ग्वालियर में झमाझम बरसते पानी की फुहारों के मौसम में, आईटीएम यूनिवर्सिटी ग्वालियर की ओर से आयोजित दो दिन के मेघ मल्हार संगीत उत्सव में नौजवान पीढ़ी के बीच बैठकर, आज शास्त्रीय संगीत गुरुकुल के महान आचार्य उस्ताद अलाउद्दीन खान सभागार में बैठकर पंडित हरीश तिवारी का गायन सुना।
मौसम के मुताबिक राग मियां मल्हार तथा बाद में सूरदासी मल्हार में उनके गायन ने स्वर की मल्हार में नहला दिया। स्कूली बच्चों से लेकर इंजीनियरिंग, मैनेजमेंट, टेक्नोलॉजी, एग्रीकल्चर, स्पोर्ट्स, खेलकूद जैसे विषयों की बड़ी क्लास के लड़के-लड़कियों ने दत्तचित्त होकर गायन सुना।ग्वालियर, क्योंकि शास्त्रीय संगीत का एक बड़ा मरकज रहा है, शहर से भी शास्त्रीय संगीत शास्त्र के गुंनीजन बड़ी तादाद में गायन के बीच पहचाने जा रहे थे, क्योंकि गायन में दाद कब, कहां देनी है, उस पर उनकी सहज प्रतिक्रिया दिखाई पड़ रही थी। गायन सुनते वक्त मुझे हमारे नेता मधु लिमये की याद आ रही थी, जिनके कारण मेरी शास्त्रीय संगीत में रुचि पैदा हुई। आज की संगीत सभा के आयोजक तथा रूहेरवा रमाशंकर सिंह को भी मधु जी की संगत से शास्त्रीय संगीत से लगाव और चाहत पैदा हुई थी। इस मौके पर मैं अपने साथी रविंद्र मिश्रा, जो देश के नामवर संगीत समीक्षक हैं, तथा वे भी मधु जी की संगत में बरसों रमे रहे हैं।मधु जी की संगीत संगति पर आधारित, मेरा और मिश्रा जी के दो यादगार लेख प्रस्तुत हैं।

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*मधु लिमये : आनंद के लिए शास्त्रीय संगीत,*
*प्रो. राजकुमार जैन*
मधु लिमए के अति निकट जाने का एक महत्त्वपूर्ण कारण, भारतीय शास्त्रीय संगीत था। दिल्ली में हमारे समाजवादी साथी रवींद्र मिश्रा, जो कि शास्त्रीय संगीत के चोटी के समीक्षक हैं, हम दोनों संगीत की महफिल में मधु जी की संगत करते थे।
शास्त्रीय संगीत, एक अति कठिन विधा है, परंतु हिंदुस्तान के सियासतदानों में शायद मधुजी जैसे कम लोग ही रहे होंगे जिनको भारतीय शास्त्रीय संगीत में दिलचस्पी के साथ-साथ उसके शास्त्रीय पक्ष की भी जानकारी रही हो। इनके पिताजी, संगीत के बड़े विद्वान थे।
वर्ष 1937 में मधुजी की मैट्रिक की परीक्षा के दिन नजदीक आने लगे। पढ़ाई को लेकर मधु जी के पिताजी बार-बार कहने लगे, लेकिन उन दिनों ये संगीत के प्यार में डूबे हुए थे। बचपन में नाट्य संगीत के जरिये, शास्त्रीय गाने से इनकी पहचान करवाई गई। ये राग भीमपलाश, बागेश्री, दरबारीकाड़ा, मालकोंश, यमन, भूप, दुर्गा, शंकरा, केदार पहचानने लगे। एक दिन इनके पिताजी ने संगीत की एक किताब पढ़ते हुए इन्हें देख लिया, उन्हें बहुत गुस्सा आया। डाँट सुनाई, लेकिन इनके संगीत के शौक में कभी कमी नहीं आई। मधु जी का कहना था कि “क्योंकि मेरी आवाज अच्छी नहीं है, इसलिए मैं केवल कानसेन (कानों से सुनने वाला, न कि प्रसिद्ध संगीतज्ञ, कानसेन बनकर रह गया, सुनने की लत मैंने कभी नहीं छोड़ी। गाने के कार्यक्रमों में जाने का एक भी मौका मैं गँवाता नहीं था। संगीत और नृत्यकला का में रसिक और भक्त हूँ।
