अग्नि आलोक

*कश्मीर में 5 दिन, अनुत्तरित सवालों का जवाब कौन देगा ?~ डॉ सुनीलम*

Share

    *कश्मीरियों को मुसलमान होने के कारण संदिग्ध माना जाता है- फारुक अब्दुल्ला* 

   पहलगाम में पर्यटकों  पर हुए आतंकी हमले में 27 नागरिकों के मारे जाने  के दौरान आदिल शाह हुसैन की हत्या ने षड्यंत्रकर्ताओं की साजिश को नाकाम कर दिया। पूरा देश  हिंदू- मुस्लिम ध्रुवीकरण के बजाय नरसंहार करने वालों के खिलाफ एकजुट दिखलाई दिया। सभी को लगा कि आदिल शाह हुसैन के परिवारजनों से मिलना चाहिए।

  तमाम लोगों का यह विश्लेषण था कि पर्यटकों की हत्या कश्मीर की अर्थव्यवस्था की रीढ़ कहे जाने वाले पर्यटन उद्योग को नष्ट करने के लिए की गई है। बात सही भी है क्योंकि पर्यटकों की संख्या  कुछ समय के लिए न्यूनतम तक सिमट गई थी । ऐसे समय में जब जम्मू कश्मीर में भय का वातावरण था तब समाजवादियों के तीन समूह कश्मीरियों के साथ एकजुटता  प्रदर्शित करने कश्मीर पहुंचे।

   हम सोच रहे थे कि आदिल शाह हुसैन  की वाहवाही केवल इंडिया में ही हो रही है। कश्मीर में जाकर देखा कि हर व्यक्ति आदिल शाह हुसैन की बात कर रहा था। आश्चर्यजनक तौर पर हम जब संदीप पांडेय जी द्वारा आयोजित ‘समाजवाद की पाठशाला’ में पहुंचे तब एक मुख्य वक्ता ने कहा कि श्रीनगर के तमाम लोगों में यह सहमति बन रही है कि श्रीनगर के लाल चौक का नाम बदलकर आदिल शाह हुसैन चौक रख दिया जाए।

    फारुख साहब के साथ लंबी बातचीत हुई। उन्होंने आम लोगों द्वारा पर्यटन उद्योग की चिंता को एक तरफ से खारिज करते हुए कहा कि हमारे पर्यटन उद्योग की चिंता बंद कर दीजिए केवल हमारे प्रति पैदा की जा रही नफरत को खत्म कराइए। दूसरी बात जो उन्होंने कही वह कई जगह बार-बार सुनने को मिलीं। ज्यादातर कश्मीरियों ने कहा कि पहलगाम में 26 हिंदुओं की हत्या के बाद हमने पूरी घाटी में एक भी हिंदू को खरोच तक नही आने दी लेकिन इंडिया वालों ने कश्मीरी छात्रों, शॉल बेचने वालों के साथ तमाम जगह दुर्व्यवहार किया। दुर्व्यवहार ही नहीं बल्कि मारपीट भी की। कश्मीरियों का दर्द है कि हमें कश्मीरी और मुसलमान होने के नाते संदिग्ध की नजर से देखा जाता है। आम कश्मीरी कहता है कि हम चाहते तो पाकिस्तान के साथ जा सकते थे लेकिन हमने भारत के साथ जुड़ना पसंद किया लेकिन आजादी के 76 वर्ष बाद भी आप हम पर भरोसा नहीं करते, आखिर क्यों? हमने ऐसा कौन सा काम किया जिससे आपको शिकायत है?

    तीसरा मुद्दा सीआरपीएफ की मनमानी का है।  कहने के लिए जम्मू कश्मीर में चुनी हुई सरकार है लेकिन कश्मीर में मुख्यमंत्री की नहीं, गवर्नर की तूती बोलती है। विशेषकर पुलिस के अधिकारी उनकी ही सुनते हैं। यह कहना गलत नहीं होगा कि जम्मू कश्मीर लोकतांत्रिक नहीं, पुलिस स्टेट है। यहां हर स्तर पर भ्रष्टाचार को संरक्षण देने वाला एक गिरोह काम कर रहा है, जिसे पुलिस द्वारा संरक्षण प्राप्त है। उसकी छोटी सी मिसाल यह है कि कश्मीर के एक जिले में 1000 एकड़ जमीन पर जो चरवाहे कई पीढ़ियों से अपनी भेड़ चराते थे उन्हें इस बार भेड़ चराने से रोक दिया गया। पता चला कि एक प्रभावशाली नेता के प्रभाव के चलते भेड़ चराने का अधिकार किसी दूसरे व्यक्ति को दे दिया गया है। कई पीढ़ियों से जिन्हें अधिकार था, उनकी सुनने वाला कोई नहीं है। उन पर मुकदमें लगा दिए गए हैं। अब वे अपने जेल जाने की चिंता से परेशान हैं। 

    कश्मीर में आप कहीं भी जाएंगे तो आपको यह शिकायत मिलेगी कि कश्मीर के हजारों युवा जेल में है। लेकिन सही गिनती किसी के पास भी नही है। गूगल के मुताबिक लगभग 325 व्यक्तियों पर यूएपीए लगाया गया है। केंद्र सरकार कश्मीर समस्या को हल करने के लिए हर दिशा में कार्य करने का दावा करती है लेकिन वास्तविकता यह है कि सरकार कश्मीर के आंदोलनकारियों से बात करने की बजाय उन्हें जेल में डालने के बहाने ढूंढते रहती है।

