नई दिल्ली
लोकसभा में आज 19 सितंबर को 128वां संविधान संशोधन बिल यानी नारी शक्ति वंदन विधेयक पेश किया गया। इसके मुताबिक लोकसभा और राज्यों की विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33% रिजर्वेशन लागू किया जाएगा। लोकसभा की 543 सीटों में 181 महिलाओं के लिए आरक्षित होंगी। लोकसभा में इस बिल पर कल 20 सितंबर को सुबह 11 बजे से शाम 6 बजे तक बहस होगी।
नए विधेयक में सबसे बड़ा पेंच ये है कि यह डीलिमिटेशन यानी परिसीमन के बाद ही लागू होगा। परिसीमन इस विधेयक के बाद होने वाली जनगणना के आधार पर होगा। 2024 में होने वाले आम चुनावों से पहले जनगणना और परिसीमन करीब-करीब असंभव है।
इस फॉर्मूले के मुताबिक विधानसभा और लोकसभा चुनाव समय पर हुए तो इस बार महिला आरक्षण लागू नहीं होगा। यह 2029 के लोकसभा चुनाव या इससे पहले के कुछ विधानसभा चुनावों से लागू हो सकता है।
कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने लोकसभा में महिला आरक्षण बिल पेश किया। सरकार ने इसे नारी शक्ति वंदन विधेयक कहा है।
बिल के पास होने के बाद लोकसभा में 181 महिला सांसद होंगी
कानून मंत्री अर्जुनराम मेघवाल ने कहा कि हम ऐतिहासिक बिल लाने जा रहे हैं। अभी लोकसभा में 82 महिला सांसद हैं, इस बिल के पास होने के बाद 181 महिला सांसद हो जाएंगी। यह आरक्षण सीधे चुने जाने वाले जन प्रतिनिधियों के लिए लागू होगा। यानी यह राज्यसभा और राज्यों की विधान परिषदों पर लागू नहीं होगा। लोकसभा की कार्यवाही 20 सितंबर तक के लिए स्थगित कर दी गई है।
बाकी विपक्ष भी महिला आरक्षण बिल के पक्ष में
तेलंगाना CM केसीआर की बेटी के. कविता ने 13 सितंबर को दिल्ली में 13 विपक्षी दलों के साथ बैठक की थी। इस दौरान उन्होंने संसद में बजट सत्र के दूसरे चरण में वुमन रिजर्वेशन बिल पेश करने की मांग की थी। कविता ने कहा था कि उनकी पार्टी भारत राष्ट्र समिति (BRS) का विश्वास है कि महिलाओं के लिए रिजर्वेशन के साथ-साथ कोटा के भीतर कोटा पर भी काम किया जाना चाहिए।
कविता लोकसभा और विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33% आरक्षण की मांग कर रही हैं। इसी मांग को लेकर कविता ने 10 मार्च को दिल्ली में एक दिन की भूख हड़ताल की थी। इसमें AAP, अकाली दल, PDP, TMC, JDU, NCP, CPI, RLD, NC और समाजवादी पार्टी समेत कई पार्टियां शामिल हुई थीं, लेकिन कांग्रेस ने हिस्सा नहीं लिया था।
तीन दशक से पेंडिंग था महिला आरक्षण बिल
संसद में महिलाओं के आरक्षण का प्रस्ताव करीब 3 दशक से पेंडिंग है। यह मुद्दा पहली बार 1974 में महिलाओं की स्थिति का आकलन करने वाली समिति ने उठाया था। 2010 में मनमोहन सरकार ने राज्यसभा में महिलाओं के लिए 33% आरक्षण बिल को बहुमत से पारित करा लिया था।
तब सपा और राजद ने बिल का विरोध करते हुए तत्कालीन UPA सरकार से समर्थन वापस लेने की धमकी दे दी थी। इसके बाद बिल को लोकसभा में पेश नहीं किया गया। तभी से महिला आरक्षण बिल पेंडिंग है।
बिल का विरोध करने के पीछे सपा-राजद के तर्क
सपा और राजद महिला OBC के लिए अलग कोटे की मांग कर रही थीं। इस बिल का विरोध करने के पीछे सपा-राजद का तर्क था कि इससे संसद में केवल शहरी महिलाओं का ही प्रतिनिधित्व बढ़ेगा। दोनों पार्टियों की मांग है कि लोकसभा और राज्यसभा में मौजूदा रिजर्वेशन बिल में से एक तिहाई सीट का कोटा पिछड़े वर्गों (OBC) और अनुसूचित जातियों (SC) की महिलाओं के लिए होना चाहिए।
