अग्नि आलोक

*छीनते मानवाधिकार, हमारी नासमझी और हमारी उदासीनता*

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डॉ. प्रभाकर सिन्हा

हमारा देश 15 अगस्त 1947 के अंग्रेजी राज से आजाद हुआ. 26 जनवरी 1950 को हमने अपने को एक गणतन्त्र घोषित किया. पहले हम अंग्रेजी राज की प्रजा थे. मगर 26 जनवरी 1950 से हम भारतीय गणतंत्र के नागरिक हो गये. हमारे संविधान ने हमको बराबरी का हक दिया. प्रधानमंत्री से साधारण नागरिक तक को एक मत (वोट) का अधिकार मिला ताकि हम अपनी पसंद की सरकार चुन सकें. हम सबको समान इज्जत पाने का हक भी मिला.

कानून के सामने भी हम सबको बराबरी का हक मिला यानी प्रधानमंत्री से लेकर एक सामान्य व्यक्ति तक को समान अपराध के लिये समान अदालत के द्वारा समान सजा का प्रावधान. आजादी के पहले देश के पदाधिकारी, कर्मचारी, सरकारी नौकर थे. उनका काम अंग्रेजी राज की सेवा करना और देश की जनता पर शासन करना और अंग्रेजी राज को बचाये रखना था. इसलिये पुलिस को दमन करने का और जुल्म तक करने का अधिकार दिया गया, ताकि वे देशवासियों को डरा-धमका कर अंग्रेजी राज के विरूद्ध विद्रोह रोक सकें.

इस तरह उनका काम था अंग्रजी राज की सुरक्षा और भारतवासियों पर शासन और हर तरह से अंग्रेजी राज की सेवा, पर जब हम एक गणतंत्र हो गये तो सब कुछ बदल गया. अब सरकारी कर्मचारी सरकार के सेवक नहीं रहे. अब वे लोक सेवक (जनता के सेवक) हो गये. अब उनका काम पहले की तरह सरकार की सेवा नहीं रहा, अब उनका कर्त्तव्य हमारी यानी जनता की सेवा करना हो गया. वे वास्तव में हमारे सेवक (नौकर) हैं.

नौकर और मालिक का क्या संबंध होता है ?

मालिक नौकर को तनख्वाह देता है जिससे उसकी बीबी-बच्चे का भोजन, कपड़े और मकान का खर्च चलता है और नौकर का कर्त्तव्य होता है कि मालिक की ईमानदारी से सेवा करे. हम लोग मालिक हैं क्योंकि प्रधानमंत्री से लेकर साधारण लोक सेवको के भोजन कपड़े और मकान के लिये हम उनको तलब / तनख्वाह देते हैं. कर्त्तव्य पालन के लिये उनको अन्य सारी सुविधायें देते हैं और उनसे अपेक्षा करते हैं कि वे इमानदारी और निष्ठा से हमारी सेवा करें.

आपको लग सकता है कि उनकी तनख्वाह के लिये आप कुछ नहीं देते हैं. अमीर लोग टैक्स देते हैं और उसी से लोक सेवकों की तनख्वाह दी जाती है और काम करने के लिये आवश्यक सुविधायें भी दी जाती है, मगर यह आपकी गलतफहमी है. जब भी आप कुछ खरीदते हैं (कुछ वस्तुओं को छोड़कर) तो आप उस पर टैक्स देते हैं. गरीब से गरीब आदमी इस तरह अप्रत्यक्ष टैक्स देता है इसी तरह आपके बूंद-बूंद से सरकारी खजाना भरता है, जिससे लोकसेवकों का भरण-पोषण होता है और देश का अन्य खर्च चलता है.

अमीर लोगों की आमदनी ज्यादा होती है इसलिए वे प्रत्यक्ष रूप से आयकर (इनकम टैक्स) देते हैं. मगर, केवल उनके आयकर से देश नहीं चल सकता, जबतक कि यदि आप से अप्रत्यक्ष कर (टैक्स) नहीं लिया जाए. इसलिए आप लोक सेवकों के भरणपोषण में अपने योगदान को समझें और इस भ्रम से मुक्त हो जायें कि लोक सेवकों की रोजी रोटी में आपका कोई योगदान नहीं है.

