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पूरे देश के लिए नेचर-बेस्ड सॉल्यूशन का मॉडल बन सकती है ग्रेट ग्रीन वॉल ऑफ आंध्र प्रदेश?

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आंध्र प्रदेश का तटीय इलाका बार-बार आने वाले चक्रवातों, समुद्री कटाव और जलवायु परिवर्तन के कारण कई स्तरों पर नुकसान झेल रहा है। इस स्थिति से निपटने और नुकसान को कम करने के लिए राज्य सरकार ने “ग्रेट ग्रीन वॉल ऑफ आंध्र प्रदेश” नाम से एक पहल की शुरुआत की है।

डॉ. कुमारी रोहिणी

आंध्र प्रदेश अपनी भौगोलिक स्थिति, तटीय लंबाई, वर्षा पैटर्न और समुद्र पर आजीविका की निर्भरता के कारण जलवायु परिवर्तन के प्रभावों की चपेट में आसानी से आ जाता है। लंबी समुद्री सीमा होने के कारण इसको बार-बार आने वाले चक्रवातों, तटीय क्षरण, समुद्र-स्तर में वृद्धि और बाढ़ जैसी स्थिति से जूझना पड़ता है। इससे हज़ारों परिवारों की आजीविका पर तात्कालिक असर तो पड़ता ही है, क्षेत्र की पारिस्थितिकी पर भी अछूती नहीं रह है है। 

इससे निपटने के लिए आंध्र प्रदेश सरकार ने ग्रेट ग्रीन वॉल ऑफ आंध्र प्रदेश नाम से एक महत्वाकांक्षी पहल शुरू की है। लक्ष्य है बड़ी संख्या में पेड़ लगाकर और प्राकृतिक पारिस्थितिकी को पुनर्जीवित कर तटीय क्षेत्रों को सुरक्षा कवच देना है।

ग्रेट ग्रीन वॉल ऑफ़ आंध्र प्रदेश परियोजना की रूप रेखा और उसका लक्ष्य

आंध्र प्रदेश सरकार की यह पहल अफ्रीका की प्रसिद्ध “ग्रेट ग्रीन वॉल” परियोजना से प्रेरित है, जहां सहारा के दक्षिणी क्षेत्र में मरुस्थलीकरण रोकने के लिए वृक्षारोपण का सहारा लिया गया था। आंध्र प्रदेश ने इसी विचार को अपने तटीय माहौल के हिसाब से ढाल लिया है। तट पर समुद्र और ज़मीन मिलकर एक खास तरह की प्राकृतिक व्यवस्था बनाते हैं, जहां मिट्टी, पानी, पौधे और छोटे-बड़े जीव मिलकर पर्यावरण को संतुलित रखने का काम करते हैं।

तीन स्तरों पर होगा समुद्री आपदाओं से सुरक्षा देने का प्रयास

परियोजना की विशेषताएं:

इस परियोजना का लक्ष्य तटीय इलाकों में रहने वाले लोगों को तूफ़ान, चक्रवातों और भूमि-कटाव जैसे खतरों से होने वाले असर से ज़्यादा से ज़्यादा बचाना है। पेड़ों की पट्टी और प्राकृतिक सुरक्षा-तंत्र बनाकर नुकसान को घटाने की कोशिश की जाएगी। साथ ही, प्राकृतिक जंगलों, जैसे मैंग्रोव आदि को वापस बढ़ाने को भी केंद्र में रखा गया है, ताकि समुद्री और तटीय जीव-जंतु सुरक्षित रहें और पूरा पारिस्थितिकी तंत्र मज़बूत बन सके।

चक्रवात, तूफ़ान और उनका असर

भारत के पूर्वी तट पर स्थित आंध्र प्रदेश, विविधताओं से भरा एक विस्तृत, तटीय राज्य है। इसकी तटरेखा की कुल लंबाई लगभग 1053 किलोमीटर है, जो उत्तर में ओडिशा की सीमा से शुरू होकर दक्षिण में तमिलनाडु की सीमा तक फैली हुई है। भौगोलिक दृष्टि से पूरी तरह बंगाल की खाड़ी से घिरे होने के कारण, इसका तटीय इलाका उष्णकटिबंधीय चक्रवातों के रास्ते में आ जाता है। 

ये तूफ़ान समुद्री सतह के तापमान, मानसूनी वायु-प्रणालियों, समुद्री सतह पर ऊष्मीय ऊर्जा और लेटरल वायुगतिकी यानी आस-पास से गुज़रने वाली हवाओं के मिले-जुले असर की वजह से आते हैं। आंध्र प्रदेश के पास की समुद्री खाड़ी का पानी बहुत गर्म होता है। यही गर्म पानी हवा में ज़्यादा नमी और ऊर्जा भर देता है, जिससे तूफ़ान और भी ताक़तवर बन जाते हैं। इससे, इलाके में चक्रवात भी ज़्यादा तेज़ और खतरनाक हो जाते हैं।

इलाके में जलवायु की निगरानी से पता चलता है कि बंगाल की खाड़ी क्षेत्र में वर्षा चक्र में होने वाले बदलाव और समुद्री सतह के बढ़ते तापमान के असर से खतरनाक साइक्लोनिक गतिविधि बनी रहती है।

