-तेजपाल सिंह ‘तेज’
15 अगस्त 1947 को भारत में 3% ब्राह्मण, 33% मुसलमान और 30% कायस्थ सत्ता में थे। ब्राह्मणों के भारत के शासक बनते ही, अंग्रेजों की नज़र में जो लोग अयोग्य थे, वे भारत के शासक बनते ही योग्य हो गए और बाकी सभी अयोग्य हो गए। कोलकाता उच्च न्यायालय में एक प्रिवी काउंसिल हुआ करती थी। अंग्रेजों ने नियम बनाया था कि कोई भी ब्राह्मण प्रिवी काउंसिल का अध्यक्ष नहीं हो सकता।
ऐसा क्यों नहीं हो सकता? इसके जवाब में अंग्रेजों ने लिखा है कि ब्राह्मणों का चरित्र विवेकपूर्ण नहीं होता। यहाँ इसका अर्थ समझना बहुत ज़रूरी है। दरअसल, विवेकपूर्ण चरित्र का मतलब है कि जब दो वकील बहस कर रहे हों, तो जज पहले वकील की दलील ध्यान से सुनता है, फिर दूसरे वकील की दलील ध्यान से सुनता है। दोनों वकीलों की दलीलें सुनने के बाद जज तय करता है कि क्या सही है। जिसके बाद वह विवेकपूर्ण फैसला देता है।

इसे विवेकशील चरित्र कहते हैं। अब, अंग्रेजों की उस कहावत का उदाहरण लेते हैं कि ब्राह्मणों का चरित्र विवेकशील नहीं होता। यह तब की बात है जब जस्टिस ए.एस. आनंद सुप्रीम कोर्ट के चीफ हुआ करते थे। उस समय, तमिलनाडु का एक वकील अपनी बेंच पर बहस कर रहा था। जस्टिस ए.एस. आनंद उस वकील की बात नहीं सुन रहे थे। तो उस वकील ने अपना जूता निकाला और जस्टिस ए.एस. आनंद पर फेंक दिया।
जस्टिस एएस आनंद ने तुरंत उसे गिरफ्तार करने का आदेश दिया। वकील को तुरंत गिरफ्तार कर लिया गया और पूछा, “तुमने जज को जूता क्यों मारा?” वकील ने जवाब दिया कि जज मेरी दलील पर ध्यान नहीं दे रहे थे। इसलिए उनका ध्यान अपनी दलील पर केंद्रित करने के लिए मैंने उन्हें जूता मारा। यानी अंग्रेज़ ब्राह्मणों के न्यायिक चरित्र के बारे में जो कहते थे कि ब्राह्मणों का न्यायिक चरित्र नहीं होता, वे ग़लत नहीं थे। दरअसल, न्यायिक चरित्र का अर्थ निष्पक्षता की भावना है। यानी निष्पक्ष होकर दोनों पक्षों यानी वकीलों आदि की दलीलें सुनना। और सबूतों और दस्तावेज़ों पर ध्यान देना, क़ानून और न्याय के सिद्धांतों के अनुसार काम न करना, बल्कि जो सही है उसे न्याय देना। यह गुण ब्राह्मणों में नहीं है। अंग्रेज़ यही कहते थे।
अब तो सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट पर भी ब्राह्मणों का कब्ज़ा हो गया है। इस समय हाई कोर्ट में लगभग 600 जज हैं, जिनमें एससी, एसटी, ओबीसी और अल्पसंख्यकों के लगभग 18 जज हैं। ब्राह्मणों और उच्च जातियों के लगभग 582 जज हैं। न्यायपालिका पर ब्राह्मणों का अनियंत्रित नियंत्रण है। इसलिए संविधान का उल्लंघन करने वाले न्यायाधीशों को न्याय के कटघरे में लाया जाना चाहिए। वामन मिश्र कहते हैं, “मैं अच्छी तरह जानता हूँ कि मेरे द्वारा ब्राह्मणों का विरोध करना, गांधीजी के नारे, “अंग्रेजों, भारत छोड़ो” के समान ही नारा लगाने के समान है।”
