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क‍ितना तेज हो साउंड, क्‍या है सुप्रीम कोर्ट का वह आदेश जिसका हवाला दे रहे राज ठाकरे?

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मुंबई: लाउडस्‍पीकर ) पर बवाल दिन ब दिन लाउड ही हो जाता रहा। महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (MNS) के अध्‍यक्ष राज ठाकरे  ने ऐलान किया था क‍ि बुधवार 4 मई को मनसे कार्यकर्ता हर मस्‍जिद के सामने उससे दोगुनी आवाज पर हनुमान चालीसा का पाठ करेंगे। कई जगह ऐसा किया भी गया। सैकड़ों मनसे कार्यकताओं को ह‍िरासत में ले लिया गया। इसके बाद राज ठाकरे ने प्रेस कॉन्‍फ्रेंस की और सरकार को चेतावनी के देते हुए कहा क‍ि जब तक मस्‍जिदों से लाउडस्‍पीकर पर अजान दी जाएगी तब तक दोगुनी आवाज में हनुमान चालीसा को पाठ करेंगे।

राज ठाकरे ने अपनी पीसी के दौरान कहा क‍ि धर्म व्‍यक्‍तिगत मुद्दा है। ये सबके घर में रहना चाह‍िए। सुप्रीम कोर्ट के आदेश में 45 से 55 डेसिबल (Decibel) तक की आवाज की ही छूट है। यानी हम अपने घर में जो मिक्‍सर चलाते हैं, बस उतनी आवाज की ही छूट है। इस आदेश पर मुंबई पुलिस ने क्‍या किया? आख‍िर सुप्रीम कोर्ट उस आदेश में क्‍या लिखा है जिसका हवाला राज ठाकरे बार-बार दे रहे?

पहले आसान भाषा में डेसिबल को समझ लेते हैं
ध्वनि की मात्रा को मापने की यूनिट को डेसिबल (dB) कहते हैं। ज्‍यादा आवाज मतलब ज्‍यादा डेसिबल। कई रिपोर्ट में दावा किया जाता है क‍ि अच्छी नींद के लिए आसपास रहने वाला शोर 35 डेसिबल से ज्यादा ना हो और दिन के समय 45 डेसिबल तक ही हो। इससे ज्‍यादा होने पर स्‍वास्‍थ्‍य पर असर पड़ता है।

डेसिबल स्‍केल
मोटर कार, बस, मोटर साइकिल, स्कूटर, ट्रक आद‍ि का साउंड लेवल लगभग 90 डेसिबल त‍क होता है। इसी तरह सायरन की साउंड लेवल 150 डेसिबल तक होता है। जब हम किसी के कान में बात करते हैं तब आवाज का लेवल लगभग 20 डेसिबल होता है। मंदिर और मस्‍जिद में लगे लाउडस्पीकर की आवाज का स्‍तर लगभग 100 से 120 डेसिबल तक होता है। पटाखे लगभग 100 से 110 डेसिबल आवाज पैदा करते हैं। फ्रिज से आने वाली आवाज 40 डेसिबल होती है। डॉक्‍टर कहते हैं क‍ि 85 डेसिबल से ज्‍यादा आवाज आपको बहरा बना सकता है।

सुप्रीम कोर्ट के आदेश की कॉपी जिसमें कहा गया क‍ि आवाज से किसी को परेशानी नहीं होनी चाहिए।
कितना लाउड हो स्‍पीकर, क्‍या है सुप्रीम कोर्ट का आदेश?
लाउडस्‍पीकर की आवाज को लेकर सुप्रीम कोर्ट के दो आदेश हैं। पहला आदेश 18 जुलाई 2005 का है तो दूसरा 28 अक्‍टूबर 2005 का। ध्वनि प्रदूषण पर सुप्रीम कोर्ट का सबसे अहम फैसला 18 जुलाई, 2005 का है जिसमें कोर्ट ने कहा था कि हर व्यक्ति को शांति से रहने का अधिकार है और यह अधिकार जीवन के मौलिक अधिकार का हिस्सा है।

लाउडस्पीकर या तेज आवाज में अपनी बात कहना अभिव्यक्ति की आजादी के अधिकार में आता है, लेकिन अभिव्यक्ति की आजादी जीवन के अधिकार से ऊपर नहीं हो सकती। कोर्ट ने आगे कहा क‍ि किसी को इतना शोर करने का अधिकार नहीं है जो उसके घर से बाहर जाकर पड़ोसियों और अन्य लोगों के लिए परेशानी पैदा करे। कोर्ट ने कहा था कि शोर करने वाले अक्सर अनुच्छेद 19(1)ए में मिली अभिव्यक्ति की आजादी के अधिकार की शरण लेते हैं। लेकिन कोई भी व्यक्ति लाउडस्पीकर चालू कर इस अधिकार का दावा नहीं कर सकता।

