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 *धर्म राजसत्ता से सांठ-गांठ कर, शक्ति-केंद्रों में बदलते चले गए*

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लगभग सभी धर्म राजसत्ता से सांठ-गांठ कर, शक्ति-केंद्रों में बदलते चले गए। जैन तथा बौद्ध धर्म ने भी यही किया। आजीवक पिछड़ते गए। सच तो यह है कि इस स्पर्धा में वे कभी थे ही नहीं। बुद्ध और महावीर में अपने-अपने धर्म-दर्शन के प्रचार-प्रसार का उत्साह था। यहां तक कि अपने विरोधियों के साथ भी संवाद करने पहुंच जाते थे।

ओमप्रकाश कश्यप

उन्होंने लोगों के दिलों के पुरातन देवताओं के भय को निकाल दिया है। सोने और चांदी के गहनों से देवताओं की तस्वीरें गायब होने लगी हैं। भगवान को खुद अपने चोरी हो जाने का डर सताता रहता है।[1]

आजीवक दर्शन को बॉशम ने गुमशुदा दर्शन कहा है। यह संभावना भी जताई है कि ‘आजीवक दर्शन’ इसका असली नाम नहीं है, बल्कि इसके विरोधियों द्वारा दिया गया है। बेणीमाधव बरुआ, एच यूई, हैनरिक जिमर आदि विद्वानों ने इसका असली नाम ‘आ-जीव’ (आजीव्य) दर्शन बताया है, जो इस दर्शन की वैचारिकी के काफी निकट प्रतीत होता है। लंबे समय से उपेक्षित रहे इस दर्शन की ओर पहली बार रूडोल्फ हार्नले ने 2 फरवरी, 1898 को रेखांकित किया था। तब से आज तक, बीते 128 वर्षों में इस विषय पर दर्जनों स्तरीय पुस्तकें लिखी जा चुकी हैं। हजारों लेख दुनिया-भर की भाषाओं में हैं। प्राचीन भारतीय दर्शन-संस्कृति पर बीती शताब्दी की ऐसी कोई महत्त्वपूर्ण पुस्तक नहीं है, जिसमें आजीवक दर्शन और दार्शनिकों का उल्लेख न हो। वेबसाइटें बनीं हैं, लोग ‘आजीवक’ सरनेम को सगर्व अपनाने लगे हैं।

इसके बावजूद यह आरोप भी अपनी जगह सही है कि बीच का लंबा समय ऐसा रहा, जब इस दर्शन का नाम तक सुनने में नहीं आता था। हालांकि इसी दर्शन की एक शाखा, जिसके प्रवर्त्तक अजित केशकंबलि थे, पर बुद्धिजीवियों ने खूब कलम चलाई। असली नाम से नहीं, चार्वाक[2] जैसा छद्म नाम देकर; ताकि भारत की प्राक्वैदिक मनीषा का सच सामने न आ सके और कथित वैदिक संस्कृति को भारत की मूल संस्कृति मान लिया जाए; ताकि भौतिकवादी दार्शनिकों को ‘खाओ-पियो, मौज करो’ की संस्कृति का जन्मदाता बताकर – यज्ञ के नाम पर अकूत हिंसा, मद्यपान (जिसे सोम कहा जाता था) तथा उन्मुक्त भोगाचार करने वाले पुरोहित वर्ग को परम सात्विक, त्यागी, मनीषी, ऋषि, मुनि आदि घोषित किया जा सके। सत्ता के साथ गठजोड़ के कारण वे इस षड्यंत्र में सफल भी रहे। परिणास्वरूप वेदों, उपनिषदों और महाकाव्यों में अपने प्रवृत्तिवादी दृष्टिकोण के लिए जाने गए ऋषिगण निवृत्तिवादी कहे जाने लगे; और जो सही मायने में निवृत्तिमूलक थे, उन्हें भारतीय दर्शन-जगत का खलनायक घोषित कर दिया गया।

एक समय बेहद शक्तिशाली रहा पुरोहित समुदाय खुद को देवताओं का प्रतिनिधि मानता था। वह रहता आश्रमों में था, लेकिन अधिकारों के मामले में राजाओं से भी बढ़कर था। उसे जो चाहिए था उसे राजनीतिक क्षेत्र के ‘चक्रवर्तियों’ से आसानी से हासिल कर लेता था। अपने बहुरूपी देवी-देवताओं के काल्पनिक आख्यानों तथा शतरंजी चालों के बल पर उसने ठेठ निवृत्तिवादी आजीवकों तथा निवृतिवाद की कोख से जन्मे जैन और बौद्ध धर्मों को पीछे ढकेल दिया था। आगे चलकर ईसाई तथा इस्लाम धर्मों का विकास हुआ। उनके प्रमुख तीर्थंकरों/पैगंबरों का अपना जीवन निवृतिमार्गियों जैसा ही था; तथापि उन्हें सफलता सत्ता का संरक्षण मिलने के बाद ही प्राप्त हो सकी। धीरे-धीरे लगभग सभी धर्म राजसत्ता से सांठ-गांठ कर, शक्ति-केंद्रों में बदलते चले गए। जैन तथा बौद्ध धर्म ने भी यही किया। आजीवक पिछड़ते गए। सच तो यह है कि इस स्पर्धा में वे कभी थे ही नहीं। बुद्ध और महावीर में अपने-अपने धर्म-दर्शन के प्रचार-प्रसार का उत्साह था। यहां तक कि अपने विरोधियों के साथ भी संवाद करने पहुंच जाते थे। वैसा कोई उदाहरण किसी आजीवक शास्ता के बारे में पढ़ने को नहीं मिलता। उनके लिए अपने दर्शन का प्रचार भी मानो परिग्रह था। इसका नुकसान यह हुआ कि जैसे ही धार्मिक-राजनीतिक और आर्थिक शक्तियों का गठजोड़ बना, सत्ता-केंद्रों से दूरी बनाकर रहने वाले आजीवक किनारे होते चले गए।\

आजीवक ठेठ भौतिकवादी और ब्राह्मण दर्शन की दिखावे की संस्कृति के धुर विरोधी थे। जैन और बौद्ध बीच के रास्ते पर चलने वाले। आजीवक मौन-भाव से निवृत्ति को जीते थे, जैन तथा बौद्ध मुखर भाव से निवृत्ति का महिमा-मंडन करते; वैदिक ऋषि बैठे-बैठाए सुख और ऐश्वर्य की कामना करते थे। वैदिक मंत्रों का मूल भाव ही यही है कि सुख-ऐश्वर्य के लिए जो भी जरूरी है उसे, बलि, सोम, यज्ञादि के बदले इंद्रादि देवता, ब्राह्मणों को बैठे-बैठाए, प्रचुर मात्रा में प्रदान करते रहें–

“हे प्रचुर सुख देने वाले इंद्र! हमें अधिकाधिक सुख प्रदान करो। थोड़ा धन नहीं, अपितु विपुल धन प्रदान करो। क्योंकि तुम प्रचुर धन और ऐश्वर्य प्रदान करने की इच्छा रखने वाले हो। हे वृत्रहंता शूरवीर! बहुत दान देने वाले (भूरिदा) इंद्र! जो भी तुम्हारे पास आता है, उसे भरपूर दो। थोड़ा मत दो, भरपूर दो। क्योंकि तुम तो सचमुच में बहुत कुछ देने वाले हो।”[3]

देवता अपनी ओर से कुछ देते हैं, या दे सकते हैं, इसका भरोसा स्वयं ऋषिगणों को भी नहीं था। इसके बावजूद वैदिक कर्मकांड के नाम पर, आडंबरों का सिलसिला लगातार बढ़ता जा रहा था। श्रमण परंपरा से उनके वैर का कारण दार्शनिक या वैचारिक मतभेद नहीं थे। उनकी चिंता बस इतनी थी कि जनसमाज में अपनी पैठ के चलते श्रमण-तीर्थंकर कहीं उनकी दान-दक्षिणा – जिसे वे यज्ञ-भाग या दैव-भाग कहते थे – के लिए संकट का कारण न बन जाएं। लोग ऐसा न करें, इसकी रोकथाम के लिए भारी दंड का प्रावधान किया गया था। विधर्मियों को वे धूर्त्त, मक्कार, राक्षस, असुर, पाषण्ड, मूर्ख आदि कहकर बुलाते थे। दैववाद की आड़ में भौतिक सुख-सुविधाओं की कामना इतनी प्रबल थी कि उनकी सारी बौद्धिक चेतना – वैदिक मंत्रों को गाया कैसे जाए, उनमें वर्णित कर्मकांडों को याज्ञिक अनुष्ठान में कैसे बदला जाए, जैसे कर्मकांडों तक सिमटी हुई थी। इसी के परिणामस्वरूप, सामवेद, यजुर्वेद जैसे वेदों, उपनिषदों, स्मृति आदि  ग्रंथों की रचना हुई। अथर्ववेद तो गुप्तकाल या उसके भी बाद की रचना है।

दार्शनिक प्रश्नों के मामले में क्षत्रिय भी उनके लिए चुनौती बने हुए थे। ‘छांदोग्योपनिषद्’ की एक कथा के अनुसार अरुणि पुत्र श्वेतकेतु पाञ्चाल देशीय लोगों की सभा में जैवलि पुत्र प्रवाहण से मिला। उसने अपनी विद्या से प्रवाहण को प्रभावित करने की भरसक कोशिश की, किंतु नाकाम रहा। आखिरकार वह प्रवाहण के आगे नतशिर हो गया। प्रवाहण ने ‘आत्मविद्या’ के बारे में बताते हुए उससे कहा–

“हे गौतम! पूर्वकाल में तुमसे पहले यह विद्या किसी ब्राह्मण के पास नहीं गई। इसी विद्या के कारण संपूर्ण लोकों में क्षत्रिय का अनुशासन होता आया है।”[4]

“बृहदारण्यक उपनिषद्” भी क्षत्रियों को आत्मविद्या का प्रथम उपदेष्टा मानती है। उसके अनुसार गार्ग्य गौत्र में जन्मा गर्वीला बालाकि काशिराज अजातशत्रु के पास पहुंचा और दर्प (अहंकार) से बोला कि मैं तुम्हारे आगे ब्रह्म की व्याख्या करूंगा। उसके बाद उसने बोलना आरंभ कर दिया। अजातशत्रु विद्वान था। हर बार, ‘यह तो मैं जानता हूं, यह ब्रह्मविद्या नहीं है’ – कहकर बालाकि को चुप करा देता था। अंतत: गार्ग्य ने अजातशत्रु को अपना गुरु मानकर, ब्रह्मविद्या सिखाने का अनुरोध किया। अजातशत्रु इसके लिए तैयार हो गया।[5] उस ज्ञान के आधार पर ब्राह्मणों ने अन्य कई उपनिषदों की रचना की और क्षत्रियों से ब्रह्मवेत्ता का दर्जा हड़प लिया।

आजीवक ब्रह्म जैसी किसी भी अप्रत्यक्ष सत्ता के अस्तित्व से इंकार करते थे। जीव के अलावा वे सिर्फ चार तत्वों पृथ्वी, जल, अग्नि तथा वायु को मानते थे। उनका भरोसा केवल अनुभवजन्य ज्ञान पर था। जो अदृश्यमान तथा इंद्रियानुभूति से परे है, उनकी दृष्टि में वह अप्रामाणिक था। स्वर्ग-नर्क, पाप-पुण्य पर उन्हें भरोसा न था। न वे परलोक को मानते थे, न पुनर्जन्म को। उनका विचार था कि वस्तुजगत की सुंदरता, असुंदरता, उसके रंगीन और स्याह पक्ष का एकमात्र कारण प्रकृति है। कोई भगवान नहीं, देह से परे कोई आत्मा भी नहीं है। देह के ही कारण व्यक्ति मैं, मेरा, मैं युवा हूं, मैं बूढ़ा हो चला हूं – जैसा महसूस करता है। सुखी जीवन के लिए सभी आवश्यक वस्तुएं धरती पर मौजूद हैं। बुद्धिमान व्यक्ति न तो स्वर्ग के प्रलोभन में पड़ते हैं, न ही उस भय से हाथ आए सुख का त्याग कर देते हैं। दुखों से शाश्वत निवृत्ति के लिए वे कठिन तप करते। अपरिग्रह और अचेलकत्व को अपनाते। उनकी कठिन साधना का प्रभाव इतना गहरा था कि आगे चलकर अपनी स्वतंत्र पहचान बनाने वाले बुद्ध तथा महावीर ने, अपनी साधना की शुरुआत आजीवक-पथ पर चलकर ही की थी।

