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बिहार चुनाव में में जो साफ दिख रहा है, वह है बाहुबलियों का असर

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प्रशांत किशोर पत्रकार आरफा खानम शेरवानी को दिये साक्षात्कार, जो 31 अक्टूबर, 2025 को उनके यूट्यूब चैनल पर जारी हुआ है, बताते हैं कि बिहार की राजनीति में उनकी सक्रियता उनके अपने निर्णय से हुई है। उनके अनुसार उन्हें अब तक के जीवन में बहुत कुछ मिला और अब वह बिहार के लोगों के लिए कुछ करना चाहते हैं।

पिछले पांच सालों में उन्होंने जनसुराज पार्टी को रेखांकित करने वाले स्थान तक पहुंचा दिया है। हालांकि, इस दौरान उन पर भाजपा को अंदरखाने सहयोग करने का आरोप भी लगा है।

उन्होंने कुल 243 सीटों पर उम्मीदवार खड़ा किया जिसमें से तीन भाजपा की ओर चले गये। बाकी बचे 239 सीटों पर उन्होंने अन्य पार्टीयों की तुलना में सर्वाधिक 29 सीटें मुसलमानों को दी। यह आवैसी द्वारा घोषित बिहार चुनाव में उम्मीदवारों की संख्या से भी अधिक है। एक एकल समुदाय के तौर पर सामान्य वर्ग, जिसे सवर्ण वर्ग कहना अधिक उपयुक्त होगा अन्य समुदायों से सबसे ऊपर 86 उम्मीदवार के तौर पर खड़ा किया गया है।

प्रशांत किशोर का दावा है कि वह बिहार में भूमि सुधार को लागू करायेंगे और यहां बेहतर राजनीति का विकल्प प्रस्तुत करेंगे।

पिछले 20 सालों में नीतिश कुमार के नेतृत्व में भूमि सुधार, शिक्षा में सुधार, महिला सुरक्षा, नीचे तक विकास और मध्य वर्ग के लिए बेहतर सुविधा का दावा लालू यादव के ‘अराजक राज’ के बरक्स किया जाता रहा है।

लेकिन, आंकड़े और गर्द जमी फाइलें इस बात की ताकीद नहीं करती हैं। बिहार के आर्थिक और सामाजिक व्यवस्था और उसके संकट के जाने-माने अर्थशास्त्रीयों के साथ लंबी मीटिंगों और अंततः डी.बंदोपाध्याय कमेटी की रीपोर्ट, जिसमें भूमि सुधार की स्पष्ट संस्तुति की गई थी, हमेशा के लिए किनारे कर दी गई। यही स्थिति प्रख्यात शिक्षाविद् अनिल सद्गोपाल द्वारा प्रस्तुत की गई शिक्षा में सुधार की संस्तुतियों को लेकर की गई।

लालू यादव के लंबे शासनकाल को ‘जंगल राज’ नाम दिया गया। इसके खत्म होने के साथ जंगल राज एक संज्ञा की तरह बन गया जिसके नाम पर आज भी, इस चुनाव में भी बिहार की जनता में डर पैदा किया जा रहा है।

इस जंगल राज के नाम पर इसके पहले के शासन काल को ऐसे भुला दिया जा रहा है मानो सारी समस्या की जड़ बस यही जंगल राज था। इसके ठीक पहले का शासन काल पर मुख्यतः कांग्रेस काबिज था। जिसे जंगल राज कहा जा रहा है वह इसी कांग्रेस पार्टी के सवर्ण वर्चस्व को तोड़ते हुए आया था। इस जंगल राज के आने तक तक बिहार की राजनीति में भाजपा का अस्तित्व कांग्रेस के साथ मिलकर ही था।

यहां इतिहास में इस बात को जरूर खंगालते हुए चलना चाहिए कि आरएसएस और उसके घटक संगठन 1970 के दशक में समाज में बन रहे नये ध्रुवीकरण में सबसे पतित समूहों को गोलबंद करने के साथ-साथ गांधीवादी समाजवादियों की पीठ पर सवार होने का रास्ता लिया। जेपी के नेतृत्व में इंदिरा गांधी के शासन के विरूद्ध हुई गोलबंदी में आरएसएस ने एक बड़ी भूमिका अदा किया।

बाद के इतिहास ने इसे और भी खोलकर सामने रख दिया जब इस दौरान पैदा होने वाले अधिकांश समाजवादियों और उनके दलों ने खुलकर भाजपा का साथ दिया। इसमें एकमात्र अपवाद लालू यादव रहे जो भाजपा के विरोधी बने रहे।

लेकिन, सच्चाई यह भी है कि बिहार में चाहे जैसे भी समाजवादी रहे हों उन्होंने न तो जमींदारों, भूमाफियाओं, कोयला माफियाओं और बाहुबलियों को चुनौती दिया और न ही इनकी आधारभूमि को खिसकाने का कोई काम किया। बल्कि, इसके उलट उन्होंने इन्हें अपने साथ लिया और उनके बचाव और विकास के लिए दूसरे रास्ते खोल दिये। इन्होंने भूमि सुधार को हमेशा के लिए ठंडे बस्ते में डाल दिया और शिक्षा को तेजी से कोचिंग संस्थानों में बदल दिया। कांग्रेस ने वोट की राजनीति में जिस श्रेणीबद्धता महाराजाधिराज, राज, महासामंत, सामंत, कारिंदा, प्रजा की व्यवस्था को बनाकर रखता था, वह टूट गया।