हिंदुस्तान के बड़े-से-बड़े नामी संगीतकार, उस्ताद, नर्तक, गवैये, मधु जी के मुरीद थे। इनके घर पर मैंने कुमार गंधर्व, भीमसेन जोशी, जितेंद्र अभिषेकी, डागर बंधु, यामिनी कृष्णमूर्ति, सोनल मानसिंह, उमा शर्मा जैसे कलाकारों को संगीत चर्चा करते हुए देखा है। संगीतकारों के कमजोर पक्ष पर सलाह भी देते थे। मधु जी की संगीत पर कितनी गहरी जानकारी थी, इसका एक उदाहरण है, एक दिन मधु जी के साथ दिल्ली के प्रगति मैदान गया हुआ था, वहाँ हॉल में किसी का गायन था। थोड़ी देर में ही मधु जी बाहर आ गए, उन्होंने मुझसे कहा कि जाकर पता लगाओ कि यह कौन सा राग है। मैं कलाकार से पूछकर आया, उन्होंने बताया ‘परज’ राग। मैंने मधु जी को बताया, मधुजी ने हँसते हुए, हाथ में रखी एक पर्ची, जिस पर ‘परज’ लिखा हुआ था दिखायी। मेरी संगीत की परीक्षा मधुजी हँसते हुए लेते रहते थे, हालांकि मेरी संगीत जानकारी बहुत ही मामूली है, परंतु जब भी कुछ गाना अथवा वाद्य यंत्र का बजाया सुनने को पड़ता तो मधु जी पूछते थे कि बताओ क्या राग है? संगीत का कितना दीवानापन उनको था इसकी कई बातें मुझे याद हैं।
भरत नाट्यम नृत्य की जगत प्रसिद्ध नृत्यांगना यामिनी कृष्णमूर्ति का प्रेम विवाह समाजवादी साथी, सुप्रीम कोर्ट के वकील और दिल्ली के नामी मशहूर मिठाई ‘चाइन राम सिंधी’ हलवाई के बेटे साथी संतोख सिंह के साथ मधु जी के घर 15 ए.बी. पंडारा रोड के घर पर होना निश्चित हुआ। मधु जी और चंपा जी ने कन्यादान किया। सुबह से मधु जी चंपा जी तैयारी में लग गए, सुगंधित फूलों से घर सजाया गया। चंपा जी ने मराठी साड़ी और उपहार नवदंपति को भेट दिए।)
ओडिसी नृत्यांगना तथा राज्यसभा सदस्य सोनल मानसिंह लिखती हैं :
“मधु लिमये से मिलने के बाद उनके अंदर के जिन मधु जी को मैंने जाना, वे मधु जी बहुत गंभीर, शालीन, गरिमापूर्ण और बेहद सुलझे हुए व्यक्ति थे, उनका हृदय विशाल था, उनकी रुचियाँ बहुत विस्तृत थीं। ऐसा कोई विषय नहीं था जिसमें उनकी रुचि न रही हो। महाभारत पर तो उनका अधिकार–सा था। संस्कृत भाषा और भारतीय बोलियों के वे जानकार थे, वे तुरंत बता दिया करते थे कि कौन सा राग बज रहा है। जरा सा स्वर गलत होते ही वे तुरंत पकड़ लिया करते थे।) एक बार शंकरलाल म्यूजियम फेस्टिवल में अली अकबर खां और रविशंकर जी का प्रोग्राम था। बहुत बरसों बाद इन दोनों की जुगलबंदी हो रही थी। मधु जी उस दिन बंबई से आ रहे थे, पालम एयरपोर्ट से वे सीधे ही कार्यक्रम में पहुँच गए। कार्यक्रम जब शुरू हो गया तो थोड़ी देर में मधु जी कुछ बेचैन से होकर सीट से इधर-उधर खिसकने लगे। मैंने जब पूछा कि आप अनमने से क्यों हैं तो कहने लगे कि सितार ही मिली हुई नहीं है तो कैसे सुनूं। उस दिन मुझे अहसास हुआ कि संगीत में उनका कितना दखल है।”
