*प्रगतिशील लेखक संघ के 18 वें राष्ट्रीय सम्मेलन *
*दिनेश चौधरी

लेखकों के सम्मेलन में देश भर से भारी तादाद में लेखक जुटे हैं। जितने बुलाए गए थे उससे कोई डेढ़ गुना ज्यादा। लेखक इतने हैं तो उम्मीद की जानी चाहिए कि पाठक भी भारी मात्रा में होंगे। लेखक पाठक से अपनी रचना के जरिए संवाद ही करता है। पर क्या यह वैसा ही है, जैसे परसाई जी अपने पाठकों के साथ करते थे? इस आयोजन के केंद्र में वही है और इसकी पंचलाइन भी उनके एक निबंध पर आधारित है -“ठिठुरता हुआ गणतन्त्र।” परसाई जी पूर्णकालिक लेखक थे। लिखने से घर-परिवार चलता था। जब आप इसी के भरोसे चल रहे हों तो आपको अपने काम के प्रति जवाबदेह होना पड़ता है। आज लेखक या रंगकर्मी किसके लिए एकाउंटेबल हैं? यह न हो तो उसके ऊपर कोई दबाव नहीं बनता और कभी-कभी वह भूल जाता है कि वह जो रच रहा है, वह किसे सम्बोधित है।
यह जो जनता है उसे पाठक बनाने में परसाई जी ने इतना किया कि जनता से जनता की भाषा में बात कही। सरल, साफ और दो टूक। इधर बहुत से विद्वान जब परसाई के लिखे पर बड़े ही गम्भीर विमर्श करते हैं तो वह अपने सिर के ऊपर से निकल जाता है। परसाई के लिखे को पढ़ते हुए यह संकट कभी उत्पन्न नहीं हुआ। यह मुमकिन भी है। आलोचना की भाषा अकादमिक होती है। आलोचक लेखक के लिए लिखता है। इधर गड़बड़ यह हुई कि लेखक भी आलोचक के लिए लिखने लगा। या वे एक-दूसरे के लिए लिखने लगे या कभी सिर्फ अपने लिए! लिखते हुए पाठक बेचारा न उनकी निगाह में होता है, न जेहन में। वे पाठक को ही दो कौड़ी का समझने लगे, जैसे रंगकर्मी दर्शक को और ठिठुरते हुए गणतन्त्र में सियासी नुमाइंदे उस आम-अवाम को जो उन्हें राज-सिंहासन तक पहुँचाती है। संकटों की शुरुआत यहीं से होती है, जिसमें से एक संवादहीनता की है। संवाद के तौर-तरीके बदलने रहने चाहिए और जरूरत पड़ने पर तकनीक के उपयोग से भी परहेज नहीं करना चाहिए। इसके कुछ टूल्स का इस्तेमाल उन लोगों ने हमसे बेहतर ढंग से किया है, जिन्हें हम मूर्ख समझते हैं।
साहित्य अब राजनीति के आगे चलने वाली मशाल नहीं रही। बाज लोगों ने इसे राजनीति की पीछे उसकी जूतियाँ उठाकर चलने वाली पालकी बना दी है। संस्कृति के प्रतीकों को सियासत ने अपहृत कर लिया है, इसलिए अब संस्कृतिकर्मियों को कुछ समय के लिए ही सही प्रतीकों-उपमानों की भाषा छोड़ देनी चाहिए। यह सीधी बात का वक्त है, भले ही कला का कुछ क्षरण हो जाए। परसाई की भाषा सरल भाषा है। सीधी-सपाट, दो टूक और अक्खड़। ठेठ देसी लहजा। सीधे दिल पर लगने वाली। चीर कर धर देने वाली और कभी-कभी आहत करने वाली। बुरा भी लग जाता। लगती रहे उनकी बला से, हम तो अपना काम करते रहेंगे! यह कबीर की बानी है।
शुक्र है कि यह जज्बा अभी खत्म नहीं हुआ है। कुछ लोग अब भी हैं जो इस भाषा में, इसी लहजे में बात कर रहे हैं। तरीके सबके अलग-अलग हैं। सम्मेलन- स्थल की सज्जा अवधेश बाजपेयी के हाथों में है। मंच में पीछे की ओर जो पर्दा लगा है, उसकी पृष्टभूमि काली है। अंधेरे समय में यह काली-स्याह न होकर और क्या हो सकती है? स्याह अंधेरों में चाँद उग तो आया है, पर वह चमकदार नहीं है। उसका चेहरा मेहबूब की तरह नहीं है। वह बिल्कुल रोटी की तरह दिखता है, जिसके हजारों दीवाने हैं और जिनका बसर फुटपाथ पर ही है। रोशनी है पर वह बहुमंजिला इमारतों की खिड़कियों में कैद है। यह सब देखते हुए उस शख्स की आँखे जुड़ा गयी हैं, जिसके हाथ में लुकाटी है। वह कबीर है या शायद परसाई है। जो भी है, दोनों ही लाठी या कलम का इस्तेमाल एक ही तरह करते हैं।