सुप्रीम कोर्ट के आदेश की कॉपी जिसमें साउंड सीमा का जिक्र है।
अक्टूबर 2005 वाले फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि त्योहारों के मौके पर आधी रात तक लाउडस्पीकर बजाए जा सकते हैं। लेकिन ऐसा एक साल में 15 दिन से ज्‍यादा नहीं हो सकता। तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश आरसी लाहोटी और न्यायमूर्ति अशोक भान की पीठ ने एक वैधानिक नियम की संवैधानिक वैधता को बरकरार रखा। इसी आदेश में यह भी कहा गया था क‍ि लाउडस्पीकर या ऐसी कोई आवाज करने वाली चीज रात 10.00 बजे से सुबह 6.00 बजे के बीच बंद रहेगी। फिर वाहे वह सभागार, सम्मेलन कक्ष, सामुदायिक हॉल और बैंक्वेट हॉल हो।

18 जुलाई 2005 को आदेश में सुप्रीम कोर्ट ने आवाज को लेकर कुछ मानक तय किये। कोर्ट ने आदेश दिया था कि सार्वजनिक स्थल पर लगे लाउडस्पीकर की आवाज उस क्षेत्र के लिए तय शोर के मानकों से 10 डेसिबल (ए) से ज्यादा नहीं होगी या फिर 75 डेसिबल (ए) से ज्यादा नहीं होगी, इनमें से जो भी कम होगा वही लागू माना जाएगा। जहां भी तय मानकों का उल्लंघन हो, वहां लाउडस्पीकर व उपकरण जब्त करने के बारे में राज्य प्रविधन करे।

कोर्ट के आदेश के अनुसार सार्वजनिक या निजी संपत्ति पर आवाज करने वाले कोई भी इलेक्ट्रॉनिक उपकरण की आवाज 55 डेसिबल होगी तभी उसे चलाने की अनुमति राज्‍य सरकार दे सकती है। जिस तरह के लाउडस्पीकर मंदिरों और मस्जिदों में लगे होते हैं, उनसे करीब 100 से 120 डेसिबल साउंड पैदा होता है जो सीधा-सीधा सुप्रीम कोर्ट के आदेश का उल्‍लंघन है।
अगर कहीं निर्माण कार्य हो रहा है तो 75 डेसिबल से अधिक तक के शोर को अनुमति दी सकती है। विस्फोटक पर डेसिबल का उल्‍लेख करना जरूरी है। सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में कहा क‍ि बॉक्‍स पर यह लिखा हो क‍ि इसके अंदर का पटाखा क‍ितना ध्‍वनि प्रदूषण करेगा।

क्या कहता है कानून
देश में ते आवाज को लेकर कानून भी है। इसे वर्ष 2000 में बनाया गया और नाम दिया गया बने ध्वनि प्रदूषण (अधिनियम और नियंत्रण)। कानून की पांचवीं धारा लाउडस्पीकर्स और सार्वजनिक स्थानों पर आवाज के स्तर को लेकर बात करता है। इसके साफ-साफ कहा गया है क‍ि किसी भी सार्वजनिक स्‍थान पर आवाज वाले आयोजन के लिए प्रशासन से लिख‍ित मंजूरी लेनी होगी। इसके अलावा रात 10 से सुबह 6 बजे के बीच लाउडस्पीक नहीं बजा सकते। निजी और सार्वजनिक जगहों पर लाउडस्पीकर के आवाज की सीमा 10 और 5 डेसिबल से अधिक नहीं होनी चाहिए।

इसी तरह वह जगह जहां आबादी रहती है, वहां साउंड की सीमा सुबह 6 बजे से रात 10 बजे तक 55 डेसिबल तो रात 10 बजे से सुबह 6 बजे तक 45 डेसिबल तक ही होना चाह‍िए। व्यावसायिक क्षेत्र में ज्‍यादा से ज्‍यादा 65 से 75 डेसिबल तक साउंड हो सकता है। अगर इस कानून का पालन न किया जाये तो कानून में पांच साल तक की जेल या एक लाख रुपये तक के जुर्माने का भी प्रावधान किया गया है। देश के अलग-अलग राज्यों ने क्षेत्रों के अनुसार साउंड की सीम तय कर रखी है। लेकिन कहीं भी ये सीमा 70 डेसिबल से अधिक नहीं है।

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