हिंदुस्तान की संसद में संविधान, अर्थशास्त्र, विदेश नीति का पाठ पढ़ानेवाले मधु जी का आंतरिक सुख और रस, अध्ययन और संगीत से मिलता था। उनके घर में पुराने किसम का एक टेप-रिकार्डर था। जब मधु जी आनंद के हिलोरे लेने के लिए अपने मनपसंद कैसेट को लगाकर, रसोईघर में कुछ बनाने के लिए घुस जाते उस समय उनको बाहरी दखल बिलकुल भी पसंद नहीं था। एक रात्रि को मधु जी मराठी में, लता मंगेशकर की ज्ञानेश्वरी और खत्म होते ही राग शंकरा बिना घर में बल्ब जलाए आँख मीचकर मग्न होकर सुन रहे थे। राग खत्म होने पर जब मैंने घर का दरवाजा खोला तो देखा कि दरवाजे से सटकर एक विदेशी लड़की वहाँ बैठी हुई है। बिना कुछ समझे हुए मधु जी ने उसको ‘गो अवे’ कह दिया। वह उठकर चली गई, एक क्षण में ही मधु जी माजरा समझ गए। मुझसे कहा भागकर जाओ, उससे माफी मांग कर आओ, वह तो बेचारी संगीत सुन रही थी।
संगीत रसिक मधु लिमए की राजनीतिक व्यस्तता से उत्पन्न शारीरिक थकान को दूर करने का एक माध्यम शास्त्रीय संगीत के गायन वादन को सुनना होता था। आनंद के इन क्षणों में कुछ संगीत उन्हें विशेष रूप से प्रिय था। लता मंगेशकर के द्वारा गायी गई संत ज्ञानेश्वर की माउली उन्हें विशेष पसंद थी।
भारतीय संसद के चार बार सदस्य रहे मधु लिमए को प्रधानमंत्री मोरारजी भाई देसाई तथा चौधरी चरण सिंह अपने मंत्रिमंडल में शामिल करने के लिए इसरार करते रहे, परंतु उन्होंने विनम्रता पूर्ण मना कर दिया। श्रीमती इंदिरा गांधी शासन के विरोधी होने के बावजूद, इंदिरा जी कई महत्वपूर्ण राष्ट्रीय अंतरराष्ट्रीय सवालों पर इनसे मशविरा लिया करती थी।
बरतानिया हुकूमत की मुखालफत करने के कारण सालों तक वे जेल में बंद रहे तथा पुर्तगाली जारशाही ने उन्हें 10 वर्ष के कठोर कारावास की सजा सुनाई थी। आजाद हिंदुस्तान में भी अन्याय, गैर बराबरी तथा नागरिक आजादी के खात्मे के विरुद्ध उन्होंने लगातार संघर्ष किया, जेले काटी।
मराठी, हिंदी, संस्कृत, अंग्रेजी भाषा के उच्च कोटि के विद्वान मधु जी का लेखन 50 से अधिक किताबों में लिपिबद्ध है।
अंग्रेजी, हिंदी, मराठी के राष्ट्रीय समाचार पत्रों, पत्रिकाओं में लेख लिखने पर जो मानदेय उनको मिलता था उससे उनकी आजीविका चलती थी, हालांकि अगर वे चाहते तो स्वतंत्रता सेनानी, संसद सदस्य होने के नाते मिलने वाली पेंशन को ग्रहण कर सकते थे, परंतु उन्होंने कभी इसको स्वीकार नहीं किया।
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*राजनीति में राग दर्शनः मधु लिमये*
*रवीन्द्र मिश्र*