महिलाओं के लिए राजनीतिक आरक्षण की मांग की टाइम लाइन
1931: भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के दौरान महिलाओं के लिए राजनीति में आरक्षण के मुद्दे पर चर्चा हुई थी। इसमें बेगम शाह नवाज और सरोजिनी नायडू जैसी नेताओं ने महिलाओं को पुरुषों पर तरजीह देने के बजाय समान राजनीतिक स्थिति की मांग पर जोर दिया।
संविधान सभा की बहसों में भी महिलाओं के आरक्षण के मुद्दे पर चर्चा हुई थी। तब इसे यह कहकर खारिज कर दिया गया था कि लोकतंत्र में खुद-ब-खुद सभी समूहों को प्रतिनिधित्व मिलेगा।
1947: फ्रीडम फाइटर रेणुका रे ने उम्मीद जताई कि भारत की आजादी के लिए लड़ने वाले लोगों के सत्ता में आने के बाद महिलाओं के अधिकारों और स्वतंत्रताओं की गारंटी दी जाएगी। हालांकि यह उम्मीद पूरी नहीं हुई और महिलाओं का राजनीतिक प्रतिनिधित्व सीमित ही रहा।
1971: भारत में महिलाओं की स्थिति पर समिति का गठन किया गया, जिसमें महिलाओं की घटती राजनीतिक प्रतिनिधित्व पर प्रकाश डाला गया। हालांकि समिति के कई सदस्यों ने विधायी निकायों में महिलाओं के लिए आरक्षण का विरोध किया, उन्होंने स्थानीय निकायों में महिलाओं के लिए आरक्षण का समर्थन किया।
1974: महिलाओं का प्रतिनिधित्व बढ़ाने के लिए महिलाओं की स्थिति पर एक समिति ने शिक्षा और समाज कल्याण मंत्रालय को एक रिपोर्ट सौंपी। इस रिपोर्ट में पंचायतों और नगर निकायों में महिलाओं के लिए सीटें आरक्षित करने की सिफारिश की गई थी।
1988: महिलाओं के लिए राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य योजना (National Perpective Plan) ने पंचायत स्तर से संसद तक महिलाओं को आरक्षण देने की सिफारिश की। इसने पंचायती राज संस्थानों और सभी राज्यों में शहरी स्थानीय निकायों में महिलाओं के लिए एक-तिहाई आरक्षण अनिवार्य करने वाले 73वें और 74वें संविधान संशोधनों की नींव रखी।
1993: 73वें और 74वें संविधान संशोधनों में पंचायतों और नगर निकायों में महिलाओं के लिए एक-तिहाई सीटें आरक्षित की गईं। महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, बिहार, छत्तीसगढ़, झारखंड और केरल सहित कई राज्यों ने स्थानीय निकायों में महिलाओं के लिए 50% आरक्षण लागू किया है।
1996: एचडी देवेगौड़ा की सरकार ने 81वें संविधान संशोधन विधेयक के रूप में संसद में महिला आरक्षण विधेयक पेश किया। इसके तुरंत बाद, उनकी सरकार अल्पमत में आ गई और 11वीं लोकसभा भंग हो गई
1998: राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) सरकार ने 12वीं लोकसभा में 84वें संविधान संशोधन विधेयक के रूप में विधेयक को फिर से पेश किया। इसके विरोध में एक राजद सांसद ने विधेयक को फाड़ दिया। विधेयक फिर से लैप्स हो गया, क्योंकि वाजपेयी सरकार के अल्पमत में आने के साथ 12वीं लोकसभा भंग हो गई थी।
1999: NDA सरकार ने 13वीं लोकसभा में एक बार फिर विधेयक पेश किया, लेकिन सरकार फिर से इस मुद्दे पर आम सहमति जुटाने में नाकाम रही। NDA सरकार ने 2002 और 2003 में दो बार लोकसभा में विधेयक लाया, लेकिन कांग्रेस और वामपंथी दलों ने समर्थन का आश्वासन दिए जाने के बाद भी इसे पारित नहीं कराया जा सका।
