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नीतीश सरकार में 70 हजार करोड़ कहां हुआ गायब?

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बिहार की वित्तीय व्यवस्था में बड़े पैमाने पर अनियमितताओं का खुलासा करने वाली नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) की रिपोर्ट 2023-24 को लेकर पटना हाईकोर्ट में चल रही जनहित याचिका में नया मोड़ पिछले 20 जनवरी को तब सामने आया जब कोर्ट ने राज्य सरकार से पूछा है कि 70,877.61 करोड़ रपये की सार्वजनिक धनराशि का इस्तेमाल कहां और कैसे हुआ? जबकि 49,649 उपयोगिता प्रमाण पत्र अब तक लंबित हैं। यह मामला राज्य की पारदर्शिता और जवाबदेही पर बड़ा सवाल खड़ा कर रहा है? 

कोर्ट ने सरकार को इस पर पूरी जानकारी 20 मार्च को देने तारीख तय किया है।

याचिकाकर्ता के सीनियर एडवोकेट का कहना है कि भले ही यह मामला अधिकारियों के पास बहुत पहले से पेंडिंग है और रकम बहुत ज़्यादा है और इसमें गबन, गलत इस्तेमाल और बॉन्ड के डायवर्जन का आरोप है, फिर भी राज्य को इस मामले को तेज़ी से निपटाना चाहिए था। 

एडवोकेट जनरल ने सप्लीमेंट्री काउंटर एफिडेविट में ऊपर बताए गए पैराग्राफ की ओर इशारा करते हुए, जो सीडब्ल्यूजेसी नंबर 16681 ऑफ़ 2019 में फाइल किया गया था, कहा कि चूंकि 18687.98 करोड़ रुपये के यूटिलाइज़ेशन सर्टिफिकेट 1 जनवरी 2024 से 30 अप्रैल 2024 के बीच एडजस्ट किए गए हैं और 30 अप्रैल 2024 तक 72135.17 करोड़ रुपये के यूटिलाइज़ेशन सर्टिफिकेट अभी राज्य सरकार के पास पेंडिंग हैं और इस बीच, दो साल से ज़्यादा समय बीत चुका है, उन्हें लेटेस्ट स्थिति के बारे में निर्देश प्राप्त करने के लिए कुछ समय दिया जा सकता है।

इन सब बातों को ध्यान में रखते हुए, इस मामले को 20 मार्च को लिस्ट करें।

बताते चलें कि नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) की रिपोर्ट, जो जुलाई 2025 में बिहार विधानसभा में पेश की गई थी, ने राज्य की वित्तीय प्रबंधन में गंभीर लापरवाही उजागर की है। रिपोर्ट के मुताबिक, 31 मार्च 2024 तक 49,649 UCS लंबित थे, जो कुल 70,877.61 करोड़ रुपये से जुड़े हैं। इनमें से 14,452.38 करोड़ रुपये 2016-17 से पहले के हैं।

“एकीकृत कंप्यूटिंग प्रणाली” (यूसीएस) वे दस्तावेज हैं जो साबित करते हैं कि केंद्र या राज्य द्वारा जारी फंड्स का उपयोग योजनाओं (जैसे मनरेगा, शिक्षा, ग्रामीण विकास) के लिए ही हुआ।  

रिपोर्ट में साफ कहा गया है कि “यूसीएस न होने से फंड्स के दुरुपयोग, गबन या हेराफेरी का खतरा बढ़ जाता है।”

बताना जरूरी हो जाता है कि सबसे ज्यादा लंबित यूसीएस वाले विभाग हैं जहां, पंचायती राज विभाग – 28,154.10 करोड़, शिक्षा विभाग-12,623.67 करोड़, शहरी विकास विभाग-11,065.50 करोड़, ग्रामीण विकास विभाग-7,800.48 करोड़, कृषि विभाग – 2,107.63 करोड़ की राशि लंबित है।

विपक्षी दलों ने इसे “70 हजार करोड़ का घोटाला” करार दिया है, जबकि सरकार इसे “सामान्य लेखा प्रक्रिया में देरी” बताती है।

नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक ने यह भी चेतावनी दी है कि ऐसी लापरवाही से राज्य की वित्तीय स्वास्थ्य पर असर पड़ सकता है, जहां बजट का 80% ही खर्च हो पाया।

इसे लेकर याचिकाकर्ता देवव्रत कुमार साहनी द्वारा एक जनहित याचिका सिविल रिट ज्यूरिस्डिक्शन केस नंबर 16491/2025 के तहत दायर की गई है, जहां याचिकाकर्ता ने कैग रिपोर्ट का हवाला देकर स्वतंत्र जांच की मांग की है।

वहीं एक और याचिकाकर्ता किशोर कुमार ने उक्त मामले को लेकर जनहित याचिका दायर की है। उक्त याचिकाकर्ता के मुताबिक सरकार के विभागों ने 49,649 उपयोगिता प्रमाणपत्र जमा नहीं किए हैं। जिसके आलोक में अदालत ने बिहार सरकार को इस बारे में विस्तृत जानकारी पेश करने के निर्देश दिए हैं। कोर्ट ने सरकार से फंड्स के खर्च का पूरा हिसाब-किताब मांगा है। 

बता दें कि 12 जनवरी 2026 के आदेश में मुख्य न्यायाधीश संगम कुमार साहू और न्यायमूर्ति सुधीर सिंह की बेंच ने दोनों पक्षों की प्रार्थना पर मामले को 20 जनवरी 2026 को सूचीबद्ध किया था। अतः 20 जनवरी की सुनवाई में कोर्ट ने सरकार को सख्त निर्देश दिए कि लंबित यूसीएसपर स्पष्ट जवाब दें, क्योंकि इससे वित्तीय पारदर्शिता कमजोर हो रही है।

