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कैलाश विजयवर्गीय क्यों नहीं बने मुख्यमंत्री

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सीएम के लिए चल रहे नामों में से प्रमुख नाम कैलाश विजयवर्गीय को सीएम की कुर्सी मिलते मिलते रह गई। भारत का दिल कहा जाने वाला MP अब मोहन यादव के नेतृत्व में आगे बढ़ेगा। मोहन यादव ने Madhya Pradesh विधानसभा चुनाव में BJP के लिए उज्जैन से चुनाव जीता। उन्हें हिंदूवादी नेता के रूप में जाना जाता है। Mohan Yadav के Chief Minister बनने से भाजपा संगठन में खुशी की लहर है। CM जल्द पदभार ग्रहण करेंगे। मोहन यादव मध्यप्रदेश की सियासत के एक मंझे हुए और माहिर खिलाड़ी हैं। वे तीसरी बार के विधायक हैं। संघ से जुड़े रहे हैं। 58 साल उनकी उम्र है। अनुशासित माने जाते रहे हैं और जमीन से उठे हैं। ओबीसी वर्ग से आते हैं। वर्तमान सरकार में वे शिक्षा मंत्री हैं। 

क्यों चल रहा था कैलाश विजयवर्गीय का नाम- पार्षद से राष्ट्रीय महासचिव बने

कैलाश विजयवर्गीय की गिनती प्रदेश के बड़े नेताओं  में होती है और केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह की गुडलिस्ट में माने जाते है। बोल्ड स्वभाव और विवादित बयानों के कारण भी वे अक्सर चर्चा में बने रहते हैं। विजयवर्गीय विधायक के अलावा इंदौर के मेयर भी रह चुके है। 38 सालों के राजनीतिक सफर में  पार्षद से लेकर भाजपा राष्ट्रीय महासचिव तक का मुकाम उन्होंने हासिल किया। वे भाजपा सरकार में लोक निर्माण मंत्री, उद्योग मंत्री और नगरीय प्रशासन मंत्री रह चुके है। उन्होंने दो बार एमपीसीए चुनाव में भी हाथ आजमाया, लेकिन दोनों बार केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया से वे हार गए। 

विजयवर्गीय विधायक के अलावा इंदौर के मेयर भी रह चुके हैं। 38 सालों के राजनीतिक सफर में  पार्षद से लेकर भाजपा राष्ट्रीय महासचिव तक का मुकाम उन्होंने हासिल किया। वे भाजपा सरकार में लोक निर्माण मंत्री, उद्योग मंत्री और नगरीय प्रशासन मंत्री रह चुके हैं। उन्होंने दो बार एमपीसीए चुनाव में भी हाथ आजमाया, लेकिन दोनों बार केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया से वे हार गए। 

विजयवर्गीय के राजनीतिक जीवन की शुरुआत छात्र राजनीति से हुई। गुजराती काॅलेज में बीएससी के छात्र रहे विजयवर्गीय ने छात्रसंघ का चुनाव लड़ा। 1993 में नंदानगर वार्ड से उन्हें भाजपा ने पार्षद का टिकट दिया। तब विजयवर्गीय ने कांग्रेस उम्मीदवार बाबू सिंह डंगर को हराया था। इस जीत के बाद विजयवर्गीय ने पीछे मुड कर नहीं देखा। 1990 में उन्होंने चार नंबर विधानसभा से विधायक का चुनाव लड़ा। इसके बाद 1993 में वे दो नंबर विधानसभा सीट से चुनकर विधानसभा में गए। तब उन्होंने कृपा शंकर शुक्ला को हराया था। तीन बार लगातार इस सीट से वे चुनाव जीते, लेकिन वर्ष 2008 में संगठन ने उन्हें महू सीट से टिकट दिया। वे दस साल महू क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करते रहे।

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