*प्रोफेसर राजकुमार जैन*
दिल्ली, एनसीआर में यूं तो अनेको चिता घर बने हुए हैं, परतु यमुना किनारे बने कश्मीरी गेट के श्मशान “निगम बोघ घाट”, उसका अपना ही इतिहास है, जिसके बारे में किंवदंती है की इसकी स्थापना महाभारत काल में पांडवों के सबसे बड़े भाई और इंद्रप्रस्थ के राजा युधिष्ठिर ने की थी। यहां पर हिंदू रीति रिवाज के साथ अंतिम संस्कार किया जाता है। हर दिन तकरीब100 दाह संस्कार यहां होते हैं। लकड़ियों, सीएनजी, विद्युत शवदाह से भी यहां पर अंतिम क्रिया होती है।
बदलते हुई दिल्ली के वर्ग चरित्र को समझने के लिए यह सबसे मौजू स्थान है “निगमबोध घाट” दिल्ली नगर निगम के अंतर्गत एक स्वयंसेवी संस्था “बड़ी पंचायत वैश्य बीसे अग्रवाल (पंजी,) ” द्वारा संचालित किया जाता है। निगम बोघ घाट दिल्ली का अकेला शमशान घाट है जो 24 घंटे खुला रहता है, बाकी के शमशान घाट रात्रि के समय बंद रहते हैं।
आप निगम बोध घाट की एक बेंच पर बैठकर शवो के साथ आए हुए लोगों को देखिए और उनके लिबास और बातों को सुनिए तो साफ पता चल जाएगा की नव धनाट्य और गरीब गुरबा वर्ग का क्या फर्क है?
दिल्ली छह की चार दिवारी से आए हुए शवो के साथ बड़ी तादाद में पैदल, साधारण कपड़ों में “राम नाम सत्य है, सत्य बोलो गत है” ऊंची आवाज में सुनने को मिलेगा। शव को कंधा देने में होड़ मचती दिखाई देगी। दूर दराज से आए हुए शव टेंपो, ठेलों, बसों में, किसी बुजुर्ग के शव के साथ लाल गुलाल उड़ाते हुए भीड़ दिखाई देंगी। इनके साथ आने वाले लोग आपस में बात कर रहे होते हैं, “बड़ा धार्मिक आदमी था”
“बहुत ही मिलनसार, सबकी मदद करता था” “इसके छोटे-छोटे बच्चे हैं, उनका अब क्या होगा ।” “घर में एक ही कमाने वाला इंसान था, भगवान ऐसा किसी के साथ ना करें” बेचारी इस उम्र में ही विधवा हो गई, अब इसका क्या होगा” भाई यह बहुत ही भाग्यशाली है, अपने सब काम पूरा करके अपनी उम्र पूरा करके गया है, वगैरा-वगैरा।

अब दूसरा मंजर इससे बिल्कुल उलट दिखाई देगा।
कभी “शव वाहन गाड़ी” या एंबुलेंस में लाश के साथ बामुश्किल चार पांच आदमी साथ आते दिखाई देंगे, उनकी मदद के लिए शमशान घाट के कारिंदे लगते हैं। कभी मोटर गाड़ियों के काफिले आने शुरू हो जाते हैं, शव पर तरह-तरह की फूल मालाएं बिछीं रहती हैं, आने वाले लोगों के सफेद धवल वस्त्र तथा हर एक के हाथ में कीमती मोबाइल फोन लेकर बातें करते हुए सुन सकते हैं। दूसरी तरफ से कोई दरियाफ्त कर रहा होता है की बॉडी कितनी देर में पहुंचेगी, कौन-कौन वहां मौजूद है। इधर दाह क्रिया जारी है, वहां वे टेलीफोन या आपस में बतिया रहे हैं, यार मुझे तो दुकान/ फैक्ट्री पहुंचना है। वहां बिल्टी आती होगी, “घर पर वाइफ इंतजार कर रही है फलां पार्टी में जाना है”। “आजकल व्यापार में बहुत मंदा है, हाथ पर हाथ धरे बैठे है”। बेटे बेटियों के शादी विवाह से लेकर उनके कैरियर की तफसील सुनने को वहां मिल जाएगी। और अंत में बेचैन होकर एक दूसरे से पूछने लगते हैं की यार और कितनी देर लगेगी। उनकी बातों से साफ जाहिर होता है कि उन्हें दिवंगत से कोई लेना-देना नहीं, केवल एक औपचारिकता को पूरा करने के लिए मजबूरी में वे वहां पर आए हैं।