मधु लिमये महाराष्ट्र की भूमि के ऐसे यायावर समाजवादी चिंतक थे जिनका पूरा जीवन सक्रिय राजनीति में संघर्षमय रहा। भारत की आजादी के अन्दोलन से लेकर गोवा मुक्त के लिए एक सेनानी के रूप में जो उन्होंने आहुति दी, समाज में अन्याय और सांप्रदायिकता के खिलाफ पुरजोर से आवाज बुलंद करने वाले कद्दवर समाजवादी विचारक, नेता और सांसद के रूप में जो उन्होंने कीर्तिमान स्थापित किए वह बेहद चौकाने वाले थे। राजनीति में उनका संघर्षपूर्ण व रोमांचक सफर और संसदीय क्षेत्र में उनके उल्लेखनीय कार्य का ब्योरा राजनीति के इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में दर्ज है।
राजनीति के अलावा मधुतिमये के जीवन का विशेष और महत्वपूर्ण पक्ष था, उनका भारतीय शास्त्रीय संगीत के प्रति अगाध प्रेम। दरसल बचपन से ही संगीत से उनका नैर्सगिक रिश्ता था। मधु जी के पिता भी संगीत के गहरे जानकार और वाग्गेयकार थे। संगीत के संस्कार उन्हें अपने पिता से मिले। संगीत के रसिक होने के साथ मधुजी इस कला के एक उच्चकोटि के पारखी थे। हिन्दुस्तानी रागों को समझने में, उनकी विद्वता परिपूर्ण थी। गायन-वादन की रागदारी में किस स्वर पर मुखड़ा है, किस प्रकार के लय के अन्दोलन है, किस स्वर पर कितना आघात करना है आदि इन सभी पक्षो पर टिप्पणी करने में उनकी गूढ़ दृष्टि होती थी। अक्सर रात को अपने टेप रिकार्ड, सीडी या कैसेट के जरिए जब संगीत सुनते थे तो उस दौरान वे भारतीय संगीत की समृद्धशाली परम्परा पर चर्चा करते हुए तथ्यपरक जानकारी भी देते थे। उत्तर भारत की लोकप्रिय और विकसित ख्याल गायिकी का चार पांच सौ साल का इतिहास है और इस गायन शैली की कालजयी यात्रा में कई ऐसे बड़े फनकार शामिल हुए जिन्होंने गायन में नई अभिव्यक्ति ढूंढ़ी और काफी हद तक सुरों से सजाकर गायन को नया रंगरूप दिया। मधुजी का मनना था कि गायन की शास्त्रीय परम्परा लोक और शास्त्र के बीच आवाजाही का प्रमाण और परिणाम दोनो ही है। उससे प्रतीत होता है कि जिसे हम भारतीय संस्कृति कहते हैं शास्त्रीय व लोक संगीत उसका एक महत्वपूर्ण हिस्सा है।
मधुजी राजनीति के क्षेत्र में जितने प्रखर और ठोस लेखक और आलोचक थे उतनी ही गहराई से वे रागों के रहस्य की परतों को खोलते और उनका विश्लेषण करते थे। मधुलिमये जब कभी राजनैतिक हलचलों से गुजरते थे और राजनीति से जुड़े कई गम्भीर मुद्दों पर चर्चा के दौरान अक्सर वे वाद-विवाद में घिर जाते थे। तो उनके मन को शांति संगीत से ही मिलती थी। अगर गौर किया जाए तो लगता है कि उनके व्यक्तित्व में लेखन और संगीत दोनों के बीच गहरा तादम्य था। यह आश्चर्यजनक बात है कि मधुजी लेखन का कर्म भी संगीत के स्वरों की ध्वनि के साथ करते थे। इसमें कोई अतिशयोक्ति नहीं कि मधुलिमये का जो बहुमुखी व्यक्तित्व था उसमें राजनीति साहित्य संगीत और विविध कला विद्याओं का पूरी तरह से समावेश था। पर संगीत में मानो उनकी आत्मा बसती थी। यह जानना ज़रूरी