आंध्र प्रदेश के तटीय इलाकों में अक्सर आने वाले साइक्लोन और तूफ़ानों के प्रभावों के कई पहलू होते हैं। इसमें जान-माल से लेकर आर्थिक, पारिस्थितिक और भू-भौतिक (भूमि-क्षरण) जैसे सभी स्तरों पर नुकसान होता है।

तूफ़ानों, सुनामी-सर्ज, चक्रवातों और तटीय कटाव से राज्य का करीब 91900 वर्ग किलोमीटर इलाका प्रभावित होता है। इस इलाके में रहने वाले लगभग 3.4 करोड़ लोगों के जन-जीवन और आजीविका पर इसका सीधा असर पड़ता है, जो मुख्य रूप से धान की खेती, मछली पालन, नौकरी आधारित तटीय गतिविधियों, जैसे कि बंदरगाहों पर होने वाले काम की ठेकेदारी, मछली बाज़ार, कोल्ड-स्टोरेज, लेबर-चेन वगैरह के सहारे अपना जीवन चलाते हैं।

तूफ़ानों, सुनामी-सर्ज, चक्रवातों और तटीय कटाव से राज्य का करीब 91900 वर्ग किलोमीटर (972 किमी) इलाका प्रभावित होता है।

बीते सालों में आई कुछ बड़ी आपदाओं से हुआ नुकसान

हर साल इन आपदाओं से लोगों को कई तरह के नुकसान होते हैं, जिनमें घरों के उजड़ने से लेकर जीवन और आजीविका तक का नुकसान शामिल है।फ़ोटो: unsplash.com

हर साल इन आपदाओं से लोगों को कई तरह के नुकसान होते हैं, जिनमें घरों के उजड़ने से लेकर जीवन और आजीविका तक का नुकसान शामिल है। कच्चे मकानों की छत उड़ जाने की घटनाएं सामान्य हैं। हर साल हज़ारों लोग बेघर हो जाते हैं। तेज़ हवाओं, तूफ़ानी लहरों और समुद्री बाढ़ के कारण लोग न सिर्फ़ अपने घर से, बल्कि पशुधन और ज़रूरी सामान तक से हाथ धो बैठते हैं।

साइक्लोन मोंथा (अक्टूबर 2025) 

28 अक्टूबर 2025 को आए मोंथा साइक्लोन ने राज्य के प्रकाशम, नेल्लोर, बापटला और नंद्याल ज़िलों को सबसे अधिक प्रभावित किया। इस दौरान कुल 249 मंडल, 48 शहर और 1434 गांव बुरी तरह प्रभावित हुए। राज्य की लगभग 4,794 किमी सड़कों और 311 पुलों को गंभीर क्षति पहुंची।

साइक्लोन मिचुआंग (दिसंबर 2023):

दूरगामी प्रभाव: मछली उत्पादन और निवेश में गिरावट

लगातार होने वाली तबाही से निवेश घटता है, पुनर्स्थापना लागत बढ़ती है और पर्यटन व तटीय व्यापार पर भी असर पड़ता है।फ़ोटो: unsplash.com

तटीय कटाव और ज़मीन के नुकसान की बढ़ती समस्या

पारिस्थितिकी और संरक्षण पर असर

प्राकृतिक सुरक्षा की दीवार कमज़ोर होने के कारण खारा पानी धीरे-धीरे भूजल और खेतों में घुस रहा है और कूप, कुएं, नलकूप, तालाब खारे होने लगे हैं। इसके अलावा, मछलियों और प्रवासी पक्षियों की प्रजातियों में कमी आ रही है, जबकि बाहरी और तेज़ी से फैलने वाले पौधों की प्रजातियों का दायरा बढ़ रहा है।

स्थानीय समुदायों को शामिल करना, उनकी आजीविका-रोकथाम करना, योजना को उनके हित में बनाने जैसे पहलूओं को ध्यान में रखने से इस योजना की सफलता की संभावना को बढ़ाया जा सकता है।फ़ोटो: pexels.com

ग्रेट ग्रीन वॉल परियोजना की सीमाएं और चुनौतियां

तमाम बेस्ट-प्रैक्टिस और नीतिगत-ढांचों को ध्यान में रखने के बावजूद इस बात को महत्व देना ज़रूरी है कि इतने बड़े पैमाने पर शुरू की जाने वाली परियोजनाओं की अपनी कुछ चुनौतियां भी होती हैं। आंध्र प्रदेश के ग्रेट ग्रीन वॉल परियोजेना की कुछ चुनौतियां इस प्रकार हैं जिनसे समय-समय पर निपटने की ज़रूरत पड़ सकती है:

दूसरे देशों से क्या सीखा जा सकता है

आंध्र प्रदेश सरकार की ग्रेट ग्रीन वॉल योजना एक बड़ी और नई सोच वाली पहल है। अगर इस योजना को वैज्ञानिक तरीके से, स्थानीय भौगोलिक परिस्थितियों और संबंधित समुदायों की ज़रूरतों को ध्यान में रखकर लागू किया जाए, तो यह न केवल राज्य के लिए बल्कि पूरे देश के लिए एक सफल प्रकृति-आधारित समाधान (नेचर-बेस्ड सॉल्यूशन) का मॉडल बन सकती है।

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