आत्मा, परमात्मा, पुण्य-पाप, स्वर्ग-नर्क, शुचिता-पवित्रता जैसी संकल्पनाएं चालाक और परजीवी लोगों द्वारा, सीधे-सरल मेहनतकश लोगों को अपना बौद्धिक गुलाम बनाने के लिए ईजाद की गई हैं। अपने इसी विश्वास के भरोसे आजीवकों ने गणित, आयुर्वेद तथा ज्योतिष के क्षेत्र में अभूतपूर्व ज्ञान हासिल किया। शांति, समानता, अहिंसा, युद्ध-विरोध और उद्यमशीलता के समर्थक और प्रस्तावक बने। भास्कर प्रथम ने मक्खलि गोसाल तथा पूरण कस्सप को गणित का विद्वान (गणितविदो मस्करी-पूरण) बताया है। मस्करी, पूरण, मुद्गल, पूतना आदि का उल्लेख उन्होंने प्राक्वैदिक गणितज्ञों के रूप में किया है। यह भी बताया है कि उन्होंने जो गणित की पुस्तकें रची थीं, उनमें एक-एक लाख श्लोक थे। चूंकि वे आमजन से जुड़े थे, इसलिए उनका गणित संबंधी ज्ञान भी रोजमर्रा के जीवन में काम आने वाला था। चार भुजाओं से घिरे क्षेत्र का क्षेत्रफल निकालने की विधि मस्करी-पूरण की देन है। आयुर्वेद के तो वे जन्मदाता कहे जा सकते हैं। इतना ही नहीं, आजीवक परमाणुवाद के आदिम जन्मदाता थे, यह बात दुनिया-भर के विद्वान लगातार लिखते आ रहे हैं।

आजीवकों को बारे में पढ़कर लगता है कि वे किसी भी मुद्दे पर रूढ़ नहीं थे। उनकी सभाओं में खुलकर बहस होती थी। महावीर तथा बुद्ध की सभाओं में क्रमशः महावीर तथा बुद्ध बोलते और सभा सुनती थी। कोई बहस करे तो उन्हें चुप कराना बुद्ध को आता था। प्रसेनजित के प्रश्न कि ‘उम्र में वरिष्ठ होने के बावजूद पूरण कस्सप, गोसालक आदि तीर्थंकर सम्यक बुद्धत्व का दावा नहीं करते, आप तो उनसे छोटे तथा नए-नए प्रव्रजित हुए हैं’ – का सीधा जवाब देने के बजाय बुद्ध यह कहकर कि ‘सांप, क्षत्रिय, आग और भिक्षु को कभी छोटा नहीं समझना चाहिए। अवसर मिलते ही सांप डस सकता है, क्षत्रिय राजशक्ति के बल पर बदला ले सकता है, आग जला सकती है तथा भिक्षु अपने तेज से भस्म कर सकता है’ – प्रसेनजित को चुप कर देते हैं। आजीवकों के बीच खुले संवाद के चलन को देखते हुए प्रसेनजित ने उनके लिए कूटागारशालाएं बनवा कर दी थीं। आज की भाषा में हम उन्हें ‘विमर्श-सदन’ कह सकते हैं। दूसरी ओर त्रिपिटकों में आजीवक सभाओं में होने वाले मुक्त संवाद को शोर-शराबे तथा अव्यवस्था के रूप में वर्णित किया गया है।

आजीवकों का बुद्धिवादी दृष्टिकोण, विशेषरूप से अजित केशकंबलि का ठेठ भौतिकवाद, कर्मकांड को आजीविका के रूप में इस्तेमाल करने वाले ब्राह्मणवादी दर्शनों के आगे बड़ी चुनौती था। इसलिए स्मृति, पुराण, महाकाव्य आदि उनके लगभग सभी ग्रंथ आजीवकों तथा भूतवादियों की आलोचना से भरे पड़े हैं। मसलन, ‘वायुपुराण’ में उन्हें अधार्मिक, वर्णाश्रम की मर्यादा से बहिर्भूत, वर्णसंकर, कारीगरी या शिल्पकर्म करने वाले पिशाच कहा गया। ‘ब्रह्माण्डपुराण’ एक और कदम आगे बढ़कर उन्हें चोर और विश्वासघाती भी घोषित कर देती है। इतना ही नहीं, लोगों की स्मृति से आजीवक धर्म-दर्शन का नाम पूरी तरह गायब हो जाए, इसके लिए आलोचना का काम भी, उसका नाम बदल-बदलकर किया गया। लोकायत-जन ही आजीवक थे, या आजीवकों को ही लोकायतिक कहा जाता था, इसकी पुष्टि करते हुए आचार्य आनंद झा लिखते हैं–

