगों को काम मिल सकता है. उनका कहना साफ है कि अगर सरकार ने आम लोगों की नहीं सुनी, तो गरीब आदमी के पास करने को कुछ नहीं बचेगा.

महंगाई ने तोड़ दी कमर, परिवार चलाना मुश्किल
भोपाल की रहने वाली भारती माली बताती हैं कि महंगाई ने आम आदमी की कमर तोड़ दी है. पहले एक नौकरी में बड़ा परिवार चल जाता था, अब दस हजार रुपये में घर चलाना नामुमकिन है. तेल, दाल, आटा, चावल सब महंगा हो गया है. स्कूल की फीस अलग परेशानी है. अब आदमी खाए या बच्चों को पढ़ाए समझ नहीं आता.”

हर साल उम्मीद, हर बार निराशा
भारती माली आगे कहती हैं कि हर साल बजट से उम्मीद करते हैं, मांग करते हैं, लेकिन वो बस मांग ही रह जाती है. अगर इस बार सच में कुछ राहत मिल जाए तो गरीब आदमी को थोड़ी सांस मिल सके.

अब देखना ये होगा कि Union Budget 2026 आम जनता की इन आवाजों को कितनी गंभीरता से सुनता है और क्या यह बजट सच में महंगाई से जूझ रहे लोगों के जीवन में कुछ सुकून ला पाता है या फिर उम्मीदें एक बार फिर अधूरी रह जाएंगी.

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