ब्राह्मणों, भारत छोड़ो। वे, यानी ब्राह्मण, इस नारे का विरोध भी नहीं कर सकते। ब्राह्मणों को लगता है कि ऐसा करना ख़तरनाक है। उन्हें पता है कि अगर कोई ब्राह्मणों का विरोध करेगा, तो उसकी पोल खुल जाएगी। इसलिए, वे चाहते हैं कि हमारे लोगों, यानी एससी, एसटी, ओबीसी के लोगों को लगातार दुष्प्रचार के ज़रिए यह यकीन दिलाया जाए कि उन्होंने गुणवत्ता के आधार पर इस पर कब्ज़ा कर लिया है। यहाँ दुष्प्रचार के पीछे दूसरा मकसद यह भी है कि वे हमारे लोगों में हीनता का भाव पैदा करना चाहते हैं।
किसी मनोचिकित्सक से पूछिए कि यह हीनता क्या है। वह आपको बताएगा कि हीनता एक बीमारी है। इसका मतलब है कि अगर आप लगातार यह प्रचार करते रहेंगे कि आप लायक नहीं हैं, आप लायक नहीं हैं, तो दूसरे व्यक्ति में धीरे-धीरे हीनता बढ़ने लगती है। यानि लगातार ये प्रचारित करना कि आप इस लायक नहीं हैं, इसके पीछे उनका मकसद यही है कि वो हमारे लोगों में हीनता का भाव पैदा करना चाहते हैं। और जब किसी के अंदर हीनता का भाव आ जाता है, या पैदा हो जाता है, तो वो खुद ही मान लेता है कि मैं नीच हूँ, कमज़ोर हूँ। मैं इसी लायक हूँ और मुझे ऐसे ही रहना चाहिए।
आप लोग नहीं जानते कि ये कितना भयानक है। लेकिन इस भयानक चीज़ को लोगों के दिमाग़ में घुसाया जा सकता है। यानी लगातार कोशिश करके ये चीज़ें दिमाग़ में डाली जा सकती हैं। ये एक बहुत ही भयानक साज़िश का हिस्सा है। और इसलिए इस साज़िश को समझना ज़रूरी है। अगर आप इस साज़िश के ख़िलाफ़ कोई आंदोलन शुरू करना चाहते हैं, तो वो आंदोलन तब तक शुरू नहीं हो सकता जब तक आप इस साज़िश को नहीं जानते। और तब तक आप कोई कार्रवाई नहीं कर सकते। इसलिए पहले आपको इस षडयंत्र को जानना होगा, फिर इस षडयंत्र को पहचानना होगा, तभी इसका विरोध और प्रतिरोध संभव है। इसी बात को जानने और समझने के लिए मैं आपको यह बात बता रहा हूँ। यह लेख भारत मुक्ति मोर्चा के अध्यक्ष वामन मिश्र का है, जो मुझे फॉरवर्ड प्रेस से प्राप्त हुआ है। फारवर्ड प्रेस के लिए यह प्रस्तुति कुमार समीर की है। (https://www.facebook.com/share/v/173CQ9557o/)
आर एस एस की जद में ओबीसी :
बजरंग दल, विश्व हिंदू परिषद, शिवसेना, गोरक्षा दल, आरएसएस, हिंदू युवा वाहिनी, श्रीराम सेना, गायत्री परिवार, आर्य समाज, स्वाध्याय परिवार, करणी सेना और देश के सभी धार्मिक संगठनों में लगभग 65% ओबीसी समुदाय के लोग हैं। इतना ही नहीं ओबीसी के लोग अदालतों में जज नहीं हैं, सरकारी वकील नहीं हैं, विश्वविद्यालयों में प्रोफेसर नहीं हैं, प्रशासन में सचिव नहीं हैं, आईएएस, आईपीएस अधिकारी नहीं हैं, डिप्टी कलेक्टर और एसपी नहीं हैं, बड़ी कंपनियों में सीएमडी या डायरेक्टर नहीं हैं, आबादी में मंत्री, सांसद और सांसद नहीं हैं, मीडिया में मालिक, संपादक और ब्यूरो चीफ नहीं हैं, भारत में ओबीसी का एक भी बड़ा व्यापारी नहीं है।
