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धनबल का जोर…जमीन कमजोर,संजय का चुनाव हवा-हवाई

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पार्टी प्रकोष्ठों की बैठक तक नही ले पाये अब तक शुक्ला

दो दर्जन से ज्यादा वार्डों में अभी से पार्टी की हालत पस्त

कई वार्ड में योग्य उम्मीदवारों का टोटा, कुछ नेताओं को जबरन लड़वाना पड़ा चुनाव

शुक्ला के गृह क्षेत्र में ही पार्षद प्रत्याक्षियों की हालत खस्ता

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वक्त से पहले संजय शुक्ला के रूप में मेयर प्रत्याशी देकर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस के कद्दावर नेता कमलनाथ भले ही इंदौर नगर निगम में पार्टी को विजयश्री दिलवाने के लिए ऐड़ी से चोटी का जोर लगा रहे है लेकिन जमीन पर हालात इसके ठीक उलट है। शहर में कांग्रेस प्रत्याशी के धनबल का के जोर का तो शोर है लेकिन पार्टी की जमीन बेहद कमजोर है। पार्षद उम्मीदवारों की हालत तो ओर भी खराब है। कई वार्ड तो ऐसे रहे जहा पार्टी को चुनाव लड़ाने के लिए योग्य उम्मीदवार ही नही मिले। कई वार्ड में ऐसे नेताओं को जबरन चुनाव लड़वाना पड़ा जो चुनाव से स्पष्ट इंकार कर चुके थे। इसके बाद भी पार्टी के कई वार्ड में बगावत चरम पर है। संगठन स्तर पर कोई रणनीतिक तैयारियां नही न बैठकों के दौर। अलबत्ता बगावत रोकने की एक विधानसभावार समितिया जरूर बनाई है। 

विधानसभा 1

रिश्तेदार को टिकिट, योग्य बाहर

ये मेयर प्रत्याशी का गृह क्षेत्र है। यहां से वे विधायक भी है। इस इलाके में पार्टी के सामने 17  वार्ड में अजीब स्थिति है। कई उम्मीदवार नही मिला तो किसी में जबरन किसी को लड़ाना पड़ा। एक वार्ड में योग्य उम्मीदवार की दावेदारी शुक्ला की रिशेतदारी निगल गई। इस इलाके में पार्टी के लिए जीत की ग्यारंटी वाले वे ही वार्ड है जहां मुस्लिम मतदाता निर्णायक है ओर जहां इलाके के क्षत्रप चुनाव मैदान में है। 

यहां वार्ड 5 सामान्य है। पार्टी के पास यहां भाजपा के कद्दावर नेता निरंजन सिंह चौहान के सामने चुनाव लड़वाने के लिए कोई नेता ही नही मिला। लिहाजा पिछड़ा वर्ग से योगेंद्र मौर्य को टिकट दिया गया।

 कालानी नगर वाले वार्ड 4 से पार्टी के लिए महावीर जैन टिकट मांग रहे थे लेकिन उन्हें उठाकर दूर 14 नंबर वार्ड में फेंक दिया गया वार्ड 4 से कांग्रेस प्रत्याशी संजय शुक्ला के रिश्तेदारी में टिकट दिया गया इसी प्रकार वार्ड 6 में भी पार्टी के पास चुनाव लड़ाने के लिए उम्मीदवार का टूटा था यहां पार्टी नेता राकेश वर्मा पहले ही चुनाव लड़ने से मना कर चुके थे बावजूद इसके उन्हें अनुनय विनय कर मैदान में उतारा गया राकेश वर्मा की पत्नी राखी वर्मा अब चुनावी मुकाबले में है। वार्ड क्रमांक 16 में पार्टी की हालात सही समझ में आती है कि भाजपा में टिकट की जो दावेदारी कर रहे थे , उन कुलदीप चोकसे को भाजपा से टिकट नहीं मिलने की सूरत में पार्टी ने हाथों-हाथ कांग्रेस ज्वाइन करा कर टिकट भी दे दिया। वार्ड 13 में भी संजय शुक्ला के मित्र का रिश्तेदार चुनाव लड़ रहे हैं। मात्र 8000 वोटों से इस विधानसभा सीट को जीतने वाले शुक्ला के लिए अपने ही गृह क्षेत्र में जीत की गारंटी वाले वहीं वार्ड रह गए हैं जो अल्पसंख्यक मतदाता बहुल हैं और जहां से इलाके के क्षत्रप गोलू अग्निहोत्री दीपु यादव के के यादव परिवार चुनाव लड़ते हैं 17 में से मात्र 6 वार्ड में ही पार्टी चुनाव लड़ती नजर आ रही है।