है कि मधुजी के पास संगीत को सुनने के लिए कोई भारी-भरकम इलेक्ट्रानिक उपकरण नहीं थे। वो अपने छोटे से टेप रिकार्डर पर ही कैसेट या सीडी के माध्यम से संगीत सुनते थे। मेरा भी मधुजी से नज़दीकी सम्बंध शायद संगीत के कारण हुआ। मेरी रुचि संगीत में बहुत थी। साठ और सत्तर के दशक में दिल्ली में संगीत कार्यक्रमों के आयोजनों का सिलसिला तेजी से शुरू हुआ। उस समय ज़्यादात्तर कार्यक्रमों में टिकट या प्रवेश पत्र के माध्यम से जाना सम्भव होता था। उस वक्त में संगीत का समीक्षक नहीं था पर कई संगीत आयोजकों से मेरा नज़दीकी रिश्ते बन गए थे। इसलिए मुझे आसानी से अन्दर जाने के लिए प्रवेश पत्र मिल जाता था। मधुलिमये की भी इन संगीत कार्यक्रमों में जाकर संगीत सुनने में बहुत दिलचस्पी थी। लेकिन संगीत आयोजकों से न उनका कोई सम्पर्क था और न ही उन्होंने इसके लिए कोशिश की। संगीत सुनने में मधुजी का रूझान देखकर मैनें निजी स्तर पर आयोजकों से उन्हें आमंत्रित करने के लिए कहा उनमें कई आयोजक मधुजी के नाम परिचित थे। उसके बाद संगीत के कार्यक्रमों में मधुजी के आवाजाही का सिलसिला शुरू हो गया। उस समय एक प्रखर सांसद के रूप में मधुजी बहुत लोकप्रिय थे। संसद की कई बहसों मे मधु लिमये ने चमत्कार करके जो शोहरत हासिल की उससे वे तकरीबन हर छोटे-बड़े अखबारों और पत्रिकाओं में छा गए थे। इसलिए मधुजी को संगीत के जलसो मं बहुत से सुधीजन संगीत के प्रति उनके प्रेम को देखकर अचम्भित भी होते थे और आकर्षित भी। सन अस्सी के बाद राजनीति से सन्यास लेने के बाद भी वे राजनीति से अपने को मुक्त नहीं कर पाए। लगातार उनके आसपास राजनीति से जुड़े लोगों का जमावाड़ा शाम के समय मंडराता रहता था। इसलिए मधुजी का संगीत के कार्यक्रमों में जाना आसान नहीं था। उस समय उनके सामने यह दुविधा थी कि कैसे लोगों के बीच से उठकर संगीत के कार्यक्रम में जाए। पर वो जाने के लिए कोई न कोई रास्ता निकाल लेते थे, संगीत कार्यक्रम में मधुजी के अनुयायी राजकुमार जैन भी साथ में शामिल हो जाते थे। हलांकि शुरु में राजकुमार की संगीत में कोई खास रुचि नहीं थी। पर मधुजी की संगत में रहने से उन्हें संगीत के प्रति धीरे-धीरे लगाव होने लगा। और वो कुछ रागों को पूरी तरह से पहचनने लगे।
राजनीत के क्षेत्र में बड़े से बड़े संघर्षों का सामना करने, जेल जाने की यातनाएं और आन्दोलन के दौरान पुलिस की लाठियों को झेलने वाले मधु लिमये कभी नहीं घबराये और बहुत ही साहस के साथ हर परिस्थितियों का सामना करते रहे लेकिन भावनात्मक स्तर पर संगीत ने उन्हें अपने वश में कर लिया था। और यह भी देखा गया कि जब संगीत उन्हें गहराई से छूता था तो उनकी आँखों से आसू झरने लगते थे। यह दृश्य मैनें भी देखा जब संगीत के गायक पं. जसराज के द्वारा प्रस्तुत राग बैरागी को सुनने से मधुजी इतने