“लोकायत-सिद्धांत-अनुगामी जन ही ‘आजीवक’ नाम से इसलिए अभिहित होते थे क्योंकि शरीरात्मवादी होने के कारण वे शरीर के सदुपयोगार्थ, उसकी रक्षा के लिए…आजीविका को, वे, मुख्य-कर्तव्य के रूप में अपनाते थे। एतदरिक्त उनके आजीवक नाम से पुकारे जाने का यह भी कारण था, कि वे श्रमोपयोगी स्वास्थ्य के लिए सदा सचेष्ट रहते थे। शरीर को आत्मा मानने वाले अपने स्वास्थ्य-स्वरूप जीवन के संपादन में सर्वथा सचेष्ट हों, यह सर्वदा युक्ति संगत ही है…यह दर्शन जनजीवन से घनिष्ठता रखने वाले कृषि पशुपालन वाणिज्य आदि; राजनीति स्वरूप दण्डनीति और स्वास्थ्यप्रद आयुर्वेद, इन तीनों से पूर्ण रूप से संबद्ध था…आचार्य शंकर ने जो अन्य दर्शनों के खंडनार्थ अभिकरण रचना एवं उसके भाष्य की रचना की है, यहां इस दर्शन खंडनार्थ अभिकरण और भाष्य की रचना नहीं है…लोकायत दर्शन का जो निंदित स्वरूप, जिसका वर्णन हरिभद्र सूरि आदि जैन विद्वानों और माधवाचार्य आदि वैदिक विद्वानों ने किया है – वह लोकायत का वास्तविक स्वरूप नहीं है।[6]

‘सर्वसिद्धांतसंग्रह’ (सातवीं-आठवीं शताब्दी) का रचियता शंकराचार्य को माना जाता है। इस कृति में ‘लोकायत’ मतावलंबियों की आजीविका संबंधी मान्यता से भी उनके विवेकोन्मुखी दृष्टिकोण की पुष्टि होती है। मनुष्य और मनुष्यता को सर्वोपरि मानने वाले लोकायती/आजीवक कहते थे – ‘बुद्धिमान व्यक्ति को चाहिए कि वह खेती, पशुपालन, व्यापार, राजनीति और प्रशासन आदि सामाजिक रूप से मान्य संसाधनों को अपनाकर, दुनिया में सुख-प्राप्ति के लिए उद्यमशील रहे।’[7] इसे अकबर की इबादतगाह में पहुंचे ‘नास्तिक’ के कथन से जोड़कर देखें तो आजीवकों का नीतिवादी दृष्टिकोण एकदम साफ हो जाता है। ‘आइन-ए-अकबरी’ के अनुसार, विभिन्न धर्मों के प्रतिनिधियों के बीच उसने कहा था–

“स्वर्ग ऐसी जगह है जहां मनुष्य किसी भी नियंत्रण से मुक्त होकर इच्छानुसार स्वतंत्र जीवन जी सके; जबकि नरक ऐसा राज्य है जिसमें व्यक्ति को अपनी आजादी छोड़, दूसरों के अधीन रहना पड़ता है…केवल वही विद्याएं मान्य हैं जो शासन-प्रशासन को व्यवस्थित करने में मददगार हों। सच्चे ज्ञान का उद्देश्य है– न्यायपूर्ण प्रशासन और लोक-कल्याणकारी शासन का ज्ञान। इसी तरह विज्ञान का मतलब है, न्यायोचित प्रशासन तथा उदार सरकार का विवेक।”

ग्यारहवीं शताब्दी के संस्कृत नाटक ‘प्रबोधचंद्रोदय’ में मोह को ‘प्रवृत्ति’ तथा विवेक को ‘निवृत्ति’ की संतान कहा गया है। आजीवक, जैन तथा बौद्ध आदि दर्शन निवृत्तिपरक थे। जिस श्रमण परंपरा से वे निकले थे, वह औपचारिक शक्ति केंद्रों से दूरी बनाकर रखने पर जोर देती थी। भागवत में श्रमणों को संतुष्ट, करुणा, मैत्री, शांत, दान्त (तपःक्लेश को सहने वाले), तितिक्षु, आत्मलीन तथा सभी के प्रति समदृष्टि रखने वाला कहा गया है।[8] आजीवक इसी परंपरा का निकष थे। बुलाकर दी गई भिक्षा, भिक्षा में मांस अथवा नशे की चीजें स्वीकारना उनके धर्म में निषिद्ध था। खेती वे बिना बधिया किये बैलों से करते थे। चातुर्आश्रम और वर्णभेद न मानने के कारण ब्राह्मण उन्हें वर्णाश्रम की मर्यादा से बहिर्भूत, वर्णसंकर आदि कहते थे। उनकी पैठ विराट जनसमुदाय के बीच थी। कदाचित यही बात निरंतर केंद्रीभूत होती सत्ताओं को अखरती थी।

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