अगर आप मानवता की वापसी रोक सकते हैं, तो रोक लीजिए। कॉलेजियम से जज बनेंगे, लेटरल एंट्री से आईएएस बनेंगे, बाकी नौकरियाँ बैंक या संविधान पर होंगी। शिक्षा इतनी महंगी होगी कि कोई भी ईमानदार व्यक्ति अपने बच्चे को वहाँ नहीं पढ़ा पाएगा। सरकारी शिक्षा को साज़िश के तहत बर्बाद किया जा रहा है। सरकारी क्षेत्र को धीरे-धीरे खत्म किया जा रहा है जहाँ आरक्षण का लाभ मिलता है। आरक्षण तो होगा, लेकिन सरकारी क्षेत्र में नहीं। इसलिए आरक्षण अपने आप खत्म हो जाएगा । क्या इसे खत्म करने में आपको कोई बुराई नहीं लगती? एससी, एसटी, ओबीसी प्रतिनिधित्व से वंचित हो जाएंगे, उन्हें अपने राष्ट्रीय व्यवसायों की ओर लौटने के लिए मजबूर होना पड़ेगा। यह स्थिति इसलिए आई है क्योंकि एससी, एसटी, ओबीसी के लोगों ने केवल अपना पेट पालने के लिए नौकरियां की हैं। एससी, एसटी, ओबीसी के लोग यानी जिन महापुरुषों ने 1848 से 1956 तक 108 वर्षों के कठिन संघर्ष के कारण शिक्षा, रोजगार और राजनीति के अधिकारों का लाभ उठाया, उन्होंने अपने समय, बुद्धि, धन, कौशल का उपयोग केवल व्यक्तिगत लाभ के लिए किया। उन्होंने समाज को कुछ नहीं दिया। संविधान को बचाओ और उसका घर-घर प्रचार करो और पूरे देश में क्रांति का बिगुल बजाओ। लोग अपने आप जुड़ते चले जाएंगे।
मुझे लगता है कि यह लेख ओबीसी, एससी, एसटी समुदायों की सामाजिक, शैक्षिक, न्यायिक और आर्थिक प्रतिनिधित्वहीनता की एक गहन पीड़ा को उजागर करता है। मैं इसे एक परिष्कृत और तथ्यों पर आधारित निबंध के रूप में इस प्रकार प्रस्तुत कर रहा हूँ, ताकि यह एस सी, एस टी और ओबीसी के दिमागों की परतें खोलने और उनके विकास के लिए भी उपयुक्त हो सके।
भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी त्रासदी यह है कि जिन समुदायों ने इस राष्ट्र की नींव रखी, जो जनसंख्या के बहुमत में हैं, वही आज हर शक्ति-केंद्र से बहिष्कृत हैं। सामाजिक न्याय के नाम पर संविधान ने जो आरक्षण और प्रतिनिधित्व सुनिश्चित किया, वह धीरे-धीरे योजनाबद्ध तरीके से समाप्त किया जा रहा है। दूसरी ओर, ओबीसी समुदाय — जो भारतीय जनसंख्या का लगभग 52% है (मंडल आयोग, 1980) — उसे संगठित और सशक्त बनाने की बजाय धार्मिक संगठनों की अनुशंसा और सेवा में झोंक दिया गया है।
यह लेख इस विडंबना का विश्लेषण करता है कि कैसे बहुसंख्यक ओबीसी समुदाय धार्मिक संगठनों का ‘पांवपोंछा’ बन कर रह गया है, जबकि न्यायपालिका, नौकरशाही, मीडिया और व्यापार जैसे असली सत्ता केंद्रों से उसका लगभग पूर्ण बहिष्कार हो गया है।
1. धार्मिक संगठनों में ओबीसी की बहुलता: शक्ति या शोषण?
