अग्नि आलोक

*भगवा ब्रिगेड की मालेगांव जीत के फैसले से कांग्रेस सरकार को घेरने की कवायद* 

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 -सुसंस्कृति परिहार 

पिछले 17 साल से चर्चा में रहे साल 2008 के मालेगांव बम ब्लास्ट मामले  में आख़िरकार फ़ैसला आ गया है जब मई  में इस फैसले को सुरक्षित रखा गया था तब ये चर्चा चारों ओर गूंज रही थीं कि अब प्रज्ञा सिंह कथित साध्वी और कर्नल पुरोहित की खैर नहीं। फैसले का इंतजार बेसब्री से किया जा रहा था। वह 31जुलाई को आया जिसे काफी विवादास्पद माना गया।लगता है जज लोहड़ी भी सरकार के झांसे में आ गए।

मुंबई की विशेष एनआईए अदालत ने इस मामले में अभियुक्त रहीं बीजेपी की पूर्व सांसद साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर समेत सात लोगों को बरी कर दिया है।विशेष अदालत के न्यायाधीश एके लाहोटी ने सभी अभियुक्तों को निर्दोष करार देते हुए कहा, “यह एक अत्यंत गंभीर मामला है जिसमें आम नागरिकों की जान गई लेकिन अभियोजन पक्ष आरोप साबित करने के लिए निर्णायक सबूत पेश नहीं कर पाया.”न्यायाधीश लाहोटी ने कहा, “केवल शक के आधार पर आरोप सिद्ध नहीं किए जा सकते.”

मालेगांव ब्लास्ट केस के आरोपी सुधाकर धर द्विवेदी के वकील रंजीत सांगले ने फैसला आने के पूर्व  यह कह दिया था कहा, कि”17 साल की लंबी देरी के बाद, 323 गवाहों के बयानों, 40 गवाहों के मुकरने, 40 महत्वपूर्ण गवाहों के बयान रद्द होने और 40 अन्य गवाहों की जान जाने के बाद, आज न्याय होगा। अदालत न्याय करेगी। हमारे खिलाफ कोई सबूत नहीं था। सभी आरोपी बरी हो जाएंगे।”इस मामले में जमीयत उलेमा-ए-हिंद की ओर से पैरवी कर रहीं अधिवक्ता इरफाना हमदानी ने कोर्ट के फैसले के पहले भी प्रतिक्रिया दी थी उन्होंने कहा कि आज 17 साल बाद मालेगांव ब्लास्ट का फैसला आ रहा है। इस केस में अभियोजन पक्ष को बहुत सी चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है, लेकिन जो इलेक्ट्रॉनिक सबूत, टेलीफोनिक बातचीत, लैपटॉप से मीटिंग्स की जानकारी और कॉल डिटेल्स हैं, वे इस मामले में काफी अहम साबित हो सकते हैं. उन्होंने कहा कि मकोका के तहत दर्ज इकबालिया बयानों, एफएसएल रिपोर्ट और इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों के आधार पर अदालत को निष्पक्ष और सख्त निर्णय देना चाहिए।

इससे सारा मामला समझा जा सकता है।निर्णायक सबूत पेश नहीं हो पाए। इसीलिए आरोपी बरी किए गए।सवाल ये उठता है तो इतने साल इन लोगों को क्यों परेशान किया गया। पेंडिंग रखने वालों पर कार्रवाई सुनिश्चित हो।

समझा जा रहा है कि ATS के एक भूतपूर्व इंस्पेक्टर  को  RSS के हिंसक  षडयंत्र को छिपाने के लिए प्रायोजित रूप से बुलवाया जा रहा है।ये मुस्लिम अल्पसंख्यक है इसीलिए दुनिया के सबसे बड़े और सबसे पुराने फासीवादी संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पक्ष में इसका झूठा बयान ,फ़ासिस्टों के लिए बहुत फायदेमंद  है।अगर फासिस्ट संघ परिवार का हाथ मालेगांव, जामा मस्जिद,समझौता एक्सप्रेस की आतंकवादी घटनाओं में नहीं था,तो फिर किसका हाथ था ? महाराष्ट्र ATS प्रमुख हेमंत करकरे ने सारे सबूतों के साथ प्रज्ञा ठाकुर,कर्नल पुरोहित आदि को गिरफ्तार किया था।क्या वो सब झूठ था?जानकार लोग जानते हैं कि 1937 में ग्वालियर के सिंधिया महाराज के द्वारा दी गई जमीन पर नासिक में RSS ने भोंसला मिलिट्री अकादमी के माध्यम से हिन्दू आतंकवादी सेना के प्रशिक्षण की शुरुआत की थी।इस अकादमी का उद्घाटन बॉम्बे  प्रांत के ब्रिटिश गवर्नर ने किया था।जिसकी परिणति थी गांधीजी की हत्या से लेकर 2008 में मालेगांव विस्फोट तक असंख्य आतंकी घटनाएं,जिनमें सैकड़ों लोग मारे गए और मारे जा रहे हैं।

इस फैसले में पहली बार बरी लोगों को जमीन और एक मुश्त राशि देने का निर्णय भी अभूतपूर्व है।ऐसा मुआवजा जेलों में अनेकों साल बंद और बरी हुए निरापराधियों को  भी मिलना चाहिए।

हालात बता रहे हैं कि संघ से दूरी बढ़ने पर भाजपा सरकार अब भगवा ब्रिगेड के सहारे देश में एक बार फिर माहौल बनाने आतुर है।अभी  ऐसे कथित  भगवा आतंकियों से दूरी थी उसे इस फैसले से पाटा जाएगा। इसलिए देश भर की सभी साधु संत मंडलियों में  इस फैसले के बाद जश्न मनाने के समाचार मिल रहे हैं। मालेगांव में तो इस खुशी में संघी बजरंगी इतने मस्त हो गए कि उन्होंने पुलिस की ही पिटाई कर दी।

आश्चर्यजनक तो यह है कि भाजपा नेता और संत ये गर्व से कह रहे हैं कि कोई हिन्दू ऐसा कृत्य कभी नहीं कर सकता ।जबकि गोधराकांड , अयोध्या कांड, दिल्ली दंगा ,माबलिंचिंग, लव-जिहाद और अभी अभी कांवड़ियों के भगवा आतंक को हमने साफ़ साफ़ देखा और अनुभूत किया है। बहरहाल इस फैसले का इस तरह आना एक बार फिर कथित अदालत को शकोसुबह के दायरे में खड़ा करता है।

भाजपा मालेगांव ब्लास्ट के फैसले से एक तीर से दो निशाने साधने में  लग गई है।पहला तो यह कि देश में साधु-संतों के समाज में यह संदेश पहुंचा है कि वे सरकार के संरक्षण में हैं उन पर आंच नहीं आने दी जाएगी चाहे वे औरतों पर अपमान जनक टिप्पणी करें या उनकी तस्करी वा कोई मालेगांव जैसा जघन्यतम अपराध।वैसे भी आसाराम बापू, राम-रहीम और बाबा रामदेव, धीरेन्द्र शास्त्री, रामभद्राचार्य जी जैसे लोग सरकारी संरक्षण में नज़र आते ही है।उनकी धारणा है कि यही वो समाज है जो देश की जनता को सबसे ज्यादा सम्मोहित करने में दक्ष है। भाजपा को ये चुनावी  वैतरणी पार कराने वाले लोग हैं।वे खुश होंगे तो भाजपा का भला होगा ही।

दूसरी बात ये कि इस फैसले से यह संदेश लोगों में भेजा जाएगा कि कांग्रेस सरकार ने हमारे भगवाधारियों को जबरन आरोपी बनाकर हिंदू समाज के विरोध में काम किया है।ये हिंदू विरोधी है वगैरह-वगैरह।

कुल मिलाकर यह फैसला जानबूझकर इस तरह सुनाया हुआ लगता है जिसने पिछले तमाम सबूतों को नष्ट कर इसे नया स्वरूप दिया है मुझे याद आता है जब प्रज्ञा सिंह  की बाईक की चर्चा आई थी तो उन्होंने बताया था कि वह गाड़ी संन्यास लेने के बाद जिस व्यक्ति को दी थी।वह आजतक मिला नहीं है।जबकि एक पुलिस सिपाही का कहना है उसे मार डाला गया है।अदालत फिर भी कह रही है कि यह सिद्ध नहीं हुआ कि उस गाड़ी का मालिक कौन था। कहने का आशय यह है कि सब गोलमाल है भई सब गोलमाल है। हालांकि यह मामला भी बाम्बे ब्लास्ट के रिहा अपराधियों की तरह आगे जाएगा। लेकिन न्याय में विलंब का फायदा तब तक वर्तमान सरकार ले चुकी होगी और कांग्रेस आरोपी की तरह चुनाव में मुखातिब होगी।बाकी पब्लिक है जो सब जानती है।

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