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*किसके आदेश से पुलिस ने राजबाड़ा पर उत्सव रोका?*

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_कभी बीआरटीएस, विजयनगर, भंवरकुआं इलाक़े ऐसे समय पर बंद करवा पाई खाकी?

 *_पब-बार-दारू की दुकानें समय पर बंद करवाने में दिखाओ न वर्दी का ज़ोर, देशप्रेम पर डंडे क्यों?_

 _अब इंदौर को अपने प्रभारी मंत्री सीएम डॉ मोहन यादव से ही आस, शहर के नेतृत्व से कोई उम्मीद नहीं_ 

 *_जन जन की राष्ट्रीय आस्था से जुड़े मुद्दे पर एक बार फ़िर चुने हुए नेताओ ने निभाया ‘ गूंगे गुड्डे-गुड़ियाओं ‘ का रोल, शर्मनाक_* 

 _याद हैं न, खजराना चौराहे पर कैसे पुलिस के सामने सत्तारूढ़ दल के ‘ आयातित मंत्री ‘ का गुर्गा मूंछ पर तांव दे रहा था और पुलिस टुकुर टुकुर देख रहीं थी? वह तो दूसरे दिन शहर ने धिक्कारा तो ख़ाकी की गैरत जागी और तीसरे दिन मंत्री के गुर्गे को सबक मिला। ऐसे ही नजारों से इंदौर की पुलिस आये दिन ‘ नए इंदौर ‘ में शर्मसार होती हैं। युवक तो ठीक, युवतियां ही जब तब पुलिस को हड़काकर फ़ुर्र हो जाती हैं, उसी नए इंदौर में औऱ वर्दियां कुछ कर नही पाती।_ 

 *_जो राजबाड़ा पर पुलिस आये दिन कर गुज़रती हैं, वह क़भी बीआरटीएस वाले शहरी हिस्से, विजयनगर-निपानिया-निरंजनपुर व भंवरकुआं इलाके में क्यों नही करती? शहर के इन हिस्से से तो आधी रात के बाद तक अराजकता का नग्न नृत्य होता हैं। यहां पुलिसिया ज़ोर क्या कमज़ोर हो जाता हैं? शहर को देशभर में शर्मसार करने वाले नज़ारे आज तक पुलिस रोक पाई यहां? राजबड़ा पर तो शहर के सबसे बड़े लोकपर्व रंगपंचमी पर भी पुलिस गेर के निपटते ही ऐसे ही जबरिया चौक ख़ाली करवा लेती हैं। ये काम नए इंदौर में क्यों नही करवा पाती पुलिस? जहां आये दिन सड़क पर उत्पात जारी हैं।_* 

 _राजबाड़ा यानी बरसों से इंदौर के सुख दुःख के साक्षी बनने वाले जनता चौक पर वक्त की पाबन्द बनती पुलिस, समय पर शहर के पब, बार और दारू की दुकानें करवा लेती हैं? इन पर वर्दी का ज़ोर क्यों नही चलता? ख़ाकी की ये जोर-जबर्दस्ती का मनोबल सिर्फ़ देश से जुड़े उत्सव-उल्लास और परम्पराओ से जुड़े पर्वों पर ही क्यों प्रकट होता हैं? कभी गरबे बंद कराने सदलबल पहुँच जाती है तो कभी भजन संध्या।_ 

 *_वह तो पुराना इंदौर हैं ‘ साहिब ‘ , जो हर बार आपकी मनमानी पर आपका मान रख लेता हैं। राजबाड़ा हैं न, इन्दौरी संस्कार को जीता हैं। आज भी आंख की शर्म करता हैं। बड़े-बूढ़ो का सम्मान करता हैं। नए इंदौर में तो आपकी कॉलर तक पकड़ ली जाती हैं और आप कुछ कर ही नही पाते। क्यों उधर क्या रसूखदारों से सामना होता है इसलिए जोर नही चलता। इस तरफ़ पुराने शहर में आम इन्दौरी है, जो जब तब उसे अपमानित कर देते हैं?_* 

 _मुख्यमंत्री जी, अब आप ही स्वतः संज्ञान ले कि क्रिकेट की जिस जीत का जश्न आप इंदौर में ही रहक़र स्वयम मना रहें थे, उसी इंदौर के ह्रदय स्थल राजबाड़ा पर टीम इंडिया की जीत का उत्सव पुलिस ने क्यों नही मनाने दिया? किसके आदेश से पुलिस ने महज आधे घण्टे में राजबाड़ा पर डंडे फटकारते हुए राष्ट्रप्रेम की मस्ती में डूबे इंदोरियो को खदेड़ना शुरू कर दिया? महिला, बच्चों और परिवार सहित जीत की ख़ुशी आपस मे बाटने निकले इंदौर को राजबाड़ा पर उत्सव मनाने से क्यो रोका गया?_ 

 *_देशप्रेम का प्रदर्शन किस अफ़सर को नागवार गुजरा? इसका जवाब तो सीएम साहब अब आप ही लीजिए। अब आपसे ही आस हैं। आप प्रदेश के मुखिया ही नही, इंदौर ज़िले के प्रभारी मंत्री होते हुए इस अहिल्या नगरी के पालक भी हैं। पालक अपने परिवार की चिंता न करेंगे तो फ़िर कौन करेगा? पुरा इंदौर राजबाड़ा पर हुए पुलिसिया बर्ताव से दुःखी, उद्वेलित व आक्रोशित भी हैं। आप पुलिस महकमे के मुखिया भी हैं। लिहाज़ा आपसे उम्मीद हैं कि आप जिम्मेदारों से जवाब तलब करेंगे।_* 

 _स्थानीय नेतृत्व तो लगातार इस शहर से मिल रही एकतरफा चुनावी जीत के नशे में बेसुध पड़ा हुआ हैं। उसकी सत्ता की ख़ुमारी है कि उतरने का नाम ही नही ले रही। जनता से जुड़े हर मुद्दे पर उसका मौन इतना ‘ मुखर ‘ हैं कि ये इंदौर भी हतप्रभ हैं। ‘ नायता मुंडला ‘ से लेकर ‘ राजबाड़ा ‘ तक विधायकों, सांसदों, मंत्रियों, पार्षदों, नीली-पीली बत्ती वाले नेताओं का मौन ‘ गूंगे गुड़ियाओं ‘ की उपाधि के बाद भी बरकरार हैं। जबरिया खाली कराए गए राजबाड़ा वाले मामले में भी वह वैसे ही चुप रहा, जैसे एक डेढ़ दशक से खामोश हैं।_ 

 *_’ गूंगे गुड्डे-गुड़ियाओं ‘ की ये ख़ामोशी इन्दौरी अब बर्दाश्त नही करेंगे। इस शहर की ‘ जागृत क़लम ‘ सहन नही करेगी, न शहर के ‘जिंदा लोग’ बर्दाश्त करेंगे। इन नेताओं की खामोशी का बार बार ख़ुलासा करेंगे, हर उसे मुद्दे पर, जो जन जन से जुड़ा हैं। शहर के चुने हुए नेतृत्व का बोलना कहां जरूरी हैं, ये जब तब याद दिलाया जाएगा। ये प्रश्न बारम्बार उठाया जाएगा कि आख़िर इन्हें इंदौर और इंदोरियो का दर्द नज़र क्यो नही आता? राजबाड़ा पर सोमवार रात जो हुआ, नेताओ को क्यो महसूस नही हुआ?

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