भोपाल। प्रदेश की शिव सरकार के विस्तार और प्रदेश भाजपा के पदाधिकारियों की घोषणा का असंतोष अभी थमा भी नहीं है कि भाजयुमो के अध्यक्ष वैभव पवार को अपनी टीम बनाने के लिए सहमति- असहमति से दो चार होना पड़ रहा है। वे पसीने-पसीने हो रहे हैं। वैभव तय समय से एक वर्ष की देरी से युवा मोर्चा के अध्यक्ष बने हैं। उनकी ताजपोशी ऐसे वक्त में हुई जब सूबे की सियासत में युवराजों की भरमार है। दरअसल प्रदेश के सभी दिग्गज नेता अपने पुत्रों को महामंत्री और उपाध्यक्ष से कम पद पर नहीं देखना चाहते। जबकि पार्टी लाइन सांसद- विधायक और मंत्री पद पर विराजे नेताओं के पुत्रों को पदों से दूर रखने की है। इससे नेताओं के अरमानों पर पहाड़ टूट पड़ेंगे मगर मेहनत करने वाले आम कार्यकर्ताओं के लिए संभावनाओं के द्वार भी खुलेंगे।
प्रदेश भाजयुमो के अध्यक्ष वैभव पवार के सिर कांटों का ताज है। वे टीम विहीन मोर्चा के अध्यक्ष हैं। अभी युवा मोर्चा के राष्ट्रीय कार्यक्रम में वे ऐसे विरले अध्यक्ष रहे जो अपने प्रदेश से अकेले ही उसमें शामिल हुए। उनकी टीम ही नहीं बनी जबकि अन्य राज्यों से अध्यक्ष अपने पदाधिकारियों के साथ शामिल हुए। मध्यप्रदेश में दिक्कत यह है कि यहां मुख्यमंत्री से लेकर केंद्रीय मंत्री गण और राष्ट्रीय पदाधिकारी भी कभी युवा मोर्चा के प्रमुख पदों पर रहे हैं। राज सुख भोग रहे नेतागण जानते हैं कि युवा मोर्चा ही वह पगडंडी है जो उनके पुत्रों को भी सत्ता के राज मार्ग पर ले जाएगी। युवा मोर्चा में महामंत्री के पदों पर सबसे अहम दावेदारों में वरिष्ठ मंत्री गोपाल भार्गव के पुत्र अभिषेक भार्गव से लेकर केंद्रीय मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर, राष्ट्रीय महामंत्री कैलाश विजयवर्गीय के विधायक पुत्र आकाश विजयवर्गीय, मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के पुत्र कार्तिकेय, राज्यसभा सदस्य ज्योतिरादित्य सिंधिया के पुत्र महाआर्यमन सिंधिया, मंत्री यशोधरा राजे के पुत्र अक्षय भंसाली, प्रभात झा के पुत्र तुषमुल झा, गृह मंत्री नरोत्तम मिश्र के पुत्र सुकर्ण मिश्र, पूर्व मंत्री डॉ गौरीशंकर शेजवार के पुत्र मुदित, पूर्व मंत्री गौरीशंकर बिसेन की पुत्री मौसमी बिसेन आदि सहित लंबी सूची है जो युवा मोर्चा में महत्वपूर्ण पद चाहते हैं। बड़े नेताओं के परिजनों में से पदाधिकारी चुनना वैभव जैसे नए नवेले युवा मोर्चा अध्यक्ष के लिए आग के दरिया में डूब जाने जैसा काम होगा। प्रदेश भाजपा के लिए राष्ट्रीय नेतृव से साफ संकेत मिले हैं कि वह मोर्चा पदाधिकारियों के पदों पर मंत्री, विधायक और सांसदों के पुत्र, पुत्रियों और परिजनों को बहुत जरूरी होने पर ही जगह दें। कुल मिलाकर नेतापुत्रों को पद मिलना कठिन है। हालत