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 *‘घुसपैठिया, बांग्लादेशी और रोहिंग्या’…SIR, महज एक शिगूफ़े के साथ हो गया गुम* 

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प्रत्यक्षमिश्रा

24 जून, 2025 को विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) की अधिसूचना जारी होने के बाद से, बिहार के उपमुख्यमंत्री से लेकर केंद्रीय गृह मंत्री और प्रधानमंत्री तक ने, हर मंच से एक ही बात दोहराई कि “घुसपैठियों को बिहार से भागना हमारी प्राथमिकता है”

करीब दो महीने से ‘घुसपैठिया, बांग्लादेशी और रोहिंग्या’ सुनते-सुनते अब तो यह स्पष्ट हो गया है कि इस बार बिहार में भाजपा का मुख्य चुनावी मुद्दा पूरी तरह इसी के इर्द-गिर्द रहने वाला है। एक बात जो स्पष्ट कर देना जरूरी है कि जब वो ‘घुसपैठियों’ के बारे में बात करते हैं तो उनका निशाना स्पष्ट रूप से बांग्लादेश या म्यांमार से कथित तौर से घुसपैठ करने वाले रोहिंग्या मुसलमान होते हैं, लेकिन यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि सीमांचल क्षेत्र नेपाल के साथ खुली सीमा साझा करता है तो स्वाभाविक रूप से यह सवाल उठता है कि – नेपाल का ज़िक्र क्यों नहीं होता? क्या ऐसा इसलिए है क्योंकि नेपाल में मुसलमान बहुत कम हैं और बांग्लादेश और म्यांमार का ज़िक्र करने से इस मुद्दे को हिंदू-मुस्लिम विभाजन में बदलने में मदद मिलती है? जबकि वास्तविकता यह है कि अधिकांश सीमा पार के विवाह, धार्मिक यात्राएँ और सामाजिक आदान-प्रदान वास्तव में नेपाल के साथ ही होते हैं।

वैसे तो भारत में शिगूफों की कभी कमी नहीं रही है, लेकिन हाल के वर्षों में ऐसा प्रतीत होता है कि इनके निर्माण को एक पूर्ण राष्ट्रीय प्रयास का रूप दे दिया गया है। अब, आइए तथ्यों पर गौर करें। जनवरी 2025 में, बिहार मतदाता सूची के संक्षिप्त पुनरीक्षण के बाद, एक भी विदेशी नागरिक नहीं मिला।

फिर भी, एसआईआर अधिसूचना के बाद, चुनाव आयोग सत्तारूढ़ दल की बयानबाजी को दोहराता हुआ दिखाई दिया, जिससे मीडिया को “सूत्रों का कहना है कि सीमांचल क्षेत्र में कई घुसपैठिए पाए गए हैं” जैसी सुर्खियां बनाने में मदद मिली, लेकिन भारत जोड़ो अभियान के राष्ट्रीय संयोजक योगेंद्र यादव सामाजिक विज्ञान के सरल सिद्धांत का हवाला देते हुए बताते हैं कि मानव प्रवास हमेशा बेहतर आर्थिक परिस्थितियों की ओर होता है। अगर लोग वास्तव में बांग्लादेश से बिहार आ रहे हैं तो इसका मतलब होगा कि बिहार की अर्थव्यवस्था बांग्लादेश से ज़्यादा मज़बूत है।

हालांकि, 2024 के आंकड़ों के अनुसार, बिहार में प्रति व्यक्ति मासिक आय ₹5,570 थी, जबकि बांग्लादेश में यह ₹19,200 थी, जो लगभग चार गुना ज़्यादा है। तो किसकी मत मारी गई होगी कि वह समृद्धि से गरीबी की ओर पलायन करेगा?