सामाजिकता का अलगाव और जुड़ाव, वेदना की कसक और बाहरी दिखावे का अंतर साफ रूप से दिखाई पड़ता है। गरीब तपको के साथ आने वाले लोग शव के साथ धार्मिक रस्म के मुताबिक यमुना के जहरीले गंदे पानी में हाथों से अर्थी को पकड़ कर घुटनों घुटनों पानी में शवो को स्नान कराते हुए दिख जाएंगे। परंतु भद्र लोक के यह सफेदपोश, अर्थी को कंधा देने से भी बचते हैं, फिर उस गंदे पानी में जाने का तो सवाल ही पैदा नहीं होता क्योंकि कपड़े खराब होने के साथ-साथ घर पर जाकर नहाना भी पड़ेगा।
भला हो दिल्ली के भूतपूर्व मुख्यमंत्री मरहूम मदनलाल खुराना का कि उन्होंने शवों को नहलाने के लिए यमुना गंगा की पानी की पाइप लाइन से पानी लेकर इसको त्रिवेणी की धार का नाम देकर साफ पानी में शव स्नान की घाट पर ही व्यवस्था कर दी जिससे जहरीले पानी में शवों और उसको स्नान कराने वालों को निजात दिलवा दी।
अक्सर मुर्दघाट पर बात सुनने को मिलती है कि “कहां कि हाय-हाय, सभी कुछ तो यही रह जाता है, नश्वर काया है,” वगैरा-वगैरा आध्यात्मिक चाशनी से भरी बातें सुनने को मिलेगी परंतु मूर्द घाट से बाहर आते ही वह विचार मूर्दघाट पर ही छोड़ आते हैं।
इस घाट पर वीआईपी चबूतरा भी बना है, नए रईस और सियासी नेता चबूतरे पर अपने प्रिय के शवदाह को अपनी शान मानते हैं।
पहले शमशान घाट की बहुत बुरी दशा थी परंतु 2012 में अग्रवाल सभा के द्वारा इसके संचालन रखरखाव से बहुत सुधार आया है। इसके महामंत्री, मेरे मित्र सुमन कुमार गुप्ता भूतपूर्व दिल्ली नगर निगम सदस्य जो एक व्यापारी भी हैं, ने शमशान घाट की देखभाल में अपने को इसी मिशन में पूर्णकालिक लगा दिया है। हालांकि मुर्द घाट के संचालन पर अनेकों प्रकार के आरोप भी लगते रहते हैं, परंतु पहले की व्यवस्था, इंतजाम में बहुत बड़ा सुधार साफ दिखलाई पड़ता है। मुर्द घाट पर जातियों के आधार पर क्रिया कराने वालें महापंडित तैनात रहते हैं। उन पर भी लूट खसोट के आरोप लगते हैं, परंतु रात्रि के समय शवों की दहन क्रिया के महापंडित जो की संयोग से मेरे जानकार भी हैं, उनका कहना है की कई बार लावारिस तथा ऐसे शव भी आते हैं जिनके साथ आने वालों के पास लकड़ी खरीदने के भी पूरे पैसे नहीं होते, ऐसे में उनकी दाह क्रिया पूरी करने का इंतजाम भी हमें ही करना पड़ता है।
लोधी रोड के शमशान घाट पर जब कभी भी मैं गया तो वहां पर किसी न किसी वीआईपी अथवा उच्च वर्ग की दाह क्रिया को ही अधिकतर मैंने देखा, कारों की पार्किंग बाहर मथुरा रोड पर सड़क पर दूर-दूर तक देखी जा सकती है। क्रिया में शामिल होने वालों की अलग ही जमात है, यह आसानी से पहचाना जा सकता है।