मंच के बगल में वह पान-ठेला है, जहाँ परसाई पान खाते थे। जनता के लेखक को पान-ठेले पर नियमित रूप से जाना चाहिए। इस पान-ठेले की बुनियाद मुल्क की तरह कमजोर हो गयी है। कहीं से ईंट कहीं से रोड़ा जुटाकर इसे किसी तरह खड़ा रखा गया है। यह टिक कर खड़े रहने और भरभराकर गिर जाने से बीच की मुद्रा है। पान के टपरे के ऊपर लगा बल्ब भी काला है। अंधेरों से जूझते हुए वह भी काला हो गया है। वह मटमैली पीली रोशनी नहीं फैला रहा है, अंधेरों को और गाढ़ा कर रहा है। अवधेश चित्र की सज्जा के लिए फूलों का इस्तेमाल नहीं करते, वे उसे काँटेदार नागफनी से सजाते हैं। चित्रकार को उम्मीद है कि काँटों से खुरच-खुरच कर गाढ़ी-स्याह परतें हटाई जा सकती हैं। रचनाकार की अभिव्यक्ति काँटों की तरह नुकीली और चुभती हुई होनी चाहिए।
बीती रात को परसाई जी की रचना पर आधारित नाटक ‘निठल्ले की डायरी’ खेला गया। यहाँ निठल्ले के साथ कक्काजी की जुगलबन्दी है। वे ठेठ जबलईपुर के हैं तो वैसे ही अक्खड़ हैं। दिन भर बैठे-बैठे मूँछ के सफेद बाल उखाड़ते हैं। चरित्रवान हैं पर “कैरेक्टरलेस” हैं!!! सेना जब मोर्चे पर जाती है तो गोला-बारूद से लैस होती है। कक्काजी उसी तरह कैरेक्टर से लैस हैं। दर्शक को यह अदा भाती है। कहने का लहजा सही हो तो कही गयी बात लोगों तक पहुँचती है। यही जनता से संवाद की भाषा है।
बालेंदु परसाई, राजेन्द्र दुबे, रोहित रूसिया, पंकज दीक्षित के कार्टून और पोस्टर हैं। परसाई के लिखे पर कार्टून बनाना नीम चढ़े करेले की तरह है। इसका सेवन कई बीमारियों को एक झटके में ठीक कर सकता है। संवाद करने का एक लहजा निसार अली का भी है। नाचा थिएटर करते हैं। परसाई, मुक्तिबोध, भीष्म साहनी और टॉलस्टॉय तक को अपनी लोक-शैली में उतार लाते हैं। अभ्यस्त हैं। जनता के बीच सीधे जाकर जनता को खुद के साथ के कनेक्ट कर लेते हैं। उनके दल में एक ‘परी’ भी है-सजी, संवरी। नृत्य के साथ गीत चलता है, “तोर बर मैं मरूँ, मोर बर तैं” (तेरे लिए मैं मरूँ, मेरे लिए तू)। मछली को फाँसने के लिए काँटे पर केंचुए को लगा दिया गया है। केंचुआ मर गया है और उसकी लालच में अब मछली भी मरने वाली है। असल शिकारी कोई और है, जिसके हाथ में ‘फिशिंग रॉड’ है। निसार इन्हीं हाथों की शिनाख्त करने को कहते हैं।
प्रसन्ना जब कहते हैं कि लेखकों को लिखना बन्द कर जनता से संवाद करना चाहिए तो यह आह्वान शायद उनसे है जो सिर्फ अपने लिए रचते हैं। जो कुछ अबूझ-अमूर्त-सा रचते हैं और जिन्हें पढ़कर पढ़ने वाले को पढ़ने से अरुचि हो जाए। यह काम कलाओं के हरेक हलके में हो रहा है और रचनाकार बहुत ऊँची आसंदी पर विराजमान हैं –
हम नीची नज़र करके ढूंढत हैं चरण तुम्हरे
तुम जाइ के बैठे हो का ऊँची अटरिया मा
प्रसन्ना कह रहे हैं कि संवाद करना है तो ऊँची अटरिया से उतरकर नीचे आना होगा।