अग्नि आलोक

*लोहिया मानते थे कि अगर देश को ऊपर उठाना है तो वह नीचे से ही उठेगा*

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 शिवानन्द तिवारी 

कभी-कभार मैं भी रील्स देखता हूँ. हालाँकि बचने की कोशिश करता हूँ.  कल अचानक एक रील पर नज़र पड़ी. एक युवा लड़की की रील थी. सुंदर लड़की. सवालों का जवाब दे रही थी. बग़ैर किसी झिझक के. भाषा भी शुद्ध और सुंदर. कितना बदल रहा है समाज ! वह लड़की भागवती देवी की नतिनी थी. समता की बेटी. भगवती देवी डॉक्टर लोहिया की खोज थी. पत्थर तोड़ने वाली महिला. 

किसी बात पर वह काम कराने वाले मुंशी से बहस कर रही थी. संयोग था कि उस समय डाक्टर साहब की गाड़ी शेरघाटी के उसी मोड़ पर रूकी हुई थी. उन्होंने उस पत्थर तोड़ने वाली महिला में ‘तेज’ देखा. अपने अधिकारों को समझने और उसके लिए लड़ने वाली महिला का तेजस्वी रूप. 

देश की राजनीति में लोहिया एक अनूठे व्यक्ति थे. वे मानते थे कि अगर देश को ऊपर उठाना है तो वह नीचे से ही उठेगा. हमारी समाज व्यवस्था का ऊपरी सतह इस कदर जम गया है कि वह समाज को ऊपर उठने ही नहीं देता है. इसलिए इसको नीचे से ही उठाना होगा. 

डॉक्टर लोहिया की इस नीति ने देश को झकझोर दिया. याद कीजिए. 1962 के चुनाव में उन्होंने ग्वालियर की महारानी के ख़िलाफ़ सुक्खो रानी नाम की मेहतरानी को चुनाव लड़वा दिया था. उनके इस फ़ैसले ने देश को चौंका दिया था. उनके लिए वह चुनाव मात्र औपचारिक नहीं था. सुक्खो रानी के समर्थन में उन्होंने गंभीरता से चुनाव अभियान चलाया था. 

उसी कड़ी में भागवती देवी भी थीं जिनको लोग भगवतिया कह कर पुकारते थे. डॉ लोहिया की ही प्रेरणा से भागवती देवी को 1969 के चुनाव में संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी ने बाराचट्टी विधानसभा क्षेत्र से उम्मीदवार बनाया था और वे विधायक बनी थीं. 1996 में जनता दल के उम्मीदवार के रूप में गया संसदीय क्षेत्र से लोकसभा में पहुँची थीं. 

भागवती जी की बेटी समता भी राजद से ही बाराचट्टी की दो मर्तबा विधायक चुनी गई थी. जिस रील के विषय में मैंने उपर लिखा था वह समता की बेटी यानी भागवती देवी की नतिनी की थी. उसकी भाषा, बात में स्पष्टता और उसकी सलाहियत देखकर मन प्रसन्न हो गया. मैंने उसी समय समता को फोन किया. 

समाज बदल रहा है. लेकिन अपनी गति से. शायद हर पीढ़ी में बदलाव की आकांक्षा रखने वाले जिस गति से बदलाव चाहते हैं उस गति से बदलाव नहीं होता है. लेