सुसंस्कृति परिहार
एक बार फिर वह गर्जना मोदीजी के मुखारबिंद से फिर सुनने मिली जो वे कई बार यहां तक कि लालकिले से अपने उद्बोधन में भी कह चुके हैं।देश की संप्रभुता पर आंच नहीं आने देंगे। पीएम ने कहा, भारत की संप्रभुता का सम्मान हमारे लिए सर्वोच्च है। इस संकल्प के लिए हमारे वीर जवान क्या कर सकते हैं, देश क्या कर सकता है, ये लद्दाख और सिंदूर आपरेशन के दौरान दुनिया ने देखा है। LOC से लेकर LAC तक, देश की संप्रभुता पर जिस किसी ने आंख उठाई है, देश ने, देश की सेना ने उसका उसी भाषा में जवाब दिया है। यह कितना सच है हमारी सेना अच्छी तरह से जानती है।
आइए पहले चीन द्वारा हमारे क्षेत्र में अतिक्रमण की बात कर ली जाए। चीन जिसे भारत में झूला झुलाया गया।उसने हुचान,गलवान घाटी की कितनी ज़मीन हड़पने के बाद पैंगोंग झील की फाईव फिंगर्स में से लगभग सभी क्षेत्र में आधिपत्य जमाया हुआ है। इनकी उपयोगिता समझना बहुत आवश्यक है।
भारत ने चीन की ओर से लद्दाख के कुछ इलाकों को अपना बताने पर विरोध दर्ज कराया है। जनवरी 25 में सदन में विदेश मंत्रालय ने कहा कि चीन अपने होतान प्रांत में दो नए काउंटी बनाने की कोशिश कर रहा है जो भारत का हिस्सा है। इस क्षेत्र पर चीन का अवैध कब्जा है और वहीं काउंटी का ऐलान कर दोनों देशों के रिश्तों में एकबार फिर तनाव की स्थिति बन गई है।दरअसल भारत और चीन के बीच एक विवाद तो लद्दाख के होतान क्षेत्र को लेकर ही. लद्दाख में ही दोनों देशों के बीच साढ़े चार साल पहले टकराव की स्थिति आ गई थी. दोनों ओर की सेनाएं आपस में उलझ गई थीं. हाथापाई तक हुई थी. हालांकि, रूस के कजान में भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग की मुलाकात के बाद इस विवाद को सुलझाया गया था. इसके बाद दोनों देशों ने अपनी-अपनी सेनाएं पीछे हटा ली थीं. साल 2020 में हुए टकराव के बाद सुधरे हालात अब फिर से चीन की टेढ़ी चाल से बिगड़ने की आशंका गहराने लगी है.
दूसरी ओर लद्दाख और विवादित अक्साई चिन के बीच गलवान घाटी का विवाद तो जगजाहिर है। दोनों देशों की सीमा के नजदीक गलवान घाटी में वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) भारत से अक्साई चिन को अलग करती है। चीन के दक्षिणी शिनजियांग से लेकर भारत के लद्दाख तक फैली गलवान घाटी भारत के लिए वैसे भी सामरिक रूप से काफी महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि यह चीन ही नहीं पाकिस्तान से भी सटी है. साल 1962 में हुई लड़ाई में भी गलवान नदी का यह क्षेत्र एक प्रमुख केंद्र था। चीन यहां अब अपने लिए जरूरी सैन्य निर्माण कर चुका है और भारत की ओर से किए जाने वाले निर्माण को गैर कानूनी बताता रहता है।
इसी तरह हिमालय में करीब 14 हजार फुट की ऊंचाई पर स्थित 134 किलोमीटर लंबी पैंगोंग त्सो झील भी दोनों देशों के बीच विवाद का एक कारण है। भारत में इस झील का करीब 45 किलोमीटर हिस्सा पड़ता है। झील का इससे दोगुना लगभग 90 किलोमीटर क्षेत्रफल चीन में आता है। एलएसी वास्तव में इस झील के बीचोबीच से गुजरती है।
चीन की ओर से पश्चिमी सेक्टर में अतिक्रमण के एक तिहाई से ज्यादा मामले इसी पैंगोंग त्सो झील के आसपास होते हैं, क्योंकि दोनों ही देश यहां पर एलएसी पर सहमत नहीं हैं
दोनों देशों ने यहां पर अपनी-अपनी ही एलएसी तय कर रखी है। यही झील भारत आने वाले चुशूल घाटी के रास्ते में पड़ती है, जहां से हमला करना चीन के लिए आसान है। यहां पर भी दोनों देशों के सैनिकों में अक्सर झड़पें हो जाती है।लद्दाख के लिए सांविधानिक सुरक्षा उपायों के प्रमुख सोनम वांगचुक के इस वर्ष 19 फरवरी से आमरण अनशन शुरू करने ककारण वांगचुक ने कहा कि कहा कि छठी अनुसूची के तहत सुरक्षा उपायों और लद्दाख को पूर्ण राज्य का दर्जा न मिलने से लोगों में निराशा बढ़ रही है। लेकिन उनके अनशन की अनदेखी की गई।जिससे चीन के हौसले बुलंद हैं।
