’15 अगस्त को पत्र लिखकर राजभवन ने पंजाब सरकार से कुछ जानकारियां मांगी थी। 11 दिन बीतने के बावजूद सरकार की ओर से कोई जानकारी नहीं दी गई है। अगर राज्यपाल के पत्र का जवाब नहीं मिलता है तो ये संवैधानिक कर्तव्य का अपमान है। इससे पहले कि वह संविधान के अनुच्छेद 356 और भारतीय दंड संहिता की धारा 124 के तहत अंतिम निर्णय लें, मुख्यमंत्री भगवंत मान उचित कदम उठाएं।’
पंजाब के राज्यपाल बनवारी लाल पुरोहित की इस चिट्ठी को पंजाब में राष्ट्रपति शासन लगाने की चेतावनी के तौर पर देखा जा रहा है। इसके जवाब में CM भगवंत मान ने कहा है कि गवर्नर को लगता है कि उनकी चिट्ठी के बाद सीएम की कुर्सी छिनने के डर से मैं कंप्रोमाइज कर लूंगा तो जान लें मैं कोई समझौता नहीं करूंगा।
क्या पंजाब में राष्ट्रपति शासन लगना मुमकिन है?
किसी राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाने का जिक्र संविधान के भाग 18 में किया गया है…
1. आर्टिकल 355: बाहरी आक्रमण और आंतरिक अशांति से किसी भी राज्य की रक्षा के लिए केंद्र सरकार कानून व्यवस्था अपने हाथों में ले सकती है।
2. आर्टिकल 356: इसके तहत इन 4 परिस्थितियों में राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाने की बात कही गई है…
- जब राज्य विधानसभा में कोई भी दल बहुमत ना सिद्ध कर सके।
- आपातकालीन स्थिति जैसे बाढ़, महामारी, युद्ध, हिंसा या प्राकृतिक आपदा के चलते समय पर विधानसभा नहीं होने पर।
- अगर सरकार का सदन में संख्या बल कम हो जाता है और वह बहुमत खो देती है तो उस स्थिति में।
- अगर राज्यपाल या राष्ट्रपति को लगे कि राज्य सरकार संविधान के अनुरूप शासन चलाने में समर्थ नहीं है या संविधान के मूल सिद्धांत की अनदेखी कर रही है।
3. आर्टिकल 365: जब किसी राज्य में कानून व्यवस्था पूरी तरह से फेल हो जाए तो राष्ट्रपति अपने पावर का इस्तेमाल करके वहां राष्ट्रपति शासन लगा सकते हैं।
मार्च 2022 की इस तस्वीर में पंजाब के 17वें सीएम के तौर पर शपथ लेते भगवंत मान और उन्हें शपथ दिलाते राज्यपाल बनवारी लाल पुरोहित नजर आ रहे हैं।
राज्यपाल बनवारी लाल पुरोहित ने यहां की सरकार को बर्खास्त करने के पीछे 2 कानूनी आधार बताए हैं…
1. सरकार संविधान के मूल सिद्धांत की अनदेखी कर रही है।
2. राज्य में कानून व्यवस्था पूरी तरह से फेल है।
क्या वाकई में पंजाब सरकार संविधान के मूल सिद्धांत की अनदेखी कर रही?
