डॉ. विकास मानव
कोई भी गुरु या आचार्य हमको परिवर्तित नहीं कर सकता। हमें स्वयं अपने आपको परिवर्तित करना होगा।
किसी भी बहाने कुछ भी लेने वाला गोरू गुरु नहीं होता. गुरु भीख मांग लेगा, भूखा रह लेगा, हमसे कुछ चाहेगा नहीं. वह सिर्फ देगा, वो सब जो हमें चाहिए. इसीलिए उसके लिए स्वामी शब्द बना है, दाता शब्द बना है.
दूसरी तरफ अगर ऐसा गुरु मिल जाये और हमारे हृदय के अंतराल को फोड़ कर गुरुभाव का उदय नहीं हुआ है और समर्पण के भाव ने जन्म नहीं लिया है तो हम एक गुरु या आचार्य को छोड़कर दूसरा गुरु, फिर तीसरा, चौथा, पांचवां गुरु बनाते रहेंगे। एक मठ और एक आश्रम को छोड़कर दूसरे, तीसरे, चौथे मठ और आश्रम की परिक्रमा करते रहेंगे और अन्त में हमारा यही निर्णय होगा कि सब कुछ व्यर्थ है, सब गुरु ढोंगी हैं, पाखंडी हैं, लालची हैं।
वास्तव में किसी मठ में, किसी आश्रम में शान्ति नहीं है। सर्वत्र अशांति-ही-अशांति है। भीतर बहुत विभत्स स्थिति है, बस बाहर का विज्ञापनी प्रचार सुंदर है. तो कठिनाई गुरु या आचार्य की नहीं है हमारी है। हमारी समझ की है.
हम आत्मस्थ गुरु से नहीं जुड़ते. अंतस की आवाज नहीं सुनते. उस आवाज को जो परमात्मा की आवाज होती है. कठिनाई हमारी वजह से है। हम अपने आपको परिवर्तित करना ही नहीं चाहते। यदि हम अपने आपको परिवर्तित करने के लिए कटिबद्ध हो जाएँ तो एक भोलाभाला छोटा-सा बालक भी हमको परिवर्तित करने में समर्थ है.
राजा जनक और ऋषि अष्टावक्र की कथा याद कीजिए. कैसे राजा जनक क्षण में परिवर्तित हो जाते हैं। यदि हम परिवर्तित होने के लिए तैयार नहीं हैं तो साक्षात परमात्मा भी हमें परिवर्तित नहीं कर सकता।
ध्यान रखें जो भी भाव उत्पन्न हो रहा है, उसे तुरन्त कृत्य बनने का हम अवसर दें। तत्क्षण उसे कर्म में आयोजित करने की चेष्टा करें। जब भी कोई भाव कर्म बनता है, उसकी लकीर भीतर गहरी-से-गहरी होती जाती है और अन्त में आत्मा तक पहुंच जाती है वह। हम जो सोचते-विचारते हैं, उसका कोई अधिक मूल्य नहीं है। जो हम करते हैं, उसका है भारी मूल्य। क्योंकि हम जो करते हैं, वह हमारे आंतरिक अस्तित्व से जुड़ जाता है और हमारे अस्तित्व का अभिन्न हिस्सा बन जाता है।
संसार में बहुत से ऐसे लोग जिनके पास सद्विचारों का भंडार भरा है लेकिन विचार जब तक कर्म नहीं बनते तब तक सब व्यर्थ है। ऐसे लोग जो कुछ करते हैं, उनके करने से, उनके विचारों से, उनके भावों से उनका कोई सम्बन्ध नहीं रहता।
मानव का स्वभाव है तत्काल प्रभावित होना। किसी भी वस्तु या व्यक्ति से तत्काल प्रभावित हो जाता है वह, लेकिन वह प्रभाव अस्थायी होता है। जिस प्रभाव द्वारा हमारे अंतराल में जीवन का अवतरण व संचरण आरम्भ हो जाये, हमारी जीवन-धारा को नई गति और नई दिशा मिल जाये, वह महत्वपूर्ण है। शास्त्रों की चिंता न करें हम, न प्रभावों की चिंता करें।
चिंता इस बात की करें कि हमारे भीतर अंतराल में आखिर क्या घटित हो रहा है. इसका सतत निरीक्षण करते रहें। हमारे भीतर जो घटित होगा, वही हमारी आध्यात्मिक सम्पदा होगी।
मृत्यु के समय तो हम शास्त्र नहीं ले जा सकेंगे, न गुरु या आचार्य को हम साथ ले जा सकेंगे और न शास्त्र के नियम-सिद्धांत स्मरण रहेंगे, न गुरु के वचन काम आएंगे। हमने जीवनभर जो प्रभाव संचित किये हैं, न तो वे काम आएंगे।
मरते समय हमारे कृत्यों का सार, निचोड़ हमारे साथ अंतिम यात्रा पर निकलेगा। जीवनभर हमने क्या-क्या कर्म किया है, बस वही हमारे साथ रहेगा। केवल हम ही बचेंगे और बचेगा हमारे कृत्यों का संग्रह जो हमारे अस्तित्व का अभिन्न हिसा बन गया है, वह साथ रहेगा संस्कार के रूप में। आखिर उसे ही तो अगले जन्मों में प्रारब्ध बनकर हमारे साथ लौटना है. सुख-दुःख, शांति-अशांति, सफलता-असफलता, समृद्धि-निर्धनता के रूप में जिसके लिए जीवनभर हम अपने भाग्य को कोसते हैं, भगवान को दोष देते हैं।
जो हमारे पास इस जन्म में है, वह हमारे ही पिछले कर्मफल हैं और जो इस जन्म में हम कर रहे हैं, वह हमारे अस्तित्व का अभिन्न हिस्सा बन रहा है जिसे अगले जन्मो में भोगना है। यही भवचक्र है। यही जीवन और जगत का गोरखधंधा है।