लेकिन, यह भी सच है कि भाजपा को केंद्र के स्तर पर उभरकर आने के बाद भी बिहार में उसे उपयुक्त जमीन नहीं मिल सकी। जैसा उसे उत्तर-प्रदेश की राजनीति में मिला। इसका सबसे बड़ा कारण उत्तर-प्रदेश में लगभग सभी समाजवादियों ने और बहुजन राजनीति की अगुवा मायावती ने भाजपा का दामन थाम लिया। बिहार में लालू यादव अपने सामाजिक आधार पर उनके लिए एक बाधा बनकर खड़े रहे। इस दौरान नीतिश कुमार भले ही भाजपा के साथ गये, वह अपनी पार्टी का भाजपाकरण करने में बाधा बने रहे। लेकिन, पिछले पांच सालों भाजपा ने न सिर्फ उनकी पार्टी में घुसपैठ करने में सफलता हासिल किया है, उनकी आधारभूमि में भी हस्तक्षेप किया है।

इन सारी कवायदों के बीच ओवैसी की बिहार की राजनीति में लगातार हस्तक्षेप बढ़ता रहा। आरएसएस और भाजपा की राजनीति जितना ही मुसलमानों में असुरक्षा का भाव बढ़ा रही थी, बिहार की राजनीति में आवैसी का प्रभाव भी बढ़ रहा था।

लेकिन, इस बार बिहार के चुनाव के परिदृश्य में कम सुनाई दे रहे हैं। इस बार प्रशांत किशोर की आवाज अधिक सुनाई दे रही है। उनका उभार पिछले चंद सालों के भीतर हुआ है। वह अपने जनसुराज के अभियान के दौरान जनता को दिये भाषणों में अक्सर कहते सुनाई दे रहे थे कि आप अपने लिए, अपने बच्चों के लिए लड़ो, उसके लिए वोट दो। वह खुद के मुख्यमंत्री होने का दावा नहीं कर रहे थे।

आरफा खानम शेरवानी को दिये साक्षात्कार में वे साफ कहते हैं कि मैंने बहुत पैसा कमा लिया और और भी कमा सकता हूं/ लेकिन, मुझे अब बिहार के लिए करना है। वह एक मसीहाई अंदाज में बात करते हुए दिख रहे हैं।

बिहार के इस चुनाव में करोड़ों लोगों को रोजगार देने का वादा सिर्फ इन पार्टियों की हताशा को ही नहीं दिखा रहा है। यह बिहार की उस सच्चाई को दिखा रहा है जिसमें बिहार का पूरा सामाजिक ताना-बाना टूटकर बिखरता सा लग रहा है।

पलायन सिर्फ आर्थिक हालात को ही नहीं बता रहे हैं, ये वहां के बिखर रहे परिवारों को बता रहे हैं। हर परिवार से एक सदस्य को नौकरी देने का वादा परिवारों की जिंदगी को फिर से वापस करने के वायदों में बदल रहा है। लेकिन, भाजपा का राग अब भी कहीं और है।

भारत में जिस तरह की विकास की आर्थिक नीतियां अपनाई गई उसका सबसे गहरा असर बिहार पर पड़ा है। इन नीतियों के चलते बिहार की सिर्फ आर्थिक संरचना ही तबाह नहीं हुई है, वहां का पूरा सामाजिक तानाबाना चरमरा गया है।

श्रम करते हुए और बेरोजगारी की गहरी हताशा में भोजपूरी के अश्लील पाॅप गीत अपनी तेज धुनों भले ही राहत देते हों, छठ मैया के गीत भले ही गांव के तालों, पोखरों और नदियों की पवित्र यादों को जिंदा कर उन्हें रूला देते हों, उनकी सांस्कृतिक जिंदगी दोयम दर्जें में बदलती जा रही है।

इस चुनाव में भी बिहार की आर्थिक संरचना, शिक्षा और सामाजिक बदलाव को लाने से संबंधित न तो किसी आयोग की रिपोर्ट को लागू करने का वादा दिख रहा है और न ही इस संदर्भ में किसी बड़े बदलाव का वादा किया जा रहा है। जो वादे किये जा रहे हैं उसकी कोई आधारभूमि नहीं दिख रही है।

लेकिन, इस चुनाव में जो साफ दिख रहा है, वह है बाहुबलियों का असर। ऐसा लग रहा है कि आने वाले समय में ये बाहुबली राजनीति के एक नये ध्रुवीकरण का आधार बनेंगे। यह निश्चित ही तबाह होते बिहार के लिए एक चुनौती होंगे और उनकी पकड़ सामाजिक अस्थिरता को और भी बढ़ाने की ओर ले जाएंगे। जनवाद आधारित राजनीति के चिंतकों को निश्चत ही इस ओर देखना होगा और उनके प्रभाव का परखना होगा। 

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