पंजाब के राज्यपाल बनवारी लाल पुरोहित ने सीएम भगवंत मान को लिखे पत्र में कहा है कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 167 के प्रावधानों के मुताबिक, राज्यपाल अगर राज्य के प्रशासनिक मामलों के बारे में कोई जानकारी मांगें तो मुख्यमंत्री द्वारा उसे उपलब्ध कराया जाना अनिवार्य होता है। ऐसा नहीं करके राज्य सरकार संविधान के मूल सिद्धांत की अनदेखी कर रही है।
वहीं सुप्रीम कोर्ट के वकील विराग गुप्ता बताते हैं कि राज्य सरकार के मंत्री, मुख्यमंत्री और राज्य के संवैधानिक मुखिया राज्यपाल सभी लोग संविधान की शपथ लेकर कानून के शासन के प्रति प्रतिबद्ध रहते हैं।
संविधान के मूल सिद्धांतों के अनेक पहलू हैं। जनता के अनुसार देखा जाए तो चैप्टर-3 में दिए गए मौलिक अधिकारों का संरक्षण सबसे अहम है। संसद और सुप्रीम कोर्ट के अनुसार संघीय व्यवस्था, संसदीय प्रणाली, ज्यूडिशियल रिव्यू जैसे विषय बेसिक ढांचे में आते हैं।
राज्यों के लिहाज से देखा जाए तो केंद्र सरकार के दिशा-निर्देशों का पालन, अदालतों के फैसले का सम्मान, राज्य की वित्तीय व्यवस्था का सही ऑडिट, संविधान की 7वीं अनुसूची के तहत केंद्रीय मामलों में बेवजह हस्तक्षेप नहीं करना जैसी बातें राज्यों की संवैधानिक जिम्मेदारी है।
पंजाब सीमावर्ती राज्य है, जहां राष्ट्रीय सुरक्षा और आतंकवादियों पर लगाम का मामला सबसे अहम है। इसके अलावा पंजाब के बारे में राज्य सरकार की संवैधानिक जिम्मेदारियों को अलग तरीके से आकलन करने की यदि कोशिश की गई तो उन मापदंडों को अन्य राज्यों पर भी लागू करना पड़ेगा।
क्या राज्य में कानून व्यवस्था पूरी तरह से फेल हाे चुकी है?
राज्यपाल पुरोहित ने अपने पत्र में लिखा है कि पंजाब में नशा चरम पर है। राज्य में हर मेडिकल दुकानों और शराब के ठेकों पर गैरकानूनी नशीले पदार्थ आसानी से उपलब्ध हैं। इससे साफ है कि पंजाब में कानून व्यवस्था पूरी तरह से फेल है।
विराग कहते हैं कि पंजाब में ड्रग्स का नासूर बहुत पुराना है। पहले की सरकारों के मंत्रियों के ऊपर ड्रग्स कारोबारियों के साथ रिश्तों के आरोप थे। अगर वर्तमान राज्य सरकार के अफसर या मंत्रियों की ड्रग्स या शराब के कारोबारियों के साथ मिलीभगत है तो राज्यपाल को इस बारे में केंद्र सरकार को सबूतों के साथ जानकारी देनी चाहिए।
इन सबूतों के आधार पर केंद्रीय एजेंसी NCB एनडीपीएस एक्ट के तहत संबंधित अधिकारियों और मंत्रियों के खिलाफ मामले दर्ज कर सकती है, लेकिन ऐसे आरोपों के आधार पर पूरी राज्य सरकार के खिलाफ कार्रवाई करना या धमकी देना संविधान सम्मत नहीं है।
राज्यपाल ने अनुच्छेद-356 के तहत जो चेतावनी दी है वह कितनी अहम है?
विराग बताते हैं कि संविधान के अनुच्छेद-356 के मामलों पर सुप्रीम कोर्ट कई फैसले सुना चुका है। सामान्यतः जब राज्य सरकार बहुमत खो दे और उसकी पुष्टि विधानसभा के पटल में हो जाए तो अनुच्छेद-356 के तहत राष्ट्रपति शासन की सिफारिश की जाती है।
अनुच्छेद-355 के तहत केंद्र सरकार, राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाए बगैर भी हस्तक्षेप कर सकती है। केंद्र सरकार की रिपोर्ट के अनुसार पंजाब के अलावा देश के कई राज्यों में ड्रग्स का अवैध कारोबार हो रहा है। शराब की बिक्री तो देश के कई राज्यों में आमदनी का बड़ा जरिया है।
अवैध शराब की बिक्री से अनेक राज्यों में राजस्व का भारी नुकसान होने के साथ बेगुनाह लोगों की मौतों का आंकड़ा बहुत बड़ा है। मणिपुर में कानून और व्यवस्था की स्थिति पूरी तरह से विफल हो गई है। राज्य में विधानसभा का अधिवेशन भी नहीं हो पाया। इसके बावजूद वहां पर राष्ट्रपति शासन नहीं लगा। इसलिए शराब और ड्रग्स मामलों के आधार पर पंजाब में राष्ट्रपति शासन लगाने की अनुशंसा करना गलत होगा।
क्या पंजाब में राष्ट्रपति शासन लगाना मुमकिन है और इसका प्रोसेस क्या होगा?