 विधानसभा 2

भाजपा के बागी से आस- बाकी निराश

चिंटू चौकसे और राजू भदोरिया को छोड़ कांग्रेश इस इलाके में किसी भी वार्ड में दमदार से चुनाव लड़ती नजर नहीं आ रही है। यहां कांग्रेश भाजपाई गुटबाजी और अंदरूनी बगावत के भरोसे दो और वार्डो पर अपनी जीत की संभावनाएं देख रही है। इसमें से एक वार्ड 33 भी है जहा भाजपा की बागी डॉक्टर श्रद्धा दुबे ने कांग्रेश की बांछें खिला रखी है

विधानसभा 3

जोशी-जोशी का अंतर्विरोध

मुस्लिम वार्ड से ही आस

अल्पसंख्यक मतों के लिहाज से कांग्रेस का हमेशा साथ देने वाली इस विधानसभा सीट पर इस बार कांग्रेस के ही दो बड़े नेताओं के अंतर्विरोध गहराये हुए है। यहाँ से तीन बार प्रतिनिधित्व करने वाले पूर्व विधायक अश्विन जोशी और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता रहे स्वर्गीय महेश जोशी के पुत्र पिंटू जोशी आमने सामने हैं। दोनों नेता एक ही परिवार से जुड़े हैं बावजूद इसके टिकटों के वितरण में हुई ऊंच-नीच के कारण यहां पर भी पर्दे के पीछे अंतरकलह चरम पर है। कांग्रेश यहां पर भी अंसार अंसारी दीपिका अनुरोध जैन शैलेश गर्ग और अनवर कादरी जैसे नेताओं में ही अपनी पार्षदी देख रही है

 विधानसभा 4

सामान्य सीट-अनुसूचित जाति उम्मीदवार, अध्यक्ष ही चुनाव से भागी

भाजपा की अयोध्या कही जाने वाली सीट पर कांग्रेश के लिए जीत का परचम फहराना हमेशा से ही टेढ़ी खीर साबित हुआ है। नगर निगम चुनाव में भी कमोवेश यही स्थिति है। पार्टी को कुछ वार्डों में चुनाव मैदान में दो-दो हाथ करने की उम्मीद वार ही नहीं मिले। वार्ड 67 में पार्टी ने अर्चना राठौर को जरूर टिकट दिया लेकिन वह यहां से चुनाव नहीं लड़ना चाहती थी।  वार्ड 70 सामान्य था। पार्टी को यहां कोई उम्मीदवार ही नहीं मिला और उसने यहां पर सामान्य सीट से अनुसूचित जाति के अभिषेक करोसिया को मैदान में उतारा। सबसे चर्चित वार्ड 71 में पार्टी की महिला विंग की अध्यक्ष जया तिवारी ने ही चुनाव लड़ने से इनकार कर दिया जबकि वह इस वार्ड से महीनों से तैयारी कर रही थी ओर टिकिट की चाह के भाजपा से कांग्रेस में गई थी। पार्टी को यहां मजबूरन इलाके की मशहूर दूध की दुकान के परिवार में एक टिकट देना पड़ा।

सुदामा नगर वाले वार्ड से स्थानीय उम्मीदवारी को नकारते हुए मितेश रावल को टिकट दिया। यह टिकट कांग्रेश की निमाड़ की राजनीति के एक बड़े नेता की सिफारिश पर आया ओर अब रावल क्षेत्र में पहचान के संकट का सामना कर रहे हैं। वार्ड 65 में पार्टी के पास गोपाल कोड़वानी के रूप में एक मजबूत नाम था लेकिन चुनावी पर्चे में खामी होने के चलते कोडवानी का नामांकन निरस्त हो गया। इस मामले में पार्टी की लीगल सेल पर सवाल खड़े हो रहे हैं। गुमास्ता नगर वाले वार्ड 83 में मना करने के बाद भी आशीष लाहोटी को मैदान में उतारा। लाहोटी लगातार चुनाव लड़ने से मना कर रहे थे।

