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*साथ आकर भी पवार परिवार की ‘अजेय जोड़ी’गढ़ में क्यों हुई फेल*

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महाराष्ट्र में पुणे और पिंपरी-चिंचवाड़ नगर निगम चुनाव के नतीजों ने पवार पावर को लेकर एक स्पष्ट राजनीतिक संदेश दिया है. जिस पवार ब्रांड को कभी सत्ता के इन शहरी केंद्रों में अजेय माना जाता था, वह अब अकेले जीत की गारंटी नहीं रह गया है. शरद पवार और अजीत पवार की अगुआई वाले राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) के दोनों गुटों के रणनीतिक तालमेल के बावजूद वोटरों ने तगड़ा झटका दे दिया है.पुणे और पिंपरी-चिंचवाड़ नगर निगम के चुनाव नतीजों में एनसीपी के दोनों गुटों को बड़ा झटका लगा है,जो पवार ब्रांड को कभी सत्ता के इन शहरी केंद्रों में अजेय माना जाता था, वह अब अकेले जीत की गारंटी नहीं रहा,पुणे में बीजेपी मजबूत ताकत बनकर उभरी है, वहीं पिंपरी-चिंचवाड़ में बीजेपी गहरी पैठ बनाने में कामयाब रही है

पुणे में बीजेपी ने दिया जोर का झटका

पुणे नगर निगम में बीजेपी एक मजबूत ताकत के रूप में उभरी है. पार्टी ने यहां बड़ी संख्या में वार्डों में या तो जीत दर्ज कर ली है या मजबूत बढ़त बना ली है. इसकी बदौलत वह निगम में दबदबा बनाने की स्थिति में पहुंच गई है. एनसीपी के दोनों गुट जो यहां एक साथ आकर चुनाव मैदान में थे, अपने पारंपरिक प्रभाव वाले इलाकों में वोटरों को प्रभावित करने में नाकाम रहे. पिछले एक दशक में पुणे के मतदाताओं का मिजाज काफी बदला है. मध्यम वर्ग और नए वोटर विरासत की राजनीति के बजाय शासन, इन्फ्रास्ट्रक्चर और राष्ट्रीय नैरेटिव को ज्यादा महत्व दे रहे हैं. वहीं दोनों पवार का संयुक्त प्रचार भी इस बदलाव के मुकाबले में ठोस विजन पेश करने में फेल साबित हुआ है.

पिंपरी-चिंचवाड़ में पवार परिवार को मिला सबक

पिंपरी-चिंचवाड़ से नतीजे कुछ अलग होने की उम्मीद थी क्योंकि ऐतिहासिक रूप से यह पवारों का खासकर अजीत पवार का गढ़ माना जाता रहा है. हालांकि यहां के नतीजों ने भी एनसीपी खेमे को निराश किया है. बीजेपी यहां गहरी पैठ बनाने में कामयाब हो गई है. वह इतनी सीटें जीत रही है कि एनसीपी के वर्चस्व को चुनौती दे सके. यह नतीजे इसलिए भी अहम है क्योंकि पिंपरी-चिंचवाड़ के चुनाव को इस बात की परीक्षा माना जा रहा था कि क्या अजीत पवार का निजी दबदबा अभी भी शहरी परिणामों को प्रभावित कर सकता है या नहीं. नतीजों से साफ है कि जब तक संगठन की मजबूत एकता और स्पष्ट राजनीतिक विजन न हो, अकेले करिश्मा कुछ नहीं कर सकता.

पवार पावर फेल होने की वजह

पवारों के पुनर्मिलन पर लगा प्रश्नचिह्न

चुनाव में इस हार ने अब पवार परिवार की एकता के भविष्य पर एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है. क्या ये नतीजे शरद पवार और अजीत पवार को अपनी दूरियां मिटाकर फिर से गंभीरता से विचार करने के लिए मजबूर करेंगे या फिर ये झटका उनकी प्रतिद्वंद्विता को और धार देगा? अब तक दोनों पक्ष कहते आए हैं कि उनका गठबंधन सिर्फ स्थानीय निकाय चुनावों तक सीमित था. अब जो नतीजे आए हैं, उनसे इस गठबंधन को विस्तार देने की संभावना फिलहाल अनिश्चितता के गर्त में चली गई है.

अब शरद पवार और अजित पवार को वास्तव में साथ आने के लिए महज चुनावी गणित से और आगे का सोचना होगा. इसके लिए नेतृत्व पर स्पष्टता, संगठन के मतभेदों का समाधान और साझा विचारधारा की जरूरत होगी जो पुणे और पिंपरी-चिंचवाड़ जैसे शहरों की बदलते उम्मीदों पर खरी उतरे. एनसीपी इस हार के बाद आत्ममंथन करती है या फिर फिर से एकजुट होने के विचार को ठंडे बस्ते में डाल देती है, यह तो आने वाला समय ही बताएगा.

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