विराग के मुताबिक यह एक आपातकालीन अधिकार है, जिसका बहुत ही जिम्मेदारी के साथ इस्तेमाल होना चाहिए। अनुच्छेद-356 के तहत राज्यपाल को अनेक विशेष अधिकार हासिल हैं। राज्यपाल की रिपोर्ट के आधार पर और केंद्रीय मंत्रिमंडल की सिफारिश पर राष्ट्रपति अनुच्छेद-356 के तहत राष्ट्रपति शासन लगाने की मंजूरी दे सकते हैं।
इसे संसद के दोनों सदनों की मंजूरी भी लेनी होती है। उत्तराखंड समेत कई राज्यों में राष्ट्रपति शासन लगाने के आदेश को सुप्रीम कोर्ट ने निरस्त कर दिया था। इसलिए पंजाब के मामले में ऐसे किसी भी आदेश को हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी जा सकती है।
इन 5 मुद्दों को लेकर पंजाब के राज्यपाल और मुख्यमंत्री के बीच विवाद
1. सीएम ने कानून बनाकर डीजीपी और वाइस चांसलर की नियुक्ति का हक छीना
इस साल 19-20 जून को पंजाब विधानसभा का विशेष सत्र बुलाया गया था। इस दौरान 4 बिल पास होने के बाद मंजूरी के लिए राज्यपाल के पास भेजे गए थे। इनमें द सिख गुरुद्वारा संशोधन बिल, पंजाब पुलिस (संशोधन) बिल, पंजाब यूनिवर्सिटी लॉ अमेंडमेंट बिल और पंजाब एफिलिएटेड कॉलेज (सेवाओं की सुरक्षा) संशोधन बिल शामिल थे।
जून 2023 में पंजाब विधानसभा का विशेष सत्र बुलाकर भगवंत मान की सरकार ने 4 नए कानून बनवाए थे।
इनके जरिए सरकार ने गोल्डन टेंपल में होने वाली गुरबाणी का प्रसारण सभी चैनल्स को फ्री में करने, पंजाब पुलिस के DGP और पंजाब की यूनिवर्सिटीज में वाइस चांसलर की नियुक्ति का अधिकार राज्यपाल की जगह मुख्यमंत्री को देने का फैसला लिया था। राज्यपाल ने एक्सपर्ट की राय पर इन चारों बिलों को गैरकानूनी ठहरा दिया। इस पर सीएम सुप्रीम कोर्ट जाने की चेतावनी दे चुके हैं।
2. राज्यपाल का आरोप- किराना की दुकानों में सरेआम ड्रग्स बिक रहीं
इसके बाद राज्यपाल ने पंजाब के सीमांत जिलों का दौरा करते हुए वहां के लोगों से बातचीत की। इस दाैरान उन्होंने ड्रग्स को लेकर सरकार की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए। राज्यपाल ने यहां तक कह दिया कि बॉर्डर बेल्ट में किराना दुकानों पर भी सरेआम ड्रग्स बिक रही हैं।
नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो यानी NCB ने पंजाब की 66 दवा और शराब की दुकानों से अवैध नशीली दवाएं बरामद कीं।
राज्यपाल ने सीएम को भेजे अपने पत्र में दावा किया कि उन्हें पंजाब में बड़े पैमाने पर नशीली दवाओं के दुरुपयोग को लेकर विभिन्न एजेंसियों से रिपोर्ट मिली है।
राज्यपाल पुरोहित ने नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो यानी NCB और चंडीगढ़ पुलिस की हालिया कार्रवाई का हवाला देते हुए लिखा- पंजाब में केमिस्ट की दुकानों में आसानी से ड्रग उपलब्ध हैं। साथ ही एक नया ट्रेंड देखा गया है कि ड्रग को सरकारी शराब की दुकानों में बेचा जा रहा है। लुधियाना में ड्रग बेचने के आरोप में शराब की 66 दुकानों को सील किया गया है।