2004: सत्ता में आने के बाद संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (UPA) सरकार ने साझा न्यूनतम कार्यक्रम (CMP) में अपने वादे के तहत बिल पारित करने की अपनी मंशा की घोषणा की।
2008: मनमोहन सिंह सरकार ने विधेयक राज्यसभा में पेश किया और 9 मई, 2008 को इसे कानून और न्याय पर स्थायी समिति को भेजा गया।
2009: स्थायी समिति ने अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की और विधेयक को समाजवादी पार्टी, जेडीयू और राजद के विरोध के बीच संसद के दोनों सदनों में पेश किया गया।
2010: केंद्रीय मंत्रिमंडल ने महिला आरक्षण बिल को मंजूरी दी। विधेयक राज्यसभा में पेश किया गया, लेकिन सपा और राजद के UPA सरकार से समर्थन वापस लेने की धमकियों के बाद मतदान स्थगित कर दिया गया। 9 मार्च को राज्यसभा से महिला आरक्षण विधेयक को 1 के मुकाबले 186 मतों से पारित कर दिया गया। हालांकि, लोकसभा में 262 सीटें होने के बावजूद मनमोहन सिंह सरकार विधेयक को पारित नहीं करा पाई।
2014 और 2019: भाजपा ने अपने चुनावी घोषणापत्रों में महिलाओं के लिए 33% आरक्षण का वादा किया, लेकिन इस मोर्चे पर कोई ठोस प्रगति नहीं की।
बिल पर PM के भाषण की तीन अहम बातें
- आज की तारीख अमरत्व प्राप्त करेगी: कल 18 सितंबर को ही कैबिनेट में महिला आरक्षण विधेयक को मंजूरी दी गई है। आज 19 सितंबर की यह तारीख इसलिए इतिहास में अमरत्व प्राप्त करने जा रही है। आज महिलाएं हर क्षेत्र में तेजी से आगे बढ़ रही हैं, नेतृत्व कर रही हैं तो बहुत आवश्यक है कि नीति निर्धारण में हमारी मांएं-बहनें, हमारी नारी शक्ति अधिकतम योगदान दें। योगदान ही नहीं, महत्वपूर्ण भूमिका भी निभाएं।
- नारी शक्ति वंदन अधिनियम: देश की नारी शक्ति के लिए सभी सांसद मिलकर नए प्रवेश द्वार खोल दें, इसका आरंभ हम इस महत्वपूर्ण निर्णय से करने जा रहे हैं। महिलाओं के नेतृत्व में विकास के संकल्प को आगे बढ़ाते हुए हमारी सरकार एक प्रमुख संविधान संशोधन विधेयक पेश कर रही है। इसका उद्देश्य लोकसभा और विधानसभाओं में महिलाओं की भागीदारी को विस्तार देना है। नारी शक्ति वंदन अधिनियम के माध्यम से हमारा लोकतंत्र और मजबूत होगा।
- बिल पर काफी चर्चा, वाद-विवाद हुए: कई सालों से महिला आरक्षण के संबंध में बहुत चर्चा हुई। काफी वाद-विवाद हुए। महिला आरक्षण को लेकर संसद में पहले भी कुछ प्रयास हुए हैं। 1996 में इससे जुड़ा विधेयक पहली बार पेश हुआ। अटल जी के कार्यकाल में कई बार महिला आरक्षण विधेयक पेश किया गया, लेकिन उसे पास कराने के लिए आंकड़े नहीं जुटा पाए और उस कारण से वह सपना अधूरा रह गया। महिलाओं को अधिकार देने, उन्हें शक्ति देने जैसे पवित्र कामों के लिए शायद ईश्वर ने मुझे चुना है।
नेता प्रतिपक्ष के बयान पर सदन में हंगामा हुआ
कांग्रेस नेता अधीर रंजन चौधरी के बयान पर हंगामा हुआ। उन्होंने कहा कि मनमोहन सिंह के कार्यकाल के दौरान बिल लाया गया था। यह बिल अभी मौजूद है। इस पर गृह मंत्री अमित शाह ने कहा कि हम नया बिल लाए हैं। आप जानकारी दुरुस्त कर लीजिए।
इसके बाद विपक्षी सांसदों ने बिल की कॉपी को लेकर हंगामा किया। इनका कहना था कि उन्हें बिल की कॉपी नहीं मिली है। सरकार का कहना था कि बिल को अपलोड कर दिया गया है।
जब सभापति के आसन पर चढ़ गए सांसद:महिला आरक्षण विधेयक फाड़ा, माइक तोड़े; 27 सालों से कैसे लगता रहा अड़ंगा
8 मार्च 2010 की दोपहर। राज्यसभा में अफरा-तफरी मची थी। समाजवादी पार्टी के सांसद नंद किशोर यादव और कमाल अख्तर चेयरमैन हामिद अंसारी की टेबल पर चढ़ गए और माइक उखाड़ने की कोशिश की।
राष्ट्रीय जनता दल के राजनीति प्रसाद ने बिल की कॉपी फाड़कर चेयरमैन की तरफ उछाल दी। लोकजनशक्ति पार्टी के साबिर अली और निर्दलीय सांसद एजाज अली ने भी डिस्कशन रोकने की कोशिश की।
8 मार्च 2010 को राज्यसभा के सभापति हामिद अंसारी की टेबल से महिला आरक्षण विधेयक की कॉपी खींचने और माइक तोड़ने की कोशिश करते सांसद। ये तस्वीर राज्यसभा टीवी के प्रसारण के दौरान लिया गया स्क्रीनशॉट है।
ये लोग महिला आरक्षण विधेयक का विरोध कर रहे थे। अगले दिन यानी 9 मार्च 2010 को हंगामा करने वाले सभी 7 सदस्यों को सस्पेंड कर दिया गया और मार्शल उन्हें पकड़कर बाहर ले गए। इसके बाद विधेयक पर वोटिंग हुई। इसके पक्ष में 186 मत पड़े और विरोध में सिर्फ 1 वोट। BSP वॉकआउट कर गई थी और TMC ने वोटिंग में हिस्सा ही नहीं लिया।
पहली बार प्रस्तावित होने के 14 साल बाद महिला आरक्षण विधेयक राज्यसभा में पारित हो गया। उसके बाद से 13 साल हो गए, ये बिल लोकसभा में पास नहीं हो सका। अब 2023 में मोदी सरकार ने भी इसे संसद में पेश कर दिया है। अगर ये पारित हो गया तो लोकसभा और विधानसभा चुनाव में महिलाओं के लिए 33% सीटें आरक्षित हो जाएंगी।
यूनाइटेड फ्रंट सरकारः पहली कोशिश की, लेकिन सुझावों में अटकी
1996 में 13 दलों की गठबंधन वाली यूनाइडेट फ्रंट सरकार ने इस दिशा में पहली कोशिश की थी। उस समय के कानून मंत्री रमाकांत डी खलप ने संविधान में 81वें संशोधन के लिए संसद में एक बिल पेश किया। इसके तहत संविधान में दो नए कानून अनुच्छेद 330A और 332A जोड़ा जाना था।
जनता दल समेत सरकार को समर्थन देने वाली कई पार्टियों ने इस बिल का विरोध कर दिया। इस विरोध से सरकार घबरा गई। आखिरकार बिल को 31 सांसदों वाले एक संयुक्त समिति के पास विचार करने के लिए भेज दिया गया।
CPI नेता गीता मुखर्जी इस कमेटी की अध्यक्ष थीं। नीतीश कुमार, मीरा कुमार, ममता बनर्जी, सुमित्रा महाजन, शरद पवार, उमा भारती, राम गोपाल यादव, सुशील कुमार शिंदे जैसे सांसद इस कमेटी के सदस्य थे। इस कमेटी ने कई सुझाव दिए…
- इस बिल में ज्यादा आपत्ति महिला आरक्षण को लेकर लिखे गए एक शब्द ‘एक तिहाई से कम नहीं’ को लेकर थी। उनका कहना था कि ये शब्द अस्पष्ट है। इस शब्द की व्याख्या अलग-अलग तरह से हो सकती है। इस शब्द को ‘एक तिहाई के जितना करीब संभव हो सके’ लिखा जाना चाहिए।
- राज्यसभा और विधान परिषदों में महिलाओं को आरक्षण मिलना चाहिए। इसके साथ ही अन्य पिछड़ा वर्ग यानी OBC को भी आरक्षण का उचित लाभ मिलना चाहिए।
- लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए सीटों के आरक्षण लागू होने से लेकर सिर्फ 15 साल के लिए होने चाहिए। उसके बाद यह समीक्षा की जाए कि आगे महिलाओं को इस आरक्षण की जरूरत है या नहीं है।
- जिन राज्यों में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए तीन से कम सीटों पर आरक्षण लागू है, वहां इसे रोटेशन के आधार पर लागू किया जाए। मान लीजिए A,B,C तीन आरक्षित सीट हैं तो पहली बार A, फिर B और फिर अगली बार C सीट को महिलाओं के लिए आरक्षित किया जाए।
- संसद के तर्ज पर ही दिल्ली विधानसभा में महिलाओं के लिए सीट आरक्षित करने की बात की।
- बिल में SC, ST के साथ OBC महिलाओं को भी उचित सम्मान मिलना चाहिए। साथ ही उन्होंने आबादी के अनुपात में महिलाओं को आरक्षण देने की बात कही थी।
इस बिल के विरोध में सांसद शरद यादव ने कहा था- ‘कौन महिला है, कौन नहीं है। केवल छोटे बाल रखने वाली महिलाओं को इसका लाभ नहीं मिलने देंगे।’ यूनाइटेड फ्रंट सरकार अपने ही समर्थक दलों के इस विरोध की वजह से इस बिल को पास नहीं करा पाई।
वाजपेयी सरकार: कई बार कोशिशें की, लेकिन सफल नहीं हुए
1998 से 2004 के बीच अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में NDA सरकार ने सदन से इस बिल को पास कराने की कोशिश कई बार की थी। पहली बार 13 जुलाई 1998 में कानून मंत्री एम थंबी दुरई ने लोकसभा में इस बिल को पेश किया था। जिसका राजद, सपा समेत कई दलों ने विरोध किया। राजद सांसद सुरेंद्र प्रसाद यादव ने स्पीकर जीएमसी बालयोगी के हाथ से बिल की कॉपी को छीनकर फाड़ दिया था।
बिहार सरकार में अभी के मंत्री सुरेंद्र प्रसाद यादव ने इस बिल के फाड़ने पर कहा था कि बीआर अंबेडकर ने उनके सपने में आकर ऐसा करने के लिए कहा था। इस बिल को 14 जुलाई को एक बार फिर से लोकसभा में पेश करने की कोशिश हुई। हालांकि राजनीतिक दलों के हंगामे और सहमति नहीं बन पाने की वजह से ऐसा संभव नहीं हो सका।
11 दिसंबर 1998 को फिर लोकसभा में इस बिल को पेश करने की कोशिश हुई। तब सपा सांसद दरोगा प्रसाद स्पीकर के पोडियम तक पहुंच गए। इस वक्त धक्का-मुक्की की स्थिति बन गई। आखिरकार सरकार ने एक बार फिर अपना हाथ पीछे खींच लिया। 23 दिसंबर 1998 को आखिरकार सदन में इस बिल को पेश करने में सरकार कामयाब रही। इस समय भी सपा, बसपा समेत कई दलों ने जोरदार विरोध दर्ज कराया। NDA सरकार को समर्थन देने वाली नीतीश कुमार की पार्टी JDU ने एक बार फिर विरोध किया। एक बार फिर पहले की तरह ये बिल सदन में पास नहीं हो सका।
अटल बिहारी सरकार में उस समय के कानून मंत्री राम जेठमलानी ने 23 दिसंबर 1999 को एक बार फिर से सदन में इस बिल को पेश किया। एक बार फिर सपा, बसपा और राजद के सांसदों ने इस बिल का जोरदार विरोध किया।
वाजपेयी सरकार ने इसके बाद तीन बार – 2000, 2002 और 2003 में इस विधेयक को आगे कानून बनाने की कोशिश की। हालांकि हर बार की तरह इन सभी मौकों पर अटल सरकार को कामयाबी नहीं मिली। जुलाई 2003 में भाजपा नेता मुरली मनोहर जोशी ने इस मुद्दे पर आम सहमति बनाने की कोशिश की। इसके लिए उन्होंने एक सर्वदलीय बैठक बुलाई, लेकिन असफल रहे। इस वजह से विधेयक पास नहीं हो पाया।
महिला आरक्षण विधेयक के लिए नई दिल्ली में प्रदर्शन करतीं विमेन एक्टिविस्ट। ये तस्वीर 18 जुलाई 2016 को संसद के मानसून सत्र के दौरान की है। (Photo: AFP)
मनमोहन सरकारः राज्यसभा में पारित करा लिया, लेकिन लोकसभा में नहीं
2004 में कांग्रेस के नेतृत्व में UPA की सरकार बनी और मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री बने। उस वक्त के राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम ने 2004 में दिए अपने संयुक्त संसदीय भाषण में महिलाओं के आरक्षण को लेकर सरकार के कमिटमेंट को दोहराया।