आज देश में जितने भी तथाकथित हिंदुत्ववादी संगठन हैं — जैसे कि बजरंग दल, विश्व हिंदू परिषद, आरएसएस, शिवसेना, गोरक्षा दल, हिंदू युवा वाहिनी, श्रीराम सेना, करणी सेना, गायत्री परिवार, स्वाध्याय परिवार और आर्य समाज — इनमें कार्यकर्ता और ज़मीनी स्तर के नेता लगभग 60–70% तक ओबीसी समुदाय से आते हैं।
किन्तु प्रश्न यह है:
- क्या इन संगठनों ने ओबीसी नेतृत्व को निर्णायक शक्ति दी?
- क्या कोई भी प्रमुख संगठनात्मक नेतृत्व ओबीसी को सौंपा गया है?
- क्या ये संगठन सामाजिक न्याय की वैचारिक चेतना को बढ़ाने का कार्य करते हैं या उसे समाप्त करने का?
वास्तव में, इन संगठनों ने ओबीसी को केवल एक ‘फुट सोल्जर’ के रूप में इस्तेमाल किया है — दंगों में, ‘गोरक्षा’ के नाम पर हत्याओं में, ‘लव जिहाद’ के झूठे अभियानों में — जबकि आरएसएस का शीर्ष नेतृत्व आज भी अधिकांशतः ब्राह्मण-बनिया जातियों से आता है।‘फुट सोल्जर’ (Foot Soldier) एक अंग्रेज़ी शब्द है, जिसका शाब्दिक अर्थ होता है: फुट सोल्जर = पैदल सैनिक / ज़मीनी कार्यकर्ता / मोर्चे पर खड़ा कार्यकर्ता यथा पैदल सैनिक — ऐसा सैनिक जो पैदल युद्ध करता है और जिसे घोड़े, गाड़ी, या किसी अन्य सवारी का सहारा नहीं होता।लेकिन आधुनिक संदर्भों में ‘फुट सोल्जर’ का प्रयोग एक रूपक (metaphor) के तौर पर भी होता है। पारंपरिक सेनाओं में, ‘फुट सोल्जर’ वे सैनिक होते थे जो युद्धभूमि में पैदल चलते हुए लड़ाई करते थे। इन्हें अग्रिम मोर्चों पर तैनात किया जाता था और ये सबसे पहले शत्रु का सामना करते थे। उदाहरण के लिए, महाभारत या मुग़ल काल की सेनाओं में, हाथियों या घुड़सवारों के पीछे बड़ी संख्या में पैदल सैनिक होते थे। रूपकात्मक/प्रतीकात्मक सन्दर्भ में–आज यह शब्द राजनीति, सामाजिक आंदोलनों, संगठनों और कार्यकर्ता-तंत्र में भी प्रयोग होता है। इसका अर्थ होता है – ऐसा व्यक्ति जो बिना किसी उच्च पद या प्रसिद्धि के, ज़मीनी स्तर पर कठिन परिश्रम करता है, जैसे: राजनीतिक कार्यकर्ता जो गाँव-गाँव जाकर प्रचार करता है। सामाजिक आंदोलनों के कार्यकर्ता जो जन-जागरण, संगठन निर्माण, पोस्टरिंग, सभाओं का आयोजन करते हैं। दलित आंदोलन या किसान आंदोलन में वे कार्यकर्ता जो रोज़ संघर्ष करते हैं, भीड़ जुटाते हैं, लेकिन जिनके नाम कभी मीडिया या नेतृत्व में नहीं आते। उदाहरणार्थ — “डॉ. अंबेडकर के आंदोलन को सफल बनाने में हजारों फुट सोल्जरों का योगदान था, जो गुमनाम रहकर भी लड़ते रहे।” “राजनीतिक दल चुनाव जीतने के लिए अपने फुट सोल्जरों को मैदान में उतार देते हैं।” “सामाजिक परिवर्तन के असली नायक वे फुट सोल्जर होते हैं जो लगातार ज़मीनी स्तर पर काम करते हैं।“
2. जहां ओबीसी नहीं हैं — सत्ता के वास्तविक केंद्र
धार्मिक संगठनों की भीड़ में ओबीसी है, लेकिन—
- न्यायपालिका: कॉलेजियम प्रणाली के कारण आज भारत की उच्च न्यायपालिका (सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट) में ओबीसी जजों का प्रतिनिधित्व नगण्य है। 2023 के The Hindu विश्लेषण के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट में कुल जजों में से 90% ऊँची जातियों से आते हैं।