शमशान घाट पर भी वर्ग फर्क साफ दिखाई देता है। हालांकि इसका एक कारण यह भी हो सकता है कि गरीब तपके के लोग धार्मिक विश्वास कि यमुना के किनारे क्रिया करने पर मृतक आत्मा को सद्गति प्राप्त होगी यमुना किनारे के निगमबोध घाट पर ही क्रिया कराने के लिए पहुंचते हैं।
[04/09, 11:37] Pro Raj Kumar Jain: *अब वक्त है, कर्ज उतारने का!*
*प्रोफेसर राजकुमार जैन*
कुदरती कहर की तबाही से हिमाचल, उत्तराखंड, पंजाब में दर बदर होकर अपने ही घर में इंसान, बेजुबान पशु, जानवर बेबसी से अपनी बर्बादी को देख, झेल रहे है। सवाल यह है कि अपने आशियाने में बैठकर हम क्या कर रहे हैं? बदकिस्मती की बात यह है कि जिस खालसा पंथ ने हमेशा बिना किसी जाति, मजहब, वर्ग, वर्ण, देश प्रदेश में कोई भूखा न सोए मुसलसल “लंगर”. जैसी सेवा से खिदमत की है। तथा खास तौर से बुरे वक्त में हर तरह का जोखिम उठाकर हर तरह की मदद मुसीबत जुदा लोगों की है, वह किसी से छिपा नहीं है उसके अनुयायी भी बड़े स्तर पर इस आपदा के शिकार हैं।
मैं दिल्ली शहर का बासींदा हूं अब तक जो मैंने अपनी आंखों से देखा उसे कैसे भूला सकता हूं । बेनागा दिल्ली के गुरुद्वारों में चलने वाले लंगर में हर रोज बड़ी तादाद में “प्रसादी” के रूप में पौष्टिक स्वादिष्ट भोजन बिना किसी जात, मजहब, पंत, वर्ग, वर्ण की पहचान के कराया जाता है। जंतर मंतर पर रोजाना होने वाले धरने प्रदर्शन जलसे जुलूसों, मोर्चे पर बाहर से आए हुए प्रदर्शनकारियों की सुविधा को देखते हुए लंगर सेवा धरना स्थल पर ही मुहिया करवा दी जाती रही है। पुराने वक्त में जब दिल्ली में सोशलिस्टों का कोई धरना प्रदर्शन सभा, सेमिनार होता था तो बाहर से आने वालों के लिए खाने के साथ-साथ गुरुद्वारे में ठहरने की मुफ्त व्यवस्था भी होती रही है। खालसा पंथ के सेवादारों का असली इम्तिहान कोविड जैसी माहवारी के वक्त हुआ। जब इंसान अपने पड़ोसी, जान पहचान, रिश्तेदारों, यार दोस्तों से भी मिलने में परहेज करते थे, ऑक्सीजन सिलेंडर भगवान का रूप ले चुका था उस वक्त सब की जानकारी में, “सिलेंडर लंगर सेवा” दी गई ,उसको कैसे भुलाया जा सकता है। रूस यूक्रेन जंग में अपने मुल्क को छोड़कर जाने वाले शरणार्थियों की पोलैंड में भी लंगर सेवा से खिदमत की गई। खालसा पंथ कि इस ऐतिहासिक रिवायत ने सांप्रदायिकता को भी कुछ हद तक खत्म करने का माहौल दिया है। आज हम देख रहे हैं की बड़ी तादाद में मस्जिदों, मदरसो से राहत सामग्री के, ट्रक के ट्रक पंजाब की ओर जा रहे हैं।
बाबा नानक की ही देन है कि शहर के सबसे अमीर, मालदार लोग, गुरुद्वारों में माथा टेकने आने वाले श्रद्धालुओं के जूते तथा झूठे बर्तन साफ करने को ही अपना बड़ा सौभाग्य मानते हैं। आज भी रिंग रोड के पर स्थित “गुरुद्वारा बाला साहिब” में हर तरह की मुफ्त मेडिकल सहायता के साथ डायलिसिस जैसी लंगर सेवा मुहिया करवाई जा रही है।
अब वक्त है, हमारी फर्ज अदायगी का।