सरकार आपकी मालिक नहीं है. जनतंत्र में सरकार चुनाव के द्वारा आप बनाते हैं. और आप उनको निकाल बाहर भी करते हैं. जो किसी को बहाल करता है या उसको निकाल बाहर कर सकता है वही मालिक है. सरकार आपका मालिक नहीं, मैनेजर है, जिसको पांच वर्षों के लिये आपने बहाल किया है, पांच साल के बाद आप उसको पांच वर्षों के लिये फिर बहाल कर सकते हैं या असंतृष्ट होने पर उसको निकाल कर किसी दूसरे को उसके स्थान पर बहाल कर सकते हैं. अगर आपने गलत चुनाव किया तो उसका फल भोगेंगे. गलत चुनाव इसलिए भी होता है कि आप मालिक हैं, और सरकार मैनेजर का है, जिसका चुनाव आप कर रहे हैं, इस बात को आप समझ नहीं पाते.

राजनैतिक दलों ने एक धोखा किया है. धीरे-धीरे उन्होंने आपको समझा दिया है कि वे मैनेजर नहीं मालिक हैं, राजा हैं और यदि वे आप के लिये कुछ करते हैं तो आप पर मेहरवानी करते हैं. प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री दावा करते हैं कि मैने तुमको यह दिया या वह दिया. उनका भाव ऐसा होता है जैसे अपनी जेब से वे आपको कुछ दे रहे हैं. क्रमशः आपने भी मान लिया है कि वे लोग आप पर मेहरवानी कर रहे हैं.

नतीजा है कि हमलोगों के (सरकार और जनता के) संबंध उल्टे हो गये हैं मालिक (जनता), प्रजा और याचक हो गया है और नौकर मैनेजर मालिक बन बैठा है. कहने को हम एक गणतंत्र हैं मगर वास्तव में हम एक धनतंत्र (धनी लोगे का राज) होकर रह गये हैं. इसी का परिणाम है कि नेता और लोकसेवक और पूरा तंत्र हमको तुच्छ समझता है और हमारे साथ दुर्व्यवहार करता है.

राजनेता हमारे मालिक बन गये हैं और लोकसेवक फिर से सरकार के सेवक बन गये हैं. हमारी हैसियत मालिक की नहीं, बल्कि प्रजा की हो गई है. हमारे अन्दर ऐसी हीन भावना भर दी गई है कि हमने अपनी अपमानजनक स्थिति को स्वीकार कर लिया है. और हम हीन भावना से इतने ग्रसित है कि हमारे अन्दर विद्रोह की भावना बनती ही नहीं.

हमारे देश का विशिष्ट वर्ग इस कला में सदियों से माहिर रहा है. लोगों के अन्दर जन्म और जाति के आधार पर ऐसी हीन भावना भर दी गयी है कि लोगों ने अपने ऊपर होने वाले अन्याय और अत्याचार को अपनी नियति (भाग्य) मान ली है और उसको सदियों तक स्वाभाविक मानते रहें और सहते रहें. सदियों तक अत्याचार को स्वीकारने के बाद उसके विरूद्ध विद्रोह की भावना उपजी और उसको समाप्त करने की दिशा में कारगर प्रयास शुरू हुए.

आज शासकों (मुख्य धारा के सारे राजनैतिक दलों) ने जनता और सरकार की भूमिका को ही नहीं उलट दिया है बल्कि वे उसको हमारी नियति बनाने के प्रयास में हैं. हमारे अन्दर हीन भावना पैदा कर फिर पहले की तरह हमसे अन्याय और अत्याचार को हमारी नियति की तरह स्वीकार कराने के प्रयास में वे लगे हुए हैं.