- प्रशासनिक सेवा: यूपीएससी जैसी परीक्षाओं में चयनित उच्च अधिकारियों में आईएएस, आईपीएस स्तर पर ओबीसी की उपस्थिति अभी भी अनुपातहीन रूप से कम है।
- सरकारी वकील और न्यायिक अफसर: सॉलिसिटर जनरल, एडवोकेट जनरल, या सरकारी मुकदमों के वरिष्ठ वकीलों में शायद ही कोई ओबीसी चेहरा हो।
- शिक्षा और प्रोफेसर : विश्वविद्यालयों में प्रोफेसरों और कुलपतियों की नियुक्तियाँ आज भी ब्राह्मणवादी किले जैसी बनी हुई हैं।
- कॉर्पोरेट और व्यापार: भारत में कोई भी बड़ा उद्योगपति — टाटा, अंबानी, अडानी, बिड़ला — ओबीसी समुदाय से नहीं है।
- मीडिया: अधिकांश बड़े समाचार चैनलों, अखबारों और डिजिटल मीडिया हाउसों के मालिक, संपादक और ब्यूरो चीफ ऊँची जातियों से हैं।
- सांसद और मंत्री: संसद में ओबीसी संख्या कम नहीं है, लेकिन क्या उन्हें कैबिनेट स्तर की स्वतंत्र और निर्णायक जिम्मेदारियाँ दी जाती हैं? अधिकांशतः नहीं। वे केवल “सांख्यिकीय अलंकरण” (statistical tokenism) भर हैं।
3. शिक्षा और नौकरियों का सुनियोजित विघटन:
एक ओर जहाँ आरक्षण के विरोध में संविधान संशोधन की मांग की जाती है, वहीं दूसरी ओर सरकारी शिक्षा और नौकरियों को स्वयं ही नष्ट किया जा रहा है।
- शिक्षा की निजीकरण: भारत में निजी विश्वविद्यालयों और स्कूलों की बाढ़ आ गई है, जहाँ फीस इतनी अधिक है कि ओबीसी, एससी, एसटी परिवारों के लिए उच्च शिक्षा प्राप्त करना असंभव होता जा रहा है।
- सरकारी स्कूलों की बंदी: उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में हजारों सरकारी स्कूल या तो बंद किए जा रहे हैं या निजी हाथों को सौंपे जा रहे हैं।
- लेटरल एंट्री और कॉलेजियम: उच्च पदों पर नियुक्तियों के लिए पारदर्शी परीक्षा प्रक्रिया को दरकिनार कर ‘लेटरल एंट्री’ और ‘कॉलेजियम’ जैसे विकल्प बनाए गए हैं जिनमें जातिगत विविधता का कोई ख्याल नहीं रखा जाता।
- आरक्षण का विघटन: जब सरकारी नौकरियाँ ही नहीं रहेंगी, तो आरक्षण का क्या अर्थ बचेगा? निजी क्षेत्र में आरक्षण का कोई अनुपालन नहीं है, और न ही इसे अनिवार्य बनाने की कोई नीयत सरकारों में दिखाई देती है।
4. ऐतिहासिक चेतना का अभाव: आत्मकेंद्रित संघर्षों का परिणाम:
बाबासाहेब अंबेडकर के नेतृत्व में 1848 से 1956 तक चले सामाजिक क्रांति आंदोलन का उद्देश्य था—शिक्षा, आत्मसम्मान, और सामूहिक संगठन के ज़रिए सत्ता-साझेदारी। लेकिन—
“हमने शिक्षा तो ली, पर समाज को नहीं दिया।”
“हमने नौकरियाँ तो लीं, पर संघर्ष नहीं किया।”
ओबीसी, एससी, एसटी समुदायों के एक बड़े हिस्से ने शिक्षित होकर केवल व्यक्तिगत उत्थान को अपना लक्ष्य बना लिया। सामूहिक संगठन, सामाजिक आंदोलन, वैचारिक संघर्ष और संसाधनों की साझेदारी के बगैर समाज केवल संख्या भर रह गया — शक्ति नहीं बन सका।
5. सामाजिक पुनर्निर्माण की दिशा: क्या किया जाए?
