शरद पवार और अजित पवार के फिर साथ आने की खबरों ने पुणे की राजनीति में भूचाल ला दिया है. लेकिन ऐलान में देरी क्यों हो रही है? वजह कोई राजनीतिक मनमुटाव नहीं, बल्कि एक ‘चुनाव चिन्ह’ है. अजित दादा चाहते हैं सब ‘घड़ी’ पर लड़ें, जबकि शरद गुट ‘तुतारी’ छोड़ने को तैयार नहीं. साथ ही एक वफादार नेता के इस्तीफे ने पेच और फंसा दिया है.
महाराष्ट्र की राजनीति, खासकर पुणे और पिंपरी-चिंचवाड़ के पावर गेम में एक बार फिर बड़ा ट्विस्ट आया है. चाचा शरद पवार और भतीजे अजित पवार के गुटों के बीच गठबंधन की चर्चाएं जोरों पर हैं, लेकिन ऐलान में लगातार देरी हो रही है. बाहर से सब कुछ सामान्य दिख रहा है, लेकिन अंदरखाने एक बड़ी ‘टेक्निकल’ और ‘इमोशनल’ लड़ाई चल रही है. सूत्रों के मुताबिक, दोनों गुटों के एक साथ आने में सबसे बड़ी बाधा विचारधारा नहीं, बल्कि चुनाव चिन्ह है. आखिर क्या है यह पूरा पेंच और 26 दिसंबर को क्या होने वाला है?
विश्वसनीय सूत्रों का दावा है कि गठबंधन की घोषणा रुकने की मुख्य वजह चुनाव चिन्ह को लेकर असमंजस है. अजित पवार खेमे का कहना है कि अगर गठबंधन होता है, तो पुणे और पिंपरी-चिंचवाड़ नगर निगम चुनाव में सभी उम्मीदवारों को घड़ी चिन्ह पर चुनाव लड़ना चाहिए. शरद पवार गुट के नेता इसका कड़ा विरोध कर रहे हैं. उनका मानना है कि अगर वे घड़ी पर चुनाव लड़ते हैं, तो यह तकनीकी रूप से अजित पवार की पार्टी में विलय जैसा हो जाएगा. शरद पवार गुट के एक वरिष्ठ नेता ने नाम न छापने की शर्त पर कहा, गठबंधन ठीक है, हम इसके लिए तैयार हैं, लेकिन हम अपने चुनाव चिन्ह ‘तुतारी’ से समझौता नहीं करेंगे. अगर घड़ी अपना ली, तो हमारी स्वतंत्र पहचान खत्म हो जाएगी.
गढ़ वापसी की छटपटाहट: 2017 का बदला
पुणे और पिंपरी-चिंचवाड़ कभी पवार परिवार का अभेद्य किला थे. लेकिन 2017 में भाजपा ने इस किले में सेंध लगा दी और सत्ता छीन ली. अब 2024-25 में बदले समीकरणों के बीच दोनों गुटों को लगता है कि अगर वे अलग-अलग लड़े, तो भाजपा को हराना नामुमकिन होगा. इसी मजबूरी के चलते अजित पवार खुद शरद पवार गुट के नेताओं को फोन कर रहे हैं और उनकी राय जान रहे हैं. ‘साझा दुश्मन’ (भाजपा) को हराने के लिए अजित दादा, जो खुद राज्य में भाजपा के साथ सरकार में हैं, पुणे में स्थानीय स्तर पर अलग समीकरण बनाने की फिराक में हैं.
‘वफादार’ का इस्तीफा: प्रशांत जगताप की बगावत
गठबंधन की इन कोशिशों से शरद पवार गुट के वफादार नेता और पुणे के पूर्व महापौर प्रशांत जगताप नाराज हो गए हैं. जगताप शुरू से ही इस गठबंधन के विरोधी रहे हैं. उनका तर्क है कि अजित पवार ने भाजपा से हाथ मिलाया है, इसलिए उनके साथ जाना अनैतिक है. जब उन्होंने देखा कि शीर्ष नेतृत्व (सुप्रिया सुले और अन्य) गठबंधन के पक्ष में हैं, तो उन्होंने अपनी ‘अंतरात्मा की आवाज’ सुनते हुए पार्टी से इस्तीफा दे दिया. यह इस्तीफा शरद पवार गुट के लिए एक बड़ा झटका है और यह दिखाता है कि जमीनी कार्यकर्ता इस ‘मिलन’ से खुश नहीं हैं.
सुप्रिया सुले के संकेत: अभी फैसला नहीं, पर…
एनसीपी (SP) की कार्यकारी अध्यक्ष सुप्रिया सुले ने आज पुणे में प्रेस कॉन्फ्रेंस कर सस्पेंस और बढ़ा दिया. उन्होंने गठबंधन से इनकार नहीं किया. उन्होंने कहा, पुणे शहर के विकास और कार्यकर्ताओं की भावनाओं को देखते हुए हम फैसला लेंगे. यह बयान साफ संकेत है कि पार्टी नेतृत्व गठबंधन के लिए सकारात्मक है, बस ‘सम्मानजनक रास्ते’ (चिन्ह का मुद्दा) की तलाश की जा रही है.
26 दिसंबर का इंतजार
दोनों खेमों के बीच बैठकों का दौर जारी है. एक तरफ प्रशांत जगताप जैसे नेताओं की नाराजगी है, तो दूसरी तरफ ‘घड़ी’ और ‘तुतारी’ की लड़ाई. खबर है कि 26 दिसंबर को अंतिम निर्णय लिया जा सकता है. उस दिन यह साफ हो जाएगा कि क्या चाचा-भतीजा पुणे में एक ही झंडे (या अलग-अलग झंडे पर एक साथ) के नीचे आएंगे या फिर यह गठबंधन ‘चिन्ह’ की लड़ाई में दम तोड़ देगा.

