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दशहरा के पर्व पर पूजा होने के बाद शमी पत्तियों को क्यों लूटते हैं लोग

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राजघराने और रियासतों का दौर भले ही बीत चुका हो, लेकिन इनके द्वारा निभाई जाने वाली परंपराएं आज भी देश के कई हिस्सों में चलती आ रही हैं। ऐसी ही एक परंपरा ग्वालियर के सिंधिया परिवार के साथ पूरा शहर निभाता है। जहां सिंधिया परिवार के लोग राजसी पोशाक के साथ अपने राज्य और देश के लिए सुख शांति की कामना करते हैं।

दरअसल, हर साल दशहरा के पर्व पर सिंधिया परिवार शमी पूजन करता है। यह परंपरा सदियों पुरानी बताई जाती है। पुराने समय में राजा-महाराजा लाव लश्कर व सरदारों के साथ अपने महल से निकलते थे। महल से निकल कर गोरखी पहुंचते थे। जहां देवघर में पूजा करने के बाद शस्त्रों का पूजन किया जाता था। यह सिलसिला दिन भर चलता रहता था।

इसके बाद महाराज शाम के समय शमी के पेड़ की पूजा करते थे। जो राजघराने की कुलदेवी कहीं जाने वाली मांढरे वाली माता के पास होता था। यहां लगे हुए शमी के पेड़ की पूजा होने के बाद सोने का स्वरूप माने जाने वाली शमी पेड़ की पत्तियों को सभी लोग लूटने लगते थे। यह परंपरा आज भी चालू है।
जानें क्या है विशेष परंपरा

ग्वालियर में सिंधिया घराने का शासन काल काफी पुराना है। बताया जाता है कि आजादी के पहले कई सालों तक सिंधिया राज परिवार शहर की देखभाल और विकास कार्य करता था। राजघराने की कई ऐसी परंपराएं हैं जिनका निर्वहन आज भी राजघराना करता है और पूर ग्वालियर शहर इसमें शामिल होता है। ऐसी ही एक परंपरा का निर्वहन सिंधिया घराने की 9वीं पीढ़ी भी कर रही है।

इस परंपरा के तहत ज्योतिरादित्य सिंधिया परंपरागत वेशभूषा में मांढरे वाली माता के पास लगे हुए शमी पूजन स्थल पर जाते हैं और शमी के पेड़ पर तलवार लगाते हैं। जिसके बाद वहां मौजूद सभी लोग शमी पेड़ की पत्तियां लूटने के लिए दौड़ पड़ते हैं। लोग पत्तियों को सोने का प्रतीक मानते हैं।

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