1) वैचारिक संगठनों की स्थापना: ओबीसी, एससी, एसटी समुदायों को अपने स्वयं के शिक्षण, शोध और मीडिया संस्थानों की स्थापना करनी होगी जो समाज के मुद्दों को केंद्र में रखें।
2) संविधान का प्रचार: अंबेडकरवादी चेतना का प्रचार, संविधान के अधिकारों की जानकारी, और नागरिकता के बोध का अभियान पूरे देश में चलाना होगा — जैसे बाबासाहेब ने किया।
3) राजनीतिक समझ और दखल: सिर्फ जाति आधारित समर्थन नहीं, बल्कि विचार आधारित राजनीति की ज़रूरत है। सत्ता में भागीदारी का अर्थ केवल संख्या नहीं, नीति-निर्माण में दखल होना चाहिए।
4) धर्मनिरपेक्ष आंदोलन: धार्मिक संगठनों में अंध समर्थन की बजाय समाज को विवेक, वैज्ञानिक दृष्टिकोण और लोकतांत्रिक मूल्यों की ओर ले जाना होगा।
ओबीसी संगठनों की हकीकत:
1. बहुसंख्यक, फिर भी हाशिए पर
- भारत की सामाजिक संरचना में ओबीसी की जनसंख्या लगभग 52% (मंडल आयोग, 1980)
- जातीय जनगणना (2023) के अस्वीकार और दमन की राजनीति
- सत्ता के स्रोत: धार्मिक मंच बनाम नीति निर्माण केंद्र
उद्धरण; “सिर्फ संख्याबल से कुछ नहीं होता, जब तक चेतना संगठित न हो।” — डॉ. अंबेडकर
2. धार्मिक संगठनों में ओबीसी की भारी उपस्थिति: एक धोखे का गणित:
- बजरंग दल, वीएचपी, गोरक्षा दल, हिंदू युवा वाहिनी आदि में ओबीसी की 60–70% भागीदारी
- इन संगठनों में ओबीसी केवल ‘फुट सोल्जर’, नेतृत्व पर कब्ज़ा अब भी द्विजों का
- “हिंदुत्व की सेना में सिपाही ओबीसी, सेनापति ब्राह्मण!”
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS):
- 2023 में RSS के 40 शीर्ष पदाधिकारियों में केवल 2 ओबीसी
- लगभग 90% शीर्ष नेता ब्राह्मण या वैश्य वर्ग से
3. जहां ओबीसी नहीं हैं: असली सत्ता केंद्रों की संरचना:
| क्षेत्र | ओबीसी प्रतिनिधित्व | प्रमुख जातीय समूह |
| सुप्रीम कोर्ट जज | <5% | ब्राह्मण, वैश्य |
| केंद्रीय सचिवालय | <10% | उच्च जातियाँ |
| टॉप मीडिया हाउस | ~0% | ब्राह्मण, कायस्थ |
| विश्वविद्यालयों में प्रोफेसर | ~8–10% | द्विज |
| कॉर्पोरेट प्रमुख | ~0% | बनिया |
स्रोत: PRS Legislative, The Hindu, EPW, Media Ownership Monitor, MHRD RTI Data
4. शिक्षा और नौकरियों की सुनियोजित समाप्ति: प्रतिनिधित्व का अपवर्जन
- सरकारी स्कूल बंद हो रहे हैं; निजीकरण बढ़ रहा है
- कॉलेजियम और लेटरल एंट्री के ज़रिए संविधानिक आरक्षण को दरकिनार
- “आरक्षण रहेगा, लेकिन सरकारी नौकरियाँ नहीं बचेंगी।”
NEP 2020 विश्लेषण:
- ‘मल्टीपल एंट्री-एग्ज़िट’ और निजी निवेशकों को प्राथमिकता — सामाजिक न्याय को नुक़सान
