एसआईआर के मुद्दे पर देशभर में बवाल जारी है। सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान सामाजिक कार्यकर्ता योगेंद्र यादव ने चौंकाने वाला दावा किया कि बिहार में एसआईआर प्रक्रिया के चलते दो जीवित लोगों को मृत घोषित कर दिया गया।
एसआईआर के मुद्दे पर देशभर में हंगामा मचा हुआ है। विपक्षी दल सड़क से लेकर संसद तक इसका विरोध कर रहे हैं। इस बीच सुप्रीम कोर्ट में मंगलवार को इस मामले को लेकर सुनवाई हुई। सुनवाई के दौरान अदालत में एक रोचक मामला देखने को मिला। दरअसल, सुप्रीम कोर्ट में SIR पर सुनवाई के दौरान सामाजिक कार्यकर्ता योगेंद्र यादव चौंकाने वाला दावा किया।
सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान योगेंद्र यादव ने अदालत में एक पुरुष और एक महिला को पेश किया। दोनों को पेश करते हुए योगेंद्र यादव ने दावा किया कि इन दोनों को बिहार में चल रही SIR की प्रकिया के बाद जारी ड्राफ्ट में मरा हुआ घोषित कर दिया गया है। योगेंद्र यादव के इस दावे से सब चौंक गए। उन्होंने कहा कि बिहार में SIR के कारण 65 लाख से ज्यादा वोटर प्रभावित हुए हैं। यह अभियान पूरी तरह से विफल रहा है।
स्टूडियो में ही चल सकता है ड्रामा
अदालत में योगेंद्र यादव की दलीलों के बाद चुनाव आयोग के वकील ने अपनी बात रखी। वकील ने कहा कि योगेंद्र यादव का यह ड्रामा टीवी स्टूडियो में तो चल सकता है, लेकिन यहां नहीं। आयोग के वकील की तरफ से कहा गया कि योगेंद्र यादव ऑनलाइन फॉर्म भरकर इस गलती को सुधार सकते थे।
‘देश के नागरिक रख रहे अपनी बात‘
बता दें कि बिहार की वोटर लिस्ट में नाम जुड़वाने या हटवाने के लिए चुनाव आयोग ने 30 अगस्त तक की डेडलाइन रखी है। चुनाव आयोग की दलील पर सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस सूर्य कांत के नेतृत्व वाली पीठ ने कहा कि पीठ को इस बात का गर्व है कि कम से कम देश के नागरिक अदालत में अपनी बात रखने के लिए आ तो रहे हैं।
सामाजिक कार्यकर्ता योगेंद्र यादव ने अदालत में एक बुजुर्ग महिला को पेश किया और दावा किया कि चुनाव आयोग ने उन्हें “मृत” घोषित कर मतदाता सूची से नाम हटा दिया है. उनके अनुसार, यह बिहार में SIR के तहत बड़े पैमाने पर हो रही गड़बड़ियों का जीता-जागता उदाहरण है.
SIR पर उठाए सवाल
योगेंद्र यादव ने अदालत से कहा कि SIR प्रक्रिया के चलते बिहार में 65 लाख से अधिक लोग प्रभावित हुए हैं. उन्होंने इसे केवल क्रियान्वयन की विफलता नहीं बल्कि डिज़ाइन-स्तर पर बहिष्करण को बढ़ावा देने वाला बताया. उनका कहना था कि SIR पूर्णता, सटीकता और समानता तीनों कसौटियों पर असफल रहा है. उन्होंने आंकड़े रखते हुए बताया कि भारत में वयस्क आबादी के हिसाब से मतदाता पंजीकरण की दर लगभग 99% है, जो दुनिया में सबसे अच्छी है, जबकि अमेरिका में यह दर 74% है. बिहार में पहले यह दर 97% थी, लेकिन SIR लागू होने के बाद यह घटकर 88% हो गई है और आगे और नाम हटने का खतरा है.
चुनाव आयोग ने योगेंद्र यादव की घटना को कहा ड्रामा
इस पर चुनाव आयोग के वकील ने तीखी आपत्ति जताई. उन्होंने कहा कि कोर्ट में ऐसे “नाटकीय प्रदर्शन” की गुंजाइश नहीं है. वकील ने तंज करते हुए कहा, “यह ड्रामा टीवी स्टूडियो में चल सकता है.” आयोग ने सुझाव दिया कि योगेंद्र यादव अदालत में लोगों को लाने के बजाय उनके आवेदन डिजिटल रूप से अपलोड कर दें, ताकि आयोग मामले की जांच कर सके.
सुप्रीम कोर्ट ने की योगेंद्र यादव की तारीफ
सुनवाई के अंत में सुप्रीम कोर्ट ने योगेंद्र यादव की दलीलों पर टिप्पणी करते हुए कहा, “हम आपकी बात से सहमत हों या न हों, लेकिन आपका विश्लेषण शानदार है.” यह टिप्पणी अदालत में मौजूद लोगों के लिए खासा अहम थी, क्योंकि इससे संकेत मिला कि भले ही अदालत अंतिम निर्णय पर न पहुंची हो, लेकिन तर्कों की गहराई को सराहा गया. फिलहाल, SIR को लेकर बहस तेज हो चुकी है. एक ओर चुनाव आयोग इसे मतदाता सूची को साफ-सुथरा और अद्यतन रखने की प्रक्रिया बता रहा है, तो दूसरी ओर विपक्षी दल, सामाजिक कार्यकर्ता और कई नागरिक इसे बड़े पैमाने पर मतदाता बहिष्करण का जरिया मान रहे हैं. सुप्रीम कोर्ट की अगली सुनवाई से पहले यह मामला राजनीतिक और कानूनी दोनों मोर्चों पर गरमाया रहेगा.