ये है और बड़े नेताओं का दबाव यह है कि उनके पुत्रों को महामंत्री से कम मंजूर नहीं। इस पर एक कहावत याद आ रही है -‘‘बनिया उधार दे नहीं रहा, अपन कह रहे हैं कम मत तौलना’’ संगठन पद देने की स्थिति में नहीं है इसलिए घोषणा में देरी हो रही है। लेकिन एक बात तय है कि जिन आम कार्यकर्ताओं को पद मिलेगा वे प्रसन्न हुए बिना न रहेंगे। भले ही उनके नेता पुत्रों का पत्ता कटा हो। इस नीति पर वीडी शर्मा अमल करने में कामयाब हुए तो वे आम कार्यकर्ताओं में अलग स्थान बनाने की दिशा में बढ़ जाएंगे।
प्रदेश भाजपा अध्यक्ष विष्णुदत्त शर्मा ने भले ही लगभग एक साल की देरी से भाजपा पदाधिकारियों का ऐलान किया लेकिन उसमें दबाव और समझौते के लक्षण कम दिखाई दिए। इसका जो भी नफा-नुकसान हो यह तो भविष्य तय करेगा मगर निर्णय में दृढ़ता दिखाने में वीडी शर्मा को पूरे नम्बर मिलेंगे। अभी प्रदेश नेतृव जिला कार्यकार्यणी और प्रदेश कार्य समिति के गठन में पिछड़ने के कारण असंतोष,अपयश और आलोचनाओं का शिकार हो रहा है। ऐसे में भी संगठन मंत्रियों के संगठन शास्त्र का ज्ञान कसौटी पर होगा। नगरीय निकाय चुनाव में मेयर और पार्षद प्रत्याशी के चयन में संगठन बड़ी परीक्षा से गुजरेगा। असन्तोष को संभालना कठिन काम होगा। यह इसलिए भी अहम है क्योंकि इसके नतीजे संगठन में नेताओं का भविष्य तय करेंगे।
कांग्रेस में परिवारवाद का खतरा कम…
मध्यप्रदेश कांग्रेस में भाजपा की तुलना में परिवारवाद का खतरा कम हो गया है। अब यहां वरिष्ठ नेता दिग्विजयसिंह के पुत्र जयवर्धन सिंह और पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ के पुत्र नकुलनाथ ही हैं कांग्रेस के पदाधिकारी बनने की दौड़ में। संयोग से दोनों विधायक और सांसद हैं। भाजपा में नेता पुत्रों में पूर्व मुख्यमंत्रियों में स्व. कैलाश जोशी के पुत्र पूर्व मंत्री दीपक जोशी, सुंदरलाल पटवा के भतीजे पूर्व मंत्री सुरेंद्र पटवा, वीरेंद्र कुमार सकलेचा के पुत्र ओमप्रकाश सकलेचा का मंत्री के रूप में पार्टी पुनर्वास कर चुकी है। वरिष्ठ नेता स्व कैलाश सारंग के पुत्र विश्वास सारंग शिव सरकार में मंत्री की जिम्मेदारी निभा रहे हैं।
भाजपा में निरंकुशता…
भाजपा में नए पदाधिकारियों में अनजाने पन में मनमानी का दौर भी चल पड़ा है। व्यवस्था में लगे पदाधिकारीगण नेतागिरी करने में जुट गए हैं। संगठन की व्यवस्था में जिन्हें पर्दे के पीछे रह कर काम करना है वे बेनर पोस्टर और होर्डिंग्स लगवाने में लगे हैं। ये गलतियां हो सकती हैं मगर चिंताजनक ये है कि उन्हें रोकने वाला कोई नजर नहीं आ रहा है। माइक और मंच से दूर रहने का जिन पर जिम्मा है वे ही मंच लूटने में लगे दिख रहे हैं। पार्टी के इस रोग पर आगे विस्तार से चर्चा की जाएगी।

