सुप्रीम कोर्ट ने आईटी कानून के सेक्शन 66A ) के लगातार इस्तेमाल पर ‘हैरानी’ और ‘नाराजगी’ जताई है. कोर्ट ने 2015 में एक ऐतिहासिक फैसले में इस सेक्शन को रद्द कर दिया था. इस सेक्शन के तहत पुलिस ऑनलाइन ‘आपत्तिजनक’ कंटेंट पोस्ट करने वाले लोगों को गिरफ्तार कर सकती थी.
जस्टिस रोहिंटन नरीमन, केएम जोसेफ और बीआर गवई की बेंच ने कहा, “ये चौंकाने वाला है. हम नोटिस जारी करेंगे.”
NGO पीपल यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर मांग की थी कि केंद्र को निर्देश दिया जाए. याचिका में कहा गया कि केंद्र को सभी पुलिस स्टेशनों को बताना चाहिए कि सेक्शन 66A के तहत FIR नहीं करनी है.
जब सुप्रीम कोर्ट को बताया गया कि आईटी कानून के इस सेक्शन के तहत 1000 से ज्यादा केस दर्ज हुए हैं, तो जस्टिस नरीमन ने कहा, “गजब है! जो चल रहा है वो भयावह है.”
सुप्रीम कोर्ट ने 24 मार्च 2015 को इस सेक्शन को ‘अस्पष्ट’, ‘असंवैधानिक’ और ‘बोलने की आजादी का उल्लंघन’ करार देते हुए रद्द कर दिया था.
सेक्शन रद्द होने के बाद बढ़े केस?
याचिकाकर्ता की तरफ से वरिष्ठ वकील संजय पारिख ने कोर्ट से कहा कि ‘सेक्शन 66A के रद्द होने से पहले 11 राज्यों में 229 मामले थे, जबकि उसके बाद से आंकड़ा 1307 हो गया है और 570 अभी भी पेंडिंग है.’पारिख ने कहा, “लोग परेशान हो रहे हैं. केंद्र सभी FIR और सक्रिय जांच का डेटा इकट्ठा करे और वो केस भी देखे जाएं जो अभी पेंडिंग है.”केंद्र की तरफ से अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल ने कहा, “डिवीजन बेंच से रद्द होने के बाद भी सेक्शन 66A मौजूद है. जब पुलिस को केस दर्ज करना होता है तो मौजूद है, सिर्फ एक फुटनोट लिखा जाता है कि सुप्रीम कोर्ट ने इसे रद्द कर दिया है. 66A के साथ एक ब्रैकेट में ‘रद्द है’ लिखा जाना होता है.”कोर्ट ने केंद्र को जवाब देने के लिए दो हफ्तों का समय दिया है.