याचिकाकर्ता देवव्रत कुमार साहनी के वकील मृत्युंजय कुमार ने तर्क दिया कि बिना यूसीएस के फंड्स का कोई आश्वासन नहीं है, जबकि सरकार की ओर से महाधिवक्ता पी.के. शाही और डॉ. आनंद कुमार ने कहा कि प्रक्रिया चल रही है। सुनवाई अभी जारी है और अगली तारीख जल्द तय हो सकती है। 

मामले पर विशेषज्ञों का कहना है कि अगर कोर्ट CBI जांच का आदेश दे, तो यह बिहार की राजनीति में बड़ा उलटफेर ला सकता है।  

वहीं बिहार सरकार ने आरोपों को खारिज करते हुए कहा है कि कैग रिपोर्ट के बाद 51,750 करोड़ रुपये के यूसीएस क्लियर कर दिए गए हैं, और यह पिछले पांच सालों में सबसे कम पेंडेंसी है।

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने विधानसभा में कहा, “यह रूटीन प्रक्रिया है, कोई दुरुपयोग नहीं हुआ।” हालांकि, विपक्ष इसे बड़ा घोटाला बता रहा है।कांग्रेस और आरजेडी ने इसे “नीतीश-मोदी सरकार का 70 हजार करोड़ का घोटाला” बताया है। कांग्रेस नेता प्रीतम सिंह खेरा ने कहा है कि “विभागों ने 70 हजार करोड़ खर्च किए, लेकिन यूसीएस नहीं दिए—यह स्पष्ट गबन है।”

पूर्व उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव ने सोशल मीडिया पर लिखा कि “70 हजार करोड़ कहां गए? जनता का पैसा गायब, जवाबदेही शून्य।”

विपक्ष सीबीआई जांच की मांग कर रहा है, ताकि सच्चाई सामने आए।

इस मामले हाईकोर्ट से इसकी जांच केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) या किसी अन्य एजेंसी से कराए जाने की मांग की गई है। याचिका में यह सुझाव भी दिया गया है कि हाईकोर्ट के किसी मौजूदा या सेवानिवृत्त जज की अध्यक्षता में एक विशेष टीम गठित की जाए। यह टीम इस घोटाले की जांच करे।

पटना हाईकोर्ट ने राज्य सरकार से इस मामले में जवाब मांगा है। अदालत ने कहा है कि इतनी बड़ी तादाद में उपयोगिता प्रमाणपत्रों का लंबित होना वित्तीय अनुशासन का उल्लंघन है। हाईकोर्ट इस मामले पर दो महीने बाद सुनवाई करेगा।

नियंत्रक व महालेखा परीक्षक (कैग) की रिपोर्ट के अनुसार, बिहार की विकास दर के साथ-साथ राज्य की देनदारियां भी बढ़ी हैं। वर्ष 2023-24 में राज्य की कुल देनदारी 398560.98 करोड़ रुपये थी, जो पिछले साल की तुलना में 12.34% अधिक है। हालांकि, यह देनदारी निर्धारित सीमा के भीतर ही रही। फिर भी बिहार 15वें वित्त आयोग द्वारा तय किए गए लक्ष्यों को 2023-24 में पूरा नहीं कर पाया।

कैग के अनुसार सबसे चिंताजनक बात यह है कि समय पर उपयोगिता प्रमाण पत्र जमा नहीं किए गए। 31 मार्च 2024 तक, बिहार के महालेखाकार (लेखा और हकदारी) को 70877.61 करोड़ रुपये के उपयोगिता प्रमाण पत्र नहीं मिले थे। इसके अलावा, याद दिलाने के बावजूद, इस अवधि तक 9205.76 करोड़ रुपये के आकस्मिक विपत्र (डीसी बिल) भी उपलब्ध नहीं कराए गए। इनमें से 7120.02 करोड़ रुपये के बिल वित्तीय वर्ष 2022-23 से संबंधित हैं।

उपयोगिता प्रमाण पत्र से यह साबित होता है कि सरकारी धन का उपयोग उसी काम के लिए किया गया है जिसके लिए वह आवंटित किया गया था। जब ये प्रमाण पत्र जमा नहीं होते, तो यह समझना मुश्किल हो जाता है कि पैसा कहां खर्च हुआ।

दूसरी तरफ यह मामला बिहार की अर्थव्यवस्था पर सवाल उठा रहा है, जहां राज्य का बजट 3.26 लाख करोड़ था, लेकिन खर्च सिर्फ 2.60 लाख करोड़ हुआ।

विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसी अनियमितताएं निवेशकों का विश्वास कम कर सकती हैं और गरीबी-बेरोजगारी जैसे मुद्दों को बढ़ावा देगी। राजनीतिक रूप से, यह एनडीए सरकार के लिए चुनौती है।

बिहार के मुजफ्फरपुर जिले के आथर घाट निवासी देवव्रत कुमार साहनी बताते हैं कि मुजफ्फरपुर जैसे ग्रामीण इलाकों में जहां ग्रामीण विकास विभाग के यूसीएस सबसे ज्यादा लंबित हैं, स्थानीय लोग कहते हैं कि योजनाएं कागज पर ही चल रही हैं। यह राज्य के लिए सबसे बड़ा दुर्भाग्य है।

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