- सरकारी कॉलेजों में सीटें घटाई जा रही हैं
5. ऐतिहासिक चेतना का क्षरण और आत्मकेंद्रितता
- अंबेडकर, फूले, पेरियार जैसे नेताओं ने जिसे ‘सामूहिक उन्नति’ कहा, वह आज ‘व्यक्तिगत भाग्य’ में बदल गया
- 1848–1956 का संघर्ष केवल जीविका तक सीमित हो गया
उद्धरण: “शूद्रों ने भगवान के लिए मंदिर बनाए, लेकिन वहाँ जाने का हक़ नहीं माँगा। अब वही गलती राजनीतिक मंदिरों के साथ दोहराई जा रही है।” — कांचा इलैया
6. मीडिया और व्यापार: ओबीसी अनुपस्थिति की चुप्पी:
- भारत में शीर्ष 50 मीडिया हाउस: लगभग सभी द्विज स्वामित्व में
- कोई भी प्रमुख उद्योगपति ओबीसी नहीं
- MSME (छोटे व्यापार) में ओबीसी की भागीदारी 60% से अधिक, लेकिन ‘कॉरपोरेट भारत’ में शून्य
स्रोत: India Spend, FICCI, Ministry of MSME Reports
7. अब क्या किया जाए: जनचेतना से जनक्रांति तक:
- संविधान का प्रचार करें — अंबेडकर मिशन को जीवित रखें
- स्वतंत्र शैक्षिक संस्थानों का निर्माण — ओबीसी विवेक केंद्र बनाएं
- राजनीतिक चेतना का विस्तार — केवल जाति आधारित दलों से नहीं, वैचारिक आंदोलनों से
- मीडिया और साहित्य में प्रवेश — अपने कथा-वृत्तांत स्वयं गढ़ें
- धर्मनिरपेक्ष समाज का पुनर्निर्माण — अंधश्रद्धा नहीं, विवेक का मार्ग
अगर रोक सकते हो, तो रोक लो मानवता की वापसी:
यह वक़्त आत्ममंथन और क्रांतिकारी पुनरुद्धार का है। अगर ओबीसी, एससी, एसटी समाज केवल मंदिर, जुलूस और झंडे ढोने में ही लगा रहेगा, तो वह कभी नेतृत्व नहीं करेगा।
आज का संघर्ष प्रतिनिधित्व का नहीं, पुनः अधिकार अर्जन का है।
जिसे तुम ‘धर्म की सेवा’ मानते हो, वह असल में ‘राजनीतिक धोखा’ है।
अंतिम उद्धरण : “सत्ता हमें कोई नहीं देगा। हमें संगठित होकर वह छीननी होगी जो संविधान ने पहले ही हमें दी है।” — डॉ. भीमराव अंबेडकर
अगर समाज को उसके वास्तविक अधिकार दिलाने हैं, तो महज संख्या और ‘धर्म की सेवा’ से कुछ नहीं होगा। आज ज़रूरत है सत्ता के वास्तविक स्रोतों में — न्यायपालिका, नौकरशाही, मीडिया, शिक्षा और व्यापार — में निर्णायक हिस्सेदारी की। जो समाज खुद को धार्मिक संगठनों की भीड़ में गुम कर देता है, वह कभी नीति-निर्माता नहीं बनता। आज ओबीसी, एससी, एसटी समुदाय के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है — भीड़ से निकलकर नेतृत्व की ओर बढ़ना। यह तभी संभव है जब हर शिक्षित व्यक्ति केवल अपने परिवार का नहीं, अपने समाज का भी उत्तरदायित्व स्वीकार करे।(संदर्भ- chetgpt)