UPA सरकार ने 6 मई 2008 को इस बिल को 108वें संविधान संशोधन विधेयक के रूप में राज्यसभा में पेश किया। उस दौरान सपा सांसद अबू आजमी ने कानून मंत्री एचआर भारद्वाज की तरफ दौड़कर बिल फाड़ने की कोशिश की थी।
बिल पेश होने के बाद पार्लियामेंट की स्टैंडिंग कमेटी को भेज दिया गया। कमेटी ने दिसंबर 2009 में अपनी रिपोर्ट सौंपी। सुझाव दिया गया कि इस बिल को मौजूदा स्वरूप में ही पारित किया जाना चाहिए।
9 मार्च 2010 को राज्यसभा में महिला आरक्षण विधेयक भारी बहुमत से पारित हुआ। बीजेपी, लेफ्ट पार्टियों और जेडीयू ने बिल का समर्थन किया था। इसका विरोध करने वालों में समाजवादी पार्टी और राष्ट्रीय जनता दल शामिल थीं।
2010 में राज्यसभा में महिला आरक्षण बिल पास होने के बाद विक्ट्री साइन दिखातीं उस वक्त लोकसभा में विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज, BJP नेता नजमा हेपतुल्ला और CPIM नेता वृंदा करात।
हालांकि UPA सरकार ने इस बिल को लोकसभा में पेश नहीं किया। कांग्रेस को डर था कि अगर उसने बिल को लोकसभा में पेश किया तो उसकी सरकार खतरे में पड़ सकती है। राज्यसभा स्थायी सदन है। ये कभी भंग नहीं होता। इसलिए ये विधेयक अभी भी जिंदा है। अब 19 सितंबर 2023 को मोदी सरकार ने इस विधेयक लोकसभा में पेश किया है।
भारत में महिला आरक्षण विधेयक की कहानी भले ही 27 साल पहले शुरू हुई, लेकिन इसकी मांग एक सदी पुरानी है…
- महिलाओं के लिए राजनीति में आरक्षण की मांग आजादी से पहले से उठ रही है। 1931 में बेगम शाह नवाज और सरोजिनी नायडू ने इस संबंध में ब्रिटिश प्रधानमंत्री को एक पत्र लिखा था। इसमें महिलाओं के लिए राजनीति में समानता की मांग की गई थी।
- संविधान सभा की बहसों में भी महिलाओं के आरक्षण के मुद्दे पर चर्चा हुई थी। तब इसे यह कहकर खारिज कर दिया गया था कि लोकतंत्र में खुद-ब-खुद सभी समूहों को प्रतिनिधित्व मिलेगा।
- 1971 में नेशनल एक्शन कमेटी ने भारत में महिलाओं के घटते राजनीतिक प्रतिनिधित्व पर चर्चा की। कमेटी के कई सदस्य विधायी निकायों में महिलाओं के लिए आरक्षण के खिलाफ थे। हालांकि उन्होंने स्थानीय निकायों में महिलाओं के लिए आरक्षण का समर्थन किया। इसके बाद देशभर के कई राज्यों ने स्थानीय निकायों में महिलाओं के लिए आरक्षण की घोषणा की।
- 1988 में महिलाओं के लिए नेशनल पर्सपेक्टिव प्लान ने पंचायत स्तर से संसद तक महिलाओं को आरक्षण देने की सिफारिश की। इसने पंचायती राज संस्थानों और सभी राज्यों में शहरी स्थानीय निकायों में महिलाओं के लिए एक-तिहाई आरक्षण अनिवार्य करने वाले 73वें और 74वें संविधान संशोधनों की नींव रखी। इन सीटों में से एक तिहाई सीटें अनुसूचित जाति यानी SC और अनुसूचित जनजाति यानी ST की महिलाओं के लिए आरक्षित हैं।
- 1993 में 73वें और 74वें संविधान संशोधनों में पंचायतों और नगर निकायों में महिलाओं के लिए एक-तिहाई सीटें आरक्षित की गईं। महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, बिहार, छत्तीसगढ़, झारखंड और केरल सहित कई राज्यों ने स्थानीय निकायों में महिलाओं के लिए 50% आरक्षण लागू किया है।