मुग्ध हुए कि उनकी आँखों से आसूओं की धारा बहने लगी। यह विडम्बना है कि जो लोग मधुजी को सिर्फ राजनीत के आइने से देखते थे उन्हें उनके संगीत के प्रति प्रेम और उसे सुनना बिल्कुल रास नहीं आता था। समाजवादियों में तकरीबन अस्सी प्रतिशत से ज़्यादा लोग ऐसे थे जो संगीत विरोधी थे। औरंगजेब के लीक अनुयायी थे। इन लोगों में न कोई भारतीय कला संस्कृति के प्रति आदर था और न ही कोई अनुराग। उनके लिए संगीत एक मानसिक भोगविलासता की चीज़ थी। इन लोगों के बीच संगीत के सबसे ज़्यादा घोर विरोधी समाजवादी नरेन्द्र गुरू थे। मधुजी के संगीत कार्यक्रमों में जाने पर वो तिखीं टिप्पणी करते हुए कहते थे कि रोम जल रहा हैं और नीरों बंशी बजा रहा है। गुरु के साथ और भी कई लोग इस तरह की भाषा बोलते थे। लेकिन गुरुजी के इस तरह के लांक्षन पर मधुजी की न कोई प्रतिक्रिया दी और न ही कोई अनादर किया।
शास्त्रीय संगीत हो या लोक संगीत उसमें मधुजी मनोरंजन नहीं बल्कि उसके आध्यात्मिक पक्ष को भी गहराई से देखते और परखते थे। मधुजी के अनुसार जिसे हम भारतीय संस्कृति कहते है संगीत उसकी निरंतरता का अटूट और ठोस प्रमाण है। मधुजी की मान्यता थी कि समय के बदलावों के साथ हमारा संगीत भी बदला, पर इतना ही नहीं कि उसकी आत्मा ही खो जाए। अन्य कला विद्याओं की तरह शास्त्रीय संगीत भी अपना परिष्कार करता रहा और नए प्रयोगों में उसका व्याकरण तैयार करता रहा। ये मेरा भी सौभाग्य है कि मधुजी के साथ संगीत चर्चा में इस कला के अनेकों गूढ़ तत्व उजागर होते थे समृद्ध संगीत की खूबियों और विभिन्न रागों के वैचित्र रूपों के रहस्य को उजागर करने में जो उनकी सारगर्भित टिप्पणी होती थी वो सब बहुत ज्ञानवर्धक थी। संगीत चर्चा में भी राजकुमार जैन शामिल रहते थे।
यह गौर करने की बात ही मधुजी लेखन कार्य भी संगीत के गूंजते सुरों का आनंद लेते हुए करते थे। वे जब किसी उलझन या परेशानी में होते थे उस समय संगीत ही था जो उन्हें शांति देता था। वे ज़्यादात्तर देर रात को एकांत में संगीत का रसास्वादन लेते रहते थे। बहुत ही सादगी से रहने वाले मधु लिमये का जीवन बहुत ही साधरण था। उनके घर में न कोई फ्रिज था और न गीजर, एसी वगैरह। वे घड़े का ही पानी पीते थे। खाना भी बहुत सादा खाते थे। उसमें दाल एक सब्जी और कभी-कभी थोड़ा चावल होता था। उसे मधुजी के पास लगातार लम्बें समय तक जुड़ रहे सौभन ही उनकी देखरख करते थे और खाना बनाते थे। मधु जी के संगीत प्रेम में उनकी पत्नी चंपा लिमये की भी पूरी भागदारी रहती थी।
मधु लिमये का बहुमुखी व्यक्तित्व बहुत समग्र था। उसमें राजनीति संगीत कला आदि सबकी गहन समझ और धाक थी। समाजवादी विचार धारा में पूरी तरह से अपना पैर जमाने वाले मधु लिमये का संगीत से इश्क में जो जुड़ाव और खरापन था उसे कई ढंग से परिभाषित किया जा सकता है।