पंकज श्रीवास्तव
इस समय दुनिया भर के केंद्रीय बैंकों में सोने की खरीदारी को लेकर तेज होड़ लगी हुई है। रिपोर्टों के मुताबिक, 2025 तक सेंट्रल बैंकों ने लगभग 36,300 टन सोना अपने पास जमा कर लिया है, जो अब तक का रिकॉर्ड है। इससे पहले 1978 में उनके पास 36,400 टन सोना था—यानी पांच दशक बाद फिर इतना अधिक स्वर्ण भंडार। 2022-2024 के दौरान बैंकों ने हर साल औसतन 1,000 टन सोना खरीदा, जबकि पहले वे इसका आधा ही खरीदते थे। यह पहली बार है जब केंद्रीय बैंकों का स्वर्ण भंडार अमेरिकी ट्रेजरी सिक्योरिटीज (सरकारी बॉन्ड्स, बिल्स या नोट्स) से आगे निकल गया है।
आखिर इस होड़ का कारण क्या है? दरअसल, रूस-यूक्रेन युद्ध और अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप द्वारा शुरू किए गए टैरिफ वॉर ने वैश्विक अर्थव्यवस्थाओं को हिला दिया है। ऐसे में सोना एक सुरक्षित संपत्ति के रूप में उभरा है, जो मुद्रा के उतार-चढ़ाव और महंगाई से बचाव करता है। खासकर चीन जैसे देश अमेरिकी डॉलर पर अपनी निर्भरता कम करना चाहते हैं। सोना ऐसी संपत्ति है जो किसी एक देश की मुद्रा पर निर्भर नहीं। यह सिर्फ खरीदारी नहीं, बल्कि एक रणनीतिक कदम है—सेंट्रल बैंक्स सोने को विदेशी मुद्रा भंडार का हिस्सा बनाकर जोखिम कम कर रहे हैं। भारत भी इस रणनीति को अच्छी तरह समझ रहा है।
भारत का स्वर्ण भंडार
रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (आरबीआई) ने भी सोने की खरीदारी में तेजी दिखाई है। मार्च 2025 तक आरबीआई के पास 879.6 टन सोना था, जो पिछले साल की तुलना में 57.5 टन अधिक है। यह 2024-25 में दूसरी सबसे बड़ी वार्षिक खरीद थी। आरबीआई की रणनीति स्पष्ट है: अमेरिकी ट्रेजरी बिल्स के बजाय सोने को प्राथमिकता देकर विदेशी मुद्रा भंडार को मजबूत करना। वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच भारत अपनी स्थिति मजबूत कर रहा है, हालांकि हाल के महीनों में कीमतों के रिकॉर्ड स्तर पर होने के कारण खरीदारी में सावधानी बरती जा रही है।
अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोने की कीमत 2025 में $3,592 प्रति औंस रही, जिसमें 36% का उछाल आया। यह उछाल बढ़ती मांग का संकेत है। भारत स्वर्ण भंडार के लिहाज से सातवें स्थान पर है। विश्व स्वर्ण परिषद (वर्ल्ड गोल्ड काउंसिल) और आईएमएफ के आंकड़ों के अनुसार, सितंबर 2025 तक भारत के पास 879.6 टन सोना है
दुनिया के स्वर्ण भंडार
स्वर्ण भंडार किसी देश की आर्थिक मजबूती का प्रतीक रहा है। यहां दुनिया के शीर्ष छह देशों के भंडार हैं, जिनके पास भारत से अधिक सोना है:
संयुक्त राज्य अमेरिका: 8,133.46 टन—दुनिया में सबसे ज्यादा, जो इसके विदेशी मुद्रा भंडार का 75% से अधिक है।
- जर्मनी: 3,351.53 टन—इसके भंडार का दो-तिहाई सोने में।
- इटली: 2,451.84 टन—यूरोजोन संकट के दौरान बेचने की चर्चा हुई, लेकिन नहीं बेचा।
- फ्रांस: 2,436.94 टन—1960 के दशक में ब्रेटन वुड्स को चुनौती दी।
- रूस: 2,332.74 टन—अमेरिकी निवेश से बचने के लिए खरीदारी बढ़ाई।
- चीन: 2,200 टन (आधिकारिक; अनुमान 5,000 टन तक)।
ये आंकड़े दिखाते हैं कि सोना वैश्विक आर्थिक ताकत का आधार है।
गोल्ड स्टैंडर्ड से ब्रेटन वुड्स तक
स्वर्ण भंडार से ही गोल्ड स्टैंडर्ड का विचार आया। सोने का उपयोग हजारों वर्षों से विनिमय के साधन के रूप में होता रहा। 7वीं शताब्दी ईसा पूर्व में लिडिया (आधुनिक तुर्की) में सोने के सिक्के पहली बार मुद्रा बने। 1870 के दशक में जर्मनी, अमेरिका और फ्रांस ने गोल्ड स्टैंडर्ड अपनाया, जो मुद्राओं को स्थिर रखता था—क्योंकि मुद्रा को सोने में बदला जा सकता था। 19वीं सदी में कई देशों ने अपनी मुद्रा को सोने से जोड़ा, और 1870 से 1914 तक यह वैश्विक व्यापार को स्थिरता देता रहा।
1944 का ब्रेटन वुड्स समझौता द्वितीय विश्व युद्ध के बाद हुआ, जिसमें अमेरिकी डॉलर को सोने से जोड़ा गया ($35 प्रति औंस)। अन्य मुद्राएं डॉलर से जुड़ीं। विदेशी सेंट्रल बैंक डॉलर को सोने में बदल सकते थे- यह “गोल्ड-एक्सचेंज स्टैंडर्ड” था, जिसने डॉलर को वैश्विक रिजर्व मुद्रा बनाया।
इससे डॉलर “सोने जितना अच्छा” हो गया, क्योंकि यह ब्याज अर्जित करता था। लेकिन 1971 में अमेरिका ने इसे तोड़ दिया जिसे कहा गया— “निक्सन शॉक”। 1960 के दशक में व्यापार घाटा, वियतनाम युद्ध के खर्च और फ्रांस (चार्ल्स डी गॉल के नेतृत्व में) द्वारा डॉलर को सोने में बदलने से अमेरिका पर काफ़ी दबाव पड़ा था। 15 अगस्त 1971 को राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन ने डॉलर की सोने परिवर्तनीयता निलंबित कर दी। 1973 तक फ्लोटिंग एक्सचेंज रेट प्रणाली आई, जहां मुद्रा का मूल्य बाजार पर निर्भर। डॉलर फिएट मुद्रा बन गया—सरकार का वचन, जैसे भारत का रुपया।
1991 का आर्थिक संकट
सोने की अहमियत 1990-91 के संकट से समझ आती है। चंद्रशेखर सरकार के समय विदेशी मुद्रा भंडार इतना कम था कि दो हफ्तों के आयात का पैसा बचा। 47 टन सोना स्विट्जरलैंड और इंग्लैंड में गिरवी रखा। कारण: बैलेंस ऑफ पेमेंट संकट, व्यापार घाटा, विदेशी कर्ज। आईएमएफ से कर्ज के लिए यह जरूरी था। इसने 1991 के आर्थिक उदारीकरण की नींव रखी, जो भारत की नीतियों को बदल गया।