हैरानी की बात तो ये है कि चुनाव आयोग ने जब सुप्रीम कोर्ट में 789 पेज का हलफ़नामा दाखिल किया तो उस हलफनामे में एक बार भी “बांग्लादेशी” या “घुसपैठिया” शब्द का इस्तेमाल नहीं किया और जब पूछा गया कि कितने घुसपैठिए पाए गए तो जवाब था शून्य। मतलब सुप्रीम कोर्ट की पहली सुनवाई के दौरान ही तथाकथित “घुसपैठिया” होने का दावा पूरी तरह से काल्पनिक सिद्ध हुआ।

इसके बाद जब 1 अगस्त को एसआईआर के तहत ड्राफ्ट रोल जारी हुआ तो एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में चुनाव आयोग से पूछा गया कि अब तक कितने ‘घुसपैठिया’ की पहचान की गई है। जवाब था: “हमें ड्राफ्ट रोल प्रकाशित होने के बाद वास्तविक संख्या का पता चलेगा।” 

अब, SIR प्रक्रिया समाप्त हो चुकी है, मतदाता सूची को जारी (30 सितंबर) हुए दो हफ्ते बीत गए, लेकिन अब तक इस बारे में कोई आधिकारिक आंकड़ा साझा नहीं किया गया है कि वास्तव में कितने घुसपैठिए मतदाता सूची से हटाए गए हैं। यह तब है जब “विदेशियों की पहचान” को एसआईआर का मुख्य उद्देश्य बताया गया था और भाजपा नेताओं के उन दावों  का क्या जो चुनाव आयोग द्वारा बार-बार दोहराया जाता है कि कथित विदेशियों, ज़्यादातर बांग्लादेशियों और रोहिंग्याओं की सूची “साफ़” की जा रही है?

दिलचस्प बात यह है कि एसआईआर पर चुनाव आयोग के दैनिक बुलेटिनों में मतदाताओं के नाम हटाने के लिए विभिन्न श्रेणियों की सूची तो दी गई, लेकिन घर-घर जाकर जाँच के दौरान वास्तव में कितने विदेशी पाए गए, इसका ज़िक्र कहीं नहीं किया गया। और सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि मसौदा सूची जारी होने के बाद दो महीने तक चले दावे और आपत्तियों के दौर में, भाजपा ने किसी भी मतदाता को “विदेशी” या “घुसपैठिया” बताते हुए एक भी आपत्ति दर्ज नहीं कराई।

यह आश्चर्य की बात है कि जिस पार्टी ने इस बारे में सबसे ज़्यादा शोर मचाया, वह आपत्ति करने के लिए एक भी व्यक्ति की पहचान नहीं कर पाई।

यह उस शिगूफे की बड़ी सच्चाई है, जो दो महीने की प्रक्रिया के बाद समय के साथ धूमिल हो गया। 

बिहार के मुख्य निर्वाचन अधिकारी की वेबसाइट के अनुसार, 1 अक्टूबर 2025 तक मसौदा मतदाता सूची पर लगभग 2.4 लाख (2,42,273) आपत्तियाँ आईं। इनमें अनुपस्थिति, डुप्लीकेट, मृत्यु, नागरिकता, स्थानांतरण और कम उम्र जैसी अलग-अलग वजहें थीं, लेकिन ध्यान देने वाली बात है कि, सिर्फ 1,087 मामलों में (मतदाताओं का 0.015%) यह दावा किया गया कि कोई व्यक्ति भारतीय नागरिक नहीं था।

लेकिन ये मामले भी संदिग्ध निकले। 779 आपत्तियाँ ऐसी थीं, जो खुद पर की गईं, यानी वो व्यक्ति, जिसने दो महीने पहले दौड़-दौड़कर अपना फॉर्म भरा, अब वह खुद को “विदेशी” घोषित कर रहा है, एक तरह से केंद्रीय जाँच एजेंसियों को अपनी गिरफ्तारी के लिए आमंत्रित कर रहा है। खैर, बाकी में से ज़्यादातर संभवतः नेपाली थे, क्योंकि केवल 226 नाम मुसलमानों के थे। अंततः, चुनाव आयोग ने केवल 390 आपत्तियाँ स्वीकार कीं, जिनमें से केवल 87 मुसलमान थे। इसलिए इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है कि आखिर क्यों चुनाव आयोग अभी तक इस बारे में सटीक आंकड़े देने से हिचकिचा रहा है। अब जबकि पूरा विवाद सीमांचल के इर्द-गिर्द घूम रहा है, यह दावा करते हुए कि सभी “घुसपैठिए” इसी क्षेत्र से बिहार में प्रवेश करते हैं, आइए इस पहेली को भी सुलझाते हैं। 

