Site icon अग्नि आलोक

*ध्यान करना और ध्यान से करना दोनो दो बातें*

Share

       डॉ. विकास मानव

      जिन्हें संघं शरणम, बुद्धम शरण जाना हो वो ध्यान करें और जिन्हें जीवन को समृद्ध तरीके से जीना है वो सब कुछ ध्यान से करें।

अगर ध्यान करना पड़े तो ये है जीवन से भागना। 

गृहस्थ है जीवन को व्यवस्थित तरीके से जीना. गृहस्थ है अर्थ, धर्म, काम और मोक्ष।

बस इतना ही जीवन है। 

     ध्यानी, ज्ञानी, साधक, तपस्वी, सिद्ध और गृहस्थ सभी का एक ही लक्ष्य है वो है मोक्ष। 

     जिन्हें जीवन को लेकर प्रयोग करने हैं वो खड़े रहें एक टांग पर और करें ध्यान, ज्ञान और भी दुनिया भर की नौटंकियाँ हैं। सीधा रास्ता तो मोक्ष का गृहस्थ ही है | 

भोग को भोगें……..इसे ठीक से समझना। अच्छा बुरा का चुनाव ना करें। जो भी जीवन में है उसे भोगकर खर्च कर लें। जब कुछ बचा ही नहीं तब जो बचता है उसे ही मोक्ष कहते हैं।

      दो नाव पर पैर न रखें….. एक ध्यान और दूसरा पत्नी | ये नहीं चलेगा। जिन लोगों का ध्यान नहीं लगता है वो भाग्यशाली हैं। क्योंकि ध्यान लग गया तो गृहस्थी नहीं बचेगा | इसीलिए मैं बार-बार कहता हूँ जो भी करें पहले ठीक से समझ लें। अगर पति पत्नी स्वस्थ हैं तो गृहस्थ समृद्ध होगा ही। पाप है गृहस्थ से भागना। 

जिन्हें ध्यान में आनंद होता है उन्हें पत्नी के साथ आनंद नहीं हो सकता है। जो व्यक्ति जिस भी मार्ग का अनुसरण कर रहा है यदि उसे उस मार्ग में आनंद नहीं आ रहा है तो वो ईमानदार नहीं रह सकता है | 

     प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च जना न विदुरासुराः।

न शौचं नापि चाचारो न सत्यं तेषु विद्यते।।

    (गीता/16/7)

अन्वय :

प्र वृत्तिम् च निः वृत्तिम् च जना न विदुः असुराः।

न शौचम् न अपि च आचारो न सत्यम् तेषु विद्यते।।

      दो प्रकार के भूत सर्ग इस लोक में हैं। एक दैवसर्ग और दूसरा आसुर सर्ग। इनमे से आसुर सर्ग के लिए उपदेश है कि ये जो आसुर सर्ग के भूतसर्गे है, इन्हें प्रवृति और निवृत्ति का ज्ञान नही होता। न इनमे शुचिता अर्थात् पवित्रीकरण होता है, न शुद्ध आचरण होता है। इन्ही सब के कारण इनमे सत्य की भी विद्यमानता नही पायी जाती।

प्र + वृत्ति और नि + वृत्ति पर संस्कृत व्याकरण के द्वारा इन दो शब्दों पर ध्यान दें।

प्र + वृत्ति।

सर्व प्रथम प्र जो अव्ययी उपसर्ग है जिसका अर्थ “अधिक” होता है।

     यदि हम धातु अर्थात् क्रिया पर देखें तो प्र से पृञ् धातु बनती है जिसका अर्थ- प्रीञ्, तर्पणे, तर्पणं, तृप्ति, सन्तुष्टि होता है।

हम स्वयं को किसी भी कार्य में अधिक से अधिक लगा कर उसमें सन्तुष्टि प्राप्ति के उद्यम में व्यस्त होते हैं।

    प्र के पश्चात् वृत्ति शब्द है। वृत से वृतु धातु या क्रिया होती है जिसका अर्थ वर्तने, वर्तन सत्ता, वर्तते, ववृते, वर्तिता होता है।

वृत्ति शब्द का सीधा अर्थ होता है-आवरणे , चक्रावरणे जो हमे चारों ओर से घेर कर वर्तने में सलंग्न करे वह वृत्ति है। इसी वृत्ति में नि उपसर्ग लगा कर वृत्ति के प्रवाह को थाम लेते हैं, रोक लेते हैं। 

       तो निवृत्ति शब्द हो जाता है। जो आसुरी सर्ग के अधीन होते हैं वे प्रवृत्ति अर्थात् लौकिक उन्नति के सम्बन्ध से प्रवृत्ति और निवृत्ति,तथा मोक्ष के साधन के सम्बन्ध से भी प्रवृत्ति और निवृत्ति अर्थात् क्या करना चाहिए और क्या न करना चाहिए इसका उन्हें ज्ञान नही होता।

      शौच अर्थात् शुचिता अथवा पवित्रता, आचार किस आचरण से आचरित होना चाहिए अर्थात् कैसी वृत्ति में चलन करना चाहिए, किस पवित्र चलन को स्वयं आवेशित करना चाहिये, ऐसे किसी चरण का ज्ञान न होने से आचार न होने से विचार भी अपवित्र हो जाता है जिससे उनमे सत्य का भी आभाव होता है।

गृहस्थ रहें या संन्यास, अपने जगह पर ईमानदारी से रहें, क्योंकि कृति टूटते ही विकृति पैदा होती है. इसी को कहते हैं घर का ना घाट का.

ReplyReply to allForwardAdd reaction
Exit mobile version