उधर चीन और भूटान के बीच विवाद का एक अहम कारण है डोकलाम भी है। पर यह विवाद जितना चीन-भूटान के बीच है, उतना ही भारत और चीन के बीच भी है। सिक्किम में भारत की सीमा के नजदीक स्थित डोकलाम पठारी क्षेत्र वास्तव में तीनों देशों के लिए एक ट्राई जंक्शन है यहां पर तीनों देशों की सीमाएं मिलती हैं। इसलिए यह भारत के लिए सामरिक रूप से काफी महत्वपूर्ण है। यहां से भारत चीन को मुंहतोड़ जवाब दे सकता है।
हिमालय क्षेत्र में सीमा पर यही एक ऐसी जगह है, जहां भौगोलिक रूप से भारतीय सेना की पकड़ काफी महत्वपूर्ण है। यहां पर भारतीय सेना ऊंचाई पर रहती है, जबकि चीन की सेना भारत-भूटान के बीच फंसती है। इसीलिए भारत यहां पर चीन को सड़क का निर्माण नहीं करने देना चाहता। चीन ने साल 2017 में इस क्षेत्र में सड़क का निर्माण शुरू किया तो भारत ने तगड़ा विरोध जताया था। इस पर 70-80 दिनों तक विवाद चला था। लेकिन सड़क बनती चली गई।
हिमालय का एक पहाड़ी दर्रा नाथूला भारत में सिक्किम और दक्षिण तिब्बत में चुम्बी घाटी को जोड़ता है। नाथूला दर्रा सिक्किम की राजधानी गंगटोक से लगभग 54 किलोमीटर पूर्व की ओर स्थित है। इसकी ऊंचाई 14,200 फुट है। यहीं से होकर भारतीय तीर्थयात्रियों का जत्था तिब्बत में स्थित कैलाश मानसरोवर की यात्रा के लिए गुजरता रहा है।हालांकि, यह रास्ता पिछले कई सालों से बंद था जिसे इसी वर्ष खोला गया है।
वैसे भी साल 1962 में चीन के हमले के बाद इस दर्रे को बंद कर दिया गया था। हालांकि, साल 2006 में इसे कई द्विपक्षीय व्यापार समझौतों के बाद खोला गया था। वैसे तो चीन अगर 1890 की संधि को माने तो भारत-चीन के बीच नाथूला में सीमा पर कोई विवाद नहीं है। इसके बावजूद मई 2020 में चीनी सैनिकों की हरकतों के कारण यहां भारतीय सैनिकों को उनका सामना करना पड़ा था।
अरुणाचल प्रदेश के तवांग क्षेत्र पर चीन अपनी निगाहें टिकाए रखता है। चीन इस क्षेत्र को तिब्बत का हिस्सा बताता रहता है।उसका दावा है कि तवांग और तिब्बत में अधिक सांस्कृतिक समानता है। वैसे भी तवांग बौद्धों का एक प्रमुख धर्मस्थल है। इसीलिए चीन इस क्षेत्र में तिब्बत की तरह ही अपना मानकर प्रमुख बौद्ध स्थलों पर अपनी पकड़ मजबूत बनाना चाहता है। इसीलिए जब दलाई लामा ने तवांग के बौद्ध मठ का दौरा किया था, तब चीन ने विरोध जताया था। यहां उसका हस्तक्षेप बढ़ता जा रहा है।
इसके अलावा चीन की नज़र बांग्लादेश देश के तट तक थल मार्ग से पहुंचने की है जिसकी बैठक भी हो चुकी है।वह इसे चिकिन नैक से निकालने की कोशिश में है।इस पर भारत मौन है।यदि इस संकरी पट्टी में चीन प्रवेश करता है तो हमारे सेवन सिस्टर्स क्षेत्र को अलग कर सकता है।
कुल मिलाकर चीन भारत के उत्तरी भारत और पूर्वोत्तर क्षेत्र पर नज़र रखें हुए है।भारत चुप है चीन भारत को अब चारों ओर से झूला झुला रहा है और सम्प्रभुता की गर्जना करने वाले साहिब जी चुप हैं।ये दोस्ती हम नहीं छोड़ेंगे का परिणाम अमेरिका ने दिखा दिया पाकिस्तान और भारत के बीच सीज़फायर में भारत को सरेंडर करके।यह सब तब हुआ जब भारतीय सेनाएं पाक अधिकृत कश्मीर को भारत में वापसी के लिए तैयार थीं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के कहने पर हुआ यह सीज़फायर हमारी कायरता की निशानी और अपनी सम्प्रभुता खोना नहीं तो और क्या है?
ऐसे गर्जन तर्जन से देश को कैसे विश्वास हो सकता है कि उसकी सम्प्रभुता और सम्मान बरकरार है।चीन को लाल आंख दिखाने वाले उसके द्वारा दो प्रांत हुचान में बना लेने पर मौन है।किसी ने एक इंच भूमि नहीं दबाई है जैसी गलत बयानी से चीन उत्साहित है और निरंतर भारत की सम्प्रभुता के लिए खतरनाक होता जा रहा है। साहिब की कथनी और करनी को अब सेना भी भली-भांति समझ गई है।यह दोगली नीति किसी बड़े संकट को आमंत्रित करती प्रतीत हो रही है।इस विषय पर संसद में गहन चिंतन की दरकार है।ताकि देश के सम्मान और सम्प्रभुता के लिए कुछ काम हो सके।