विधानसभा 5

खजराना आजाद नगर से ही आस

कांग्रेसी यहां पर भी खजराना अल्पसंख्यक बहुल क्षेत्र के 2 वार्ड और आजाद नगर क्षेत्र के वार्ड से ही अपनी जीत की संभावनाओं को प्रबल मान रही है। इस इलाके के क्षेत्र पूर्व विधायक सत्यनारायण पटेल कि वो सक्रियता भी नजर नहीं आ रही जो वह अपने विधानसभा चुनाव में प्रदर्शित करते रहे हैं। खजराना जैसे पार्टी के गढ़ में कांग्रेश आखिरी तक टिकट नहीं कर पाई जिसका नुकसान उम्मीदवार को उठाना पड़ रहा है।

कमलनाथ के खास खडायता को टिकिट नही

सोमवार को जारी हुई कांग्रेस पार्षद प्रत्याशियों की अंतिम सूची में भी पूर्व पार्षद प्रेम खड़ातिया के हाथ निराशा लगी। कमलनाथ के खास माने जाने वाले प्रेम खड़ायता वार्ड 8 से दावेदारी कर रहे थे । महिला वार्ड होने के नाते प्रेम खड़ातिया बहू या पत्नी के लिए टिकट चाह रहे थे। जमीनी जमावट ओर इलाके में निजी सम्पर्क के दम पर वे अल्पसंख्यक बहुल इस वार्ड से चुनाव लड़ना चाह रहे थे। पार्टी ने उनकी मंशा को दरकिनार करते हुए यहां से अनवर दस्तक परिवार से रुखसाना को टिकट दिया।  पार्टी के फैसले के बाद इस वार्ड पर कांग्रेस के एक बड़े तबके की नाराजगी भी फैल गई है।

पर्चा निरस्त- लीगल सेल कठघरे में

गोपाल कोड़वानी का नामांकन निरस्त होने के बाद कांग्रेश की लीगल सेल पर सवालिया निशान खड़े हो गए हैं पार्टी नेताओं ने इस पर रोष जाहिर करते हुए लीगल सेल पर निष्क्रियता के आरोपी चस्पा किए। पार्टी नेताओं का कहना है कि लीगल सेल का काम ही यह रहता है कि वह प्रत्येक उम्मीदवार के फार्म की बेहद बारीकी से जांच करें ताकि कोई भी पर्चा खारिज ना हो बावजूद इसके कोटवानी का पर्चा खारिज हो गया जिससे पार्टी के सामने शर्मिंदगी के हालात हैं।

केवल धनबल का जोर

जमावट कमजोर

कांग्रेस प्रत्याशी संजय शुक्ला का चुनाव केवल धन बल के शोर के इर्द-गिर्द घूम रहा है। जमीनी जमावट के नाम पर शुक्ला के निजी मित्रों के अलावा कहीं कुछ नजर नहीं आ रहा है। पार्टी के विभिन्न मोर्चा प्रकोष्ठ  के बीच अब तक शुक्ला नहीं पहुंच पाए हैं ना मोर्चा प्रकोष्ठों  कि कोई बैठक हुई है । पार्षद उम्मीदवारों और महापौर प्रत्याशियों के संयुक्त जनसंपर्का भी कोई खाका तैयार नहीं हुआ है। चुनावी प्रबंधन पूरी तरीके से बिखरा नजर आ रहा है ।

 सर्वे नहीं धनबल का है यह टिकट 

कांग्रेस प्रत्याशी संजय शुक्ला के टिकट को समर्थकों ने सर्वे के आधार पर तय हुआ प्रचारित किया लेकिन पार्टी सूत्रों का कहना है यह टिकट भी धनबल के प्रभाव से आया है । कांग्रेस के लिए इंदौर जैसा शहर बीते तीन दशक से राजनीतिक रूप से नुकसानदेह रहा है । पार्टी भी इसलिए बड़े चुनावो में धनबल से जुड़े चेहरों को आगे कर चुनावी खानापूर्ति पूरी करती रही है। सतनारायण पटेल से लेकर पंकज संघवी और अब संजय शुक्ला तक यही कहानी दोहराई जा रही है। कोई भी नेता वर्तमान के भाजपा के माहौल को देखते हुए चुनाव लड़ने को तैयार नहीं होने की सूरत में शुक्ला स्वत ही दावेदार हो गए।

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