अब अगर हम भूगोल की दृष्टि से देखें तो बांग्लादेश से कोई घुसपैठ होने पर अधिक संभावना है कि वे मुसलमान होंगे, जबकि नेपाल से आने वाले लोग अधिकांशतः हिंदू होंगे। सीमांचल क्षेत्र में चार जिले आते हैं – अररिया, किशनगंज, पूर्णिया और कटिहार और यह क्षेत्र नरपतगंज (46) से कोरहा (69) तक फैला हुआ है।

अंतिम मतदाता सूची का विश्लेषण करने से पता चला कि सीमांचल में, सिर्फ 12 व्यक्तियों को “भारतीय नागरिक नहीं” (विदेशी) के रूप में चिह्नित किया गया था, हालांकि चुनाव आयोग का डेटा पूरी तरह स्पष्ट नहीं है।

इन 12 लोगों में से 6 हिंदू और 6 मुसलमान थे। जिनमें से 2 मुस्लिम मतदातों का निधन हो चुका है, जिससे SIR प्रक्रिया के तहत दो महीने की प्रक्रिया के बाद केवल चार मुसलमान ही बचे हैं। जिनके मामलों में अब तक चुनाव आयोग की अंतिम पुष्टि या सफाई नहीं आई है।

आइए इन बचे हुए चार मामलों को करीब से देखें:

Examples of petitions self-objection with reason as Not Indian Citizens:

चौथा निर्वाचन क्षेत्र, अररिया (49), में बूथ नंबर – 39 के तहत दो व्यक्तियों को “विदेशी” के रूप में दर्ज किया गया था, और दोनों मुसलमान थे।

हालाँकि, 30 सितंबर को जारी अंतिम मतदाता सूची में दोनों लोगों (चुन्नी बेगम और मोहम्मद हकीम उद्दीन) का निधन हो चुका है। 

पाँचवाँ निर्वाचन क्षेत्र, जोकीहाट (50), में बूथ नंबर 29 के तहत चार व्यक्तियों को “विदेशी” के रूप में दर्ज किया गया है, और चारों मुसलमान हैं।

किशनगंज ज़िले के चारों विधानसभा क्षेत्रों में एक भी विदेशी नागरिक के खिलाफ आपत्ति दर्ज नहीं हुई।

पूर्णिया (62) के बूथ नंबर 205 पर जिन दो लोगों को “विदेशी” बताया गया, दोनों महिलाएँ हैं और दोनों हिंदू हैं।

कटिहार के बूथ नंबर 101 और 310 में जिन दो लोगों को “विदेशी” के रूप में दर्ज किया गया है उनमें एक हिंदू महिला और एक हिंदू पुरुष।

अब अगर कोई कहे कि इस SIR के बाद “ठीक है, लाखों नहीं, हज़ारों नहीं, सैकड़ों भी नहीं, पर कुछ तो घुसपैठिए मिले?”

तो आइए, हम सब मिलकर चुनाव आयोग को बधाई दें, दो महीने की इतनी थकाऊ और निराश करने वाली प्रक्रिया के बाद, उसने कम से कम ‘घुसपैठिया’ और ‘रोहिंग्या’ जैसे राजनीतिक शिगूफों का भंडाफोड़ तो कर ही दिया। 

– प्रत्यक्षमिश्रा पब्लिक पॉलिसी रिसर्चर हैं।

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