वे अपने प्रयास में एक हद तक सफल भी हुए हैं. हमने 1950 में गणतंत्र को अपनाया ताकि अंग्रजों से मुक्ति के बाद देश के नागरिक इज्जत की जिन्दगी जीयें और सारे देशवाशियों के जीवन को बेहतर से बेहतर बनाया जा सके, ताकि देश के धन के इस्तेमाल से गरीबों के जीवन को बेहतर बनाया जा सके. इनको सुनिश्चित करने के लिये हमें संविधान में अनेक मौलिक अधिकार दिये गये और संविधान में राज्य को दिशा निर्देश भी दिया गया कि अपनी शक्ति का इस्तेमाल सामान्य लोगों के जीवन को सुखी और बेहतर बनाने के लिये करें. बाद में संयुक्त राष्ट्र ने मानवाधिकारों की घोषणा की जिसको भारत सरकार ने भी स्वीकारा और भारतीयों को उपलब्ध कराने का संकल्प लिया.

संविधान ने हमें जीवन का अधिकार दिया है, मगर बात-बात पर पुलिस निहत्थे लोगों पर गोली चलाकर या लोगों को नकली मुठभेड़ों में मार डालती है. हमको व्यक्तिगत स्वतंत्रता का संवैधानिक अधिकार है, मगर हजारों निर्दोष लोग साधारण या काले कानूनों के तहत जेलों मे बन्द हैं. हमें जुलूस निकालने या सभा करने का मौलिक अधिकार है, मगर पुलिस का कनीय पदाधिकारी उस अधिकार को छीन कर हम पर लाठियां बरसाता है.

हमें बराबर सम्मान पाने का हक है, मगर एक राजनेता, सरकारी पदाधिकारी या अमीर आदमी के सामने हमारी कोई हैसियत नहीं है. हमारे साथ एक तुच्छ इन्सान होने का एहसास कराकर हमें अपमानित किया जाता है. हमें कानून के सामने बराबरी का अधिकार है, पर कानून का लाभ केवल विशिष्ट लोगों को प्राप्त है. हम गरीबों को नहीं. हमारे साथ कोई भेदभाव नहीं हो यह हमारा अधिकार है, लेकिन जीवन के हर कदम पर हम आमलोग भेदभाव का सामना करते हैं.

संविधान राज्य सरकार को निर्देश देता है कि वह आपकी गैर बराबरी को कम से कम करें, मगर सरकारें अमीरों, पूंजीपतियों को अधिक से अधिक अमीर बनाने में लगी हुई है और गैर बराबरी को लगातार बढ़ा रही है. राज्य को संविधान यह निर्देश भी देता है कि लोगों में हैसियत (बड़े छोटे के फर्क) के फर्क को समाप्त करे, लेकिन सरकारें उसको भी बढ़ाने में लगी हुई है. संविधान यह निर्देश भी देता है कि धन का मुट्ठी भर लोगों के हाथों में केन्द्रीकरण न होने दे और देश की संपत्ति का उपयोग समाज के हित में करें, पर’ सरकारें कुछ लोगों को धनाढ्य बनाने में लगी हुई है और देश की संपदा का उपयोग भी उनके ही लिये कर रही है.

अगर संविधान में दिये गये अधिकारों और मानवाधिकार हमको प्राप्त होते तो ना तो करोड़ो भारतवासी इतनी गरीबी, अशिक्षा, अत्याचार अन्याय और अपमान की जिन्दगी जीते और ना ही हम बात-बात पर अपनी ही पुलिस की लाठी, गोली के शिकार होते या अपने ही सेवकों से डर-डर कर जीते. यदि हमारे मानवाधिकार और अन्य कानूनी अधिकार मिले होते तो अपने ही सेवकों से अपना हक पाने के लिये हम रंगदारी देने को बाध्य नहीं होते. हम अपने हक को पाने के लिये जो लोक सेवकों को देते हैं वह घूस नहीं रंगदारी है जो हम इसलिए डर से देते है क्योंकि हम असहाय हैं. घूस तो वह है जो अमीर लोग नाजायज लाभ के लिए देते हैं. हम गरीब लोग तो कदम-कदम पर पुलिस या प्रशासन के अधिकारियों को रंगदारी देने के लिए बाध्य होते हैं.

मौलिक अधिकारों और मानवाधिकारों के संविधान और विभिन्न अन्य कानूनों में उपलब्ध होने के बावजूद हमारी यह दुर्दशा क्यों है ?