धारा 370 हटाए जाने को लेकर सभी कश्मीरी मानते हैं कि भारत ने हमारे साथ जो समझौता किया था वह अपनी तरफ से खत्म कर दिया। पहलगाम  को अधिकतर कश्मीरी पुलवामा की दृष्टि से ही देखते हैं। दोनों त्रासदियों से उठे अधिकतर सवाल आज भी अनुत्तरित हैं। 

कश्मीरियों पर दिल्ली की सरकार क्यों भरोसा  नहीं करती ?  क्यों दिल्ली अपनी मर्जी कश्मीरियों पर थोपती है ? क्यों दिल्ली ने जम्मू कश्मीर का राज्य का दर्जा समाप्त कर दिया ? क्यों  राज्य को बांट दिया गया ?  क्यों दिल्ली सरकार जम्मू कश्मीर में निष्पक्ष चुनाव नहीं होने देती ? 

क्यों जेलों में बंद, मुठभेड़ में मारे गए और लापता कश्मीरियों का लेखा जोखा सरकार जाहिर नहीं करती ? 

ऐसे तमाम सवाल हैं जिनका सरकार जवाब देने को तैयार नहीं है। कश्मीरी इन अनुत्तरित सवालों का जवाब चाहते हैं।

   कश्मीर की त्रासदी यह है कि हर भारतीय कश्मीर जाने की तमन्ना रखता है लेकिन कश्मीरी के दुख दर्द के प्रति संवेदनहीन है। आमतौर पर कश्मीर के बारे में जो जहर व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी द्वारा फैलाया जाता है, गोदी मीडिया द्वारा मुसलमानों के प्रति जो नफरत फैलाई जाती है, उसका असर हर भारतीयों के मानस पर बना रहता है। देश में यह कम लोग ही जानते हैं कि कश्मीर में ही देश के सबसे प्रभावकारी भूमि सुधार किए गए हैं। यही कारण है कि हर कश्मीरी के पास बहुत कम ही जमीन सही, वह भूमि स्वामी है । कश्मीर में भिखारी और बेघर लोग नहीं हैं। कश्मीर में भारत के अन्य राज्यों की तरह जातिगत भेदभाव न के बराबर है। कश्मीर में किसी भी राज्य की तुलना में महिलाएं सर्वाधिक सुरक्षित है। घर के बाहर भी और घर के अंदर भी।

     इस बार के कश्मीर दौरे की खासियत यह रही कि  5 दिनों में कहीं भी पुलिस ने नहीं रोका, कोई जांच पड़ताल नहीं हुई। श्रीनगर के लाल चौक पर 3 दिन मध्य रात्रि तक रहा, आश्चर्यजनक तौर पर कहीं पुलिस मुझे दिखाई नहीं दी। रात के 12 बजे तक लाल चौक पर रौनक दिखलाई देना कश्मीर की ऐसी तस्वीर दर्शाता है जिससे आप अपनी सुरक्षा के प्रति आश्वस्त हो सकते हैं। सबसे ज्यादा आश्चर्यजन यह था कि फारूक अब्दुल्ला जी के यहां हम 10 लोगों में से किसी की भी जांच पड़ताल नहीं हुई । फोन भी हमारे साथ ही रहा। 

हमे खुशी हुई आज भी कश्मीर में फारूक अब्दुल्ला जैसे कई नेता है जो लोगों से खुले तौर पर मिलते जुलते हैं।

आज जब मैं यह लेख लिख रहा हूं। तब डोडा जिले के डिप्टी कमिश्नर का 27 जून को  स्कूलों को जारी किया नोटिफिकेशन मेरी जानकारी में आया, जिसमें मिड डे मील में बच्चों को मांसाहारी भोजन देने पर रोक लगाई है। कश्मीर भर में इस नोटिफिकेशन को रद्द कराने की मांग को लेकर कल तमाम प्रदर्शन हुए हैं  । कश्मीरियों का कहना है कि हम शराब बंद कराना चाहते हैं लेकिन सरकार शराब बेचने और बिकवाने पर आमादा है। हम मांसाहारी है तो हमारे बच्चों को मांस खाने से सरकार रोक रही है।

यह निजता का अधिकार है कि व्यक्ति क्या खाए, क्या पहने क्या सुने ? किसमें आस्था रखे? 

 मुझे लगता है कि सरकारी अफसरों द्वारा इस तरह की कार्यवाही जानबूझकर कश्मीरियों को चिढ़ाने, उत्तेजित करने और परेशान करने की मंशा से लगातार की जाती है। ऐसे मुद्दे इसलिए खड़े किए जाते हैं ताकि लोग पुलवामा, पहलगाम, बेरोजगारी, पुलिस दमन, राज्य के दर्जे की बहाली, राज्य के विभाजन के बारे में कोई सवाल नहीं पूछे। कुल मिलाकर यह सब देश के लोगों का ध्यान असली मुद्दों की ओर से डाइवर्ट करने के लिए किया जाता है।

Exit mobile version