देश में कर्ज केवल रकम का सवाल नहीं है, उसके साथ व्यवस्था का रवैया भी जुड़ा है। एक किसान कुछ लाख रुपये के कर्ज में फंसकर अपनी जमीन, फसल और परिवार की सुरक्षा गंवा सकता है। एक छोटा कारोबारी बैंक की किस्त चूकने पर वसूली के...
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*‘चरित्र-निर्माण की सदी’? या संघी इतिहास का पुनर्लेखन!*
*(आलेख : सुभाष गाताडे)* *एक बिल्ली आँखें बंद करके दूध पीती है और सोचती है कि दुनिया उसे देख नहीं रही है। — एक संस्कृत सुभाषित* [एक सदी बीत गयी, जब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ नाम से हिन्दुओं के संगठन (इसके बजाए इसे ‘हिन्दू...