हमारी स्थिति इतनी दयनीय इसलिए है क्योंकि हम राजनेताओं के षडयंत्र के शिकार होकर अपनी स्थिति को स्वीकार करने लगे हैं. हमने अपने सेवकों को अपना मालिक और दाता और अपने को याचक मान लिया है. जैसे जाति प्रथा के विरूद्ध हमने विद्रोह किया और अपनी इज्जत, समानता और विभिन्न हकों के लिये संघर्ष कर रहे हैं. उसी प्रकार अपनी इज्जत, समानता और मानवाधिकारों के लिये संघर्ष कर अपने अधिकारों को प्राप्त करने का समय आ गया है. हम पहले एक छोटी शुरूआत करेंगे और धीर-धीरे अपना सारा हक प्राप्त करेंगे. एक संघर्ष की शुरूआत हम समाज में अपनी हैसियत और अधिकारों के विषय में चेतना जगाकर अपने अधिकारों के लिये मांग से करेंगे.

निम्नलिखित मानवाधिकारों तथा अन्य अधिकारों की मांग हमारी संघर्ष यात्रा का प्रस्थान बिन्दु होगा.

हम सब के मानवाधिकार

  1. मानवाधिकार हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है, क्योंकि हम मनुष्य हैं.
  2. हमारा मानवाधिकार अहरणीय है. यानी इसको छीनने का हक सरकार को भी नहीं है.
  3. समान इज्जत पाना हमारा मानवाधिकार है चाहे हम एक गरीब इन्सान हो या मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री.
  4. हमारे साथ भेदभाव या किसी प्रकार का दुर्व्यहार हमारे मानवाधिकार का हनन है.
  5. कानून का शासन और कानून के सामने बराबरी हमारा मानवाधिकार है, चाहे हम एक आम इन्सान हो या बड़े पदाधिकारी.
  6. विकास वही है जो हमारे जीवन को बेहतर बनाये. विकास का लाभ मुठी भर उद्योगपतियों, राजनेताओं, अफसरों को देना हमारे मानवाधिकार का हनन है.
  7. अपने धर्म, संस्कृति और विचारों के अनुसार जीना हमारे मानवधिकार हैं. इस पर किसी भी प्रकार का आक्रमण हमारे मानवधिकार का हनन है.

इसलिए हम मांग करते हैं कि

  1. सरकारी कार्यालयों में या अन्य लोकसेवकों द्वारा किसी के लिये भी तुम के प्रयोग को दंडनीय दुर्व्यवहार अधिसूचित किया जाय.
  2. कार्यालय में प्रत्येक नागरिक के बैठने की व्यवस्था की जाय और खड़ा रखने को दुर्व्यवहार अधिसूचित किया जाय.
  3. कार्यालयों में हाथ मिलाने को उचित अभिवादन अधिसूचित किया जाय और प्रणाम करने को बैन (बन) किया जाय.
  4. पुलिस द्वारा मारपीट करना, गाली- गलौज करना या किसी को भी अपमानित करना दंडनीय दुर्व्यवहार घोषित किया जाय जिसका (सुम्मरी ट्रायल) किया जाए.
  5. अपराध के अनुसंधान में पुलिस की बेइमानी और मनमानी पर पूरा रोक लगाया जाय ताकि वर्तमान में चल रहे अन्याय का राज समाप्त हो.
  6. फौजदारी कानून को सही तरीके से लागू किया जाय ताकि दोषी बचे नहीं और निर्दोष फंसे नहीं.
  7. पुलिस को जनता का सहायक एवं सेवक बनाया जाय और थानों को जुल्म का नहीं जन सुरक्षा का केन्द्र बनाया जाय.
  8. लोक सेवकों में मालिक की मानसिकता समाप्त कर सेवक और सहायक की मानसिकता स्थापित की जाए.
  9. सेवा के अधिकार को विस्तृत कर सारी सेवाओं को इसके अधीन लाया जाए और सेवा देने में नाकाम लोकसेवकों को दंडित करना सुनिश्चित किया जाए.
  10. हैसियत की गैर बराबरी (बड़ा आदमी छोटा आदमी का भेद) समाप्त करो और आमदनी की गैर बराबरी को कम-से-कम किया जाए.
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