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इख्तिलाफ़ की नहीं, मोहब्बत की जरूरत है

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शब-ए-बारात की रात दरगाह नाहरशाह वली के बरामदे में जलसा था, हम भी दोस्तों के साथ पहुंच गए, सुना था सय्यद नजीब हैदर मियां भी तशरीफ लाएंगे। प्रोग्राम शुरू हो चुका था, लेकिन जिसके भी हाथ में माइक आ रहा था, वो या तो नम्बरों की बात कर रहा था या ईको साउंड के साथ नात शरीफ पढ़ रहा था, अब ईको साउंड में कुछ लफ्ज समझ आ रहे थे, तो कुछ सिर से जा रहे थे। हजरत के आने का वृक्त किसी ने साढ़े ग्यारह-बारह का बताया था। इसलिए दूसरों के हाथों में माइक पसंद भी नहीं आ रहा था। खैर शुक्र है, हजरत तशरीफ ले आए और जल्द ही माइक भी उनके हाथ में आ गया और जलसागाह का माहौल ही बदल गया। जैसे ही उन्होंने बातें करना शुरू कीं तो अहमद फराज का शेर याद आ गया

सुना है बोले तो बातों से फूल झड़ते हैं

ये बात है तो चलो बात कर के देखते हैं

आज के दौर में यही बात-चीत अवाम को बुजुर्गों, ओलमाओं के करीब लाने के लिए जरूरी है।

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उन्होंने मौजूदा वक्त की नब्ज पर हाथ रखते हुए अपने ही खेमों को दुरुस्त करने की नसीहत के साथ कहा कि हम मसलके आला हजरत का नारा लगा रहे हैं, हमारे जलसों में जोर-शोर से ये नारा बुलन्द किया जा रहा है, लेकिन क्या हमने इस नारे का मतलब भी समझा है, नारा लगाने वाले वालदेन की नाफरमानी कर रहे हैं, गुस्ताखी और बे-अदबी कर रहे हैं, ये काबिले माफी नहीं है। पीर की खिदमत, अकीदतो मोहब्बत करना ठीक है ये आपकी मोहब्बत है, लेकिन सच ये है कि हमें इसकी जरूरत नहीं, अगर हाथ पैर चूमना ही है, तो अपने मां-बाप के चूमो। फिर फार्मूला भी बता दिया कि मुसीबत आती है, तो वुजू करते हो, पीर के चेहरे को देखते हो, उनसे परेशानी बयां करते हो, उम्मीद करते हो मुसीबत खत्म हो जाए। लेकिन अगर उसी तरह वुजू करके मां के चेहरे को देखो, उनके पैरों को दबाना और कहना अम्मी फलां मुसीबत में मुबतिला हूं, कारोबार में नुकसान का अंदेशा लग रहा है, फिर देखना उनकी दुआ से नुकसान नहीं होगा। उन्होंने

वाल्देन की अजमत के साथ-साथ

मस्जिदों के इमामों और मदरसों को

मजबूत करने की बात कही। बताया कि मदरसे मजबूत रहेंगे, तो मस्जिदें कायम रहेंगी। मदरसे दीन के किले हैं, जो मुसाफा अपने पीर से करते हो, नजराना देते हो वो अपनी मस्जिद के इमामों से करो, ताकि वो मजबूत हो सकें। नौजवानों के सोशल मीडिया की तरफ जाने पर उन्होंने कहा कि आज का नौजवान किसी भी दीनी मसले का हल जानने के लिए ओलमाओं के पास नहीं जाता, बल्कि सोशल मीडिया पर तलाश करता हैं, न जाने कौन-कौन से फर्जी मौलानाओं से सोशल मीडिया भरा पड़ा है और ये कौम उसी से मसले तलाश रही है, वो सही है या

मामे आज़म क

नहीं इसकी कोई जानकारी इनको नहीं है, इसलिए कहते हैं कि कोई मसला पेश आए तो अपने ओलमाओं के पास जाकर बात करो, सोशल मीडिया पर तलाश मत करो। नाराजगी तो नशा करने वाले नौजवानों से भी थी, जो उनकी बातों से साफ नजर आ रही थी। बोल रहे थे आज का नौजवान हर तरह का नशा करता है और नारे लगाता मस्लके आला हजरत जिन्दाबाद… बताओ.. ये कौनसा मसलक है। ये नशा जो तुम कर रहे हो, ये तुम्हारे बदन को कमजोर कर रहा है, तोड़ रहा है। मोबाइल भी कम नुकसान नहीं कर रहा है। एक ही घर में माँ-बाप, बच्चे अपने अपने मोबाइल में लगे हैं आपस में

कोई बात नहीं कर रहा है। कोई बुजूर्ग मेहमान आ जाए तो उसे लगता है कि शायद किसी मय्यत वाले घर आ गया, जहां सब चुप बैठे हैं। रिश्तों को मजबूती और कद्र पर जोर देते हुए बोले आज थोड़े सी जमीन-जायदाद के लिए आपस में लड़ाई हो रही है, बच्चे चाचा पर हाथ उठा रहे हैं और फिर मसलके आला हजरत जिन्दाबाद का नारा भी लगाते हैं, ये नारा लगाने की जरूरत ही नहीं है अगर तुम्हें रिश्तों की कद्र न हो। उनकी बातों में जमीन के सौदागरों के लिए भी नसीहत थी बोले सौदा करके धोखा मत दिया को, बयाना ले लिया, 6 महीने बाद भाव बढ़ गए तो नियत खराब कर ली या तो दूसरे को ज्यादा में बेचेंगे और सौदा कैसिल कर देंगे। ये जाइज नहीं है। जबान की कीमत को समझो। जो किस्मत में है, वो मिलेगा।

उन्होंने सिलसिलों पर बात करते हुए कहा कि आज खानकाहों के नाम पर एक दूसरे से खिंचतान चल रही है, जिस पीर से मुरीद हो, उसे मजबूती से पकड़े, अपने पीर को छोड़ो मत, दूसरे को छेड़ो मत। इखतिलाफ़ का जमाना नहीं है,

मोहब्बत की जरूरत है। जो काम कररहा है, उसका साथ दो, नहीं दे सकते, तो जो काम कर रहे हैं, उन्हें मुस्कुरा कर देख लो, ये भी काफी है। पहले इस्लाह के लिए दो जगह हुआ करती थीं। एक मदरसे, दूसरी खानकाहें। मदरसे में जब जबानें सीधी कर दी जाती थी, तो फिर खानकाहों में दिल सीधे किए जाते थे। पहले के पीरों की नजरें सीने पर दिल की तरफ होती थीं, आज के पीरों की नजरें भी वहीं होती हैं लेकिन जेब पर। जैसा मुसाफा करोगा, वैसा पीर का भी होगा। उन्होंने क्रिकेट के जरिए वतन से मोहब्बत का पैगाम देते हुए कहा कि जब आप मैच देखते हैं, वर्ल्ड कप हो या कोई सा भी मैच, तो दुआ करो अल्लाह हिन्दुस्तान को जीत अता फरमाए, ट्राफी लेकर आए और जीत पर खुशी का इजहार भी करो। क्योंकि ये मुल्क गरीब नवाज का है, हजरत निजामुद्दीन, कुतुबुद्दीन बख्तियार काकी, नाहरशाह वली जैसे कई बुजुर्गों का है। इसकी मिट्टी से मोहब्बत करो, इसके चप्पे-चप्पे से मुहब्बत करो, इसके गांव-गांव, शहर-शहर से मोहब्बत करो। बुजुर्ग फरमाते हैं मुल्क की मोहब्बत ईमान का हिस्सा है।

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