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बेशक क्या देश की फिज़ा बदल रही है!

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सुसंस्कृति परिहार 

पिछले दिनों राष्ट्रपति से मोदीजी और शाह की मुलाकात पर अभी पर्दा नहीं उठा है उधर संघ भी बैठक दर बैठक

 आहूत कर जाने क्या षड्यंत्र कर रहा है यह भी राज ही बना हुआ है। लेकिन सूत्र जो ख़बर दे रहे हैं कि शायद मोदी और शाह का बर्चस्व अब ख़त्म होने वाला है क्योंकि संघ अब इन्हें और बर्दाश्त करने की स्थिति में नहीं है।इससे उपराष्ट्रपति चुनाव उम्मीद वार पर भी निश्चित असर होगा।

फिलहाल राज्यसभा में जिस तरह भाजपा कार्यवाहक अध्यक्ष जेपी नड्डा ने कांग्रेस पार्टी अध्यक्ष खरगे जी को मेंटल कह दिया वह इतना भारी पड़ गया कि उन्हें खरगे जी से माफ़ी मांगने मज़बूर होना पड़ा। इससे पूर्व भी राज्यसभा में पिछले दिनों उपराष्ट्रपति धनखड़ की मौजूदगी में इन्हीं नड्डा ने जो कहा था वह संविधान की मर्यादा को तार तार करने वाला था। याद कीजिए उन्होंने सदन में कहा मैं जो बोलूंगा वहीं रिकार्ड में जाएगा।बाकी नहीं।आज बुरे फंसे नड्डा जब खरगे जी ने उन्हें दिन में तारे दिखा दिए।

इधर गंगाराम अस्पताल से निकलते हुए प्रतिपक्ष नेता राहुल गांधी से लोकसभा अध्यक्ष ओम बिड़ला का जब सामना हुआ तो आटोमेटिक एक महान नेता के लिए हाथ जोड़कर उनने अभिवादन किया। जो वीडियो सामने आया है उसमें राहुल दुखी नज़र आ रहे हैं क्योंकि वे झारखंड नेता शिबू सोरेन के निधन की ख़बर पाकर उन्हें श्रद्धांजलि देकर बाहर निकल रहे थे।

ये दोनों घटनाएं यह बताने के लिए काफ़ी है कि भाजपा के साम्राज्य में निकट भविष्य में भारी से भारी परिवर्तन होने वाला है।इसके संकेत संघ ने दे दिए हैं। मोदी शाह अपने बफ़ादारों को खोजने में लगे हैं।चेहरे पर मातम पसरा हुआ जिसका असर नड्डा और लोकसभा अध्यक्ष ओम बिड़ला के व्यवहार से भी दृष्टिगोचर हो रहा है।संघ अब मोदी शाह की जोड़ी से ऊब चुका है।मोदी के कारनामों की वजह से जनता भी सरे आम लोग अब  सड़कों पर खुलकर बोलने लगे हैं। खासकर अमेरिका से ट्म्प का जो व्यवहार इन दिनों सामने आया है उससे आम नागरिक भी पशोपेश में है।एक मुर्दा देश पाकिस्तान को मोदीजी की बदौलत डोनाल्ड ट्रम्प ने संजीवनी देकर हमारे शत्रु देश को आधार दिया है।यह तौहीन मोदी की नहीं समूचे देश की है। चुनाव आयोग ने मोदी के वशीभूत हो जिस तरह मतदाता के साथ छलावा किया है और फिर बिहार में करने की फ़िराक में है।उसने भारत के लोकतांत्रिक गणराज्य को चोट पहुंचाई है।

लोग सही लिख रहे हैं ये ग़द्दारों के वंशज हैं इनमें देश प्रेम नहीं है इन्होंने अंग्रजों के सामने समर्पण किया वा देश के क्रांतिकारियों के ख़िलाफ़ काम किया।आज भी वही हाल है,देश को मोदी ट्म्प के इशारे पर चला रहे हैं उनसे दो टूक बात करने का जज़्बा उनमें नहीं है तो आए दिन प्रतिपक्ष नेता और उनके सहयोगी दलों से लड़कर देशभक्त बने रहना चाहते हैं।

यकीन है यह उथल-पुथल यदि होती है तो देश को कुछ समय के लिए राहत तो देगी। किंतु अगर जमकर नागनाथ या दूसरे सांपनाथ बैठ जाते हैं। तो कोई फ़र्क नहीं पड़ने वाला।

यदि वास्तविक बदलाव चाहते हैं तो इन मौकेपरस्त लोगों की असलियत को घर घर पहुंचाने की ज़रुरत है।ये भी संभव भाजपा और संघ की फूट से भाजपा दो फाड़ हो जाए और प्रतिपक्ष को सरकार बनाने का ऑफर मिल जाए।यदि नहीं मिलता है तब भी इन लोकतंत्र के भक्षकों के पोल खोल अभियान को तेज़ी से तमाम प्रतिपक्ष के साथियों को उठाना होगा। क्योंकि इन दस सालों में इनकी जड़ें बहुत गहरे प्रविष्ट कर गई है।जनता ही इनका वहिष्कार कर सत्ताच्युत कर सकती है। बदलाव पर नज़र रखें और संविधान तथा लोकतंत्र बचाने प्रतिबद्ध हो जाएं।सुनहरा सबेरा इंतज़ार में है।

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