3. राज्यपाल बोले- जब तक पंजाब में रहेंगे, सरकारी हेलिकॉप्टर का इस्तेमाल नहीं करेंगे
सीएम भगवंत मान ने सरकारी हेलिकॉप्टर के इस्तेमाल को लेकर राज्यपाल पर सवाल उठाए। इस पर राज्यपाल पुरोहित ने कहा कि जब तक वह पंजाब में हैं, कभी सरकारी हेलिकॉप्टर का इस्तेमाल नहीं करेंगे।
सीएम ने 36 सरकारी स्कूलों के प्रिंसिपल को ट्रेनिंग के लिए विदेश भेजा, जिसके बाद राज्यपाल ने सीएम से जवाब-तलब किया।
राज्यपाल ने 36 सरकारी स्कूलों के प्रिंसिपल को ट्रेनिंग के लिए विदेश भेजने के मामले में सरकार से जवाब-तलब किया। इस पर सीएम ने कहा कि वह 3 करोड़ पंजाबियों के प्रति जवाबदेह हैं, न कि किसी सिलेक्टेड शख्स के प्रति।
4. राज्यपाल ने बजट सत्र की मंजूरी देने से इनकार किया
3 मार्च 2022 को पंजाब विधानसभा के बजट सत्र की मंजूरी देने से इनकार करते हुए राज्यपाल ने सरकार से पहले एजेंडा भेजने को कहा। इस पर मान सरकार अदालत तक चली गई। उसके बाद राज्यपाल ने सेशन बुलाने की मंजूरी दी थी।
5. राज्यपाल की वजह से चंडीगढ़ SSP को उनके मूल कैडर में भेजना पड़ा
राज्यपाल के आदेश पर ही चंडीगढ़ के SSP कुलदीप चहल को कार्यकाल खत्म होने से 10 महीने पहले उनके मूल कैडर में पंजाब वापस भेजा गया। राज्यपाल के इस फैसले पर भगवंत मान ने सार्वजनिक आपत्ति जताई। इसके बाद मुख्यमंत्री ने चहल को जालंधर का पुलिस कमिश्नर नियुक्त किया।
26 जनवरी 2022 को गणतंत्र दिवस पर राज्यपाल पुरोहित को जालंधर में राज्यस्तरीय कार्यक्रम में सलामी लेनी थी, लेकिन पुलिस कमिश्नर कुलदीप चहल ने उनसे दूरी बनाए रखी। इस पर राज्यपाल ने सार्वजनिक ऐतराज जताते हुए इसे प्रोटोकॉल का उल्लंघन बताया
राष्ट्रपति शासन लगाने पर केंद्र की इन दो मामलों में हो चुकी है किरकिरी
2014 से 2019 के बीच दो बार अरुणाचल प्रदेश और उत्तराखंड में अनुच्छेद 356 का इस्तेमाल कर राज्य सरकारों को बर्खास्त किया गया था। इन दोनों ही मामलों में केंद्र सरकार के फैसले को सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दिया था।
मार्च 2016 में विजय बहुगुणा के नेतृत्व में कांग्रेस के नौ विधायकों के बागी होने के बाद उत्तराखंड में हरीश रावत सरकार अल्पमत में आ गई थी।
रावत को बहुमत साबित करने के लिए 28 मार्च तक का वक्त दिया गया था, लेकिन इससे पहले ही राज्यपाल की रिपोर्ट पर प्रणब मुखर्जी ने राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू करने की सिफारिश मंजूर कर ली।
इस फैसले के खिलाफ उत्तराखंड सरकार हाईकोर्ट चली गई। अदालत ने राष्ट्रपति शासन लागू करने के केंद्र को फैसले को खारिज कर दिया। हाई कोर्ट के फैसले को केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र के खिलाफ फैसला दिया। शक्ति परीक्षण के बाद हरीश रावत सरकार दोबारा बहाल हो गई। इस मामले में केंद्र सरकार की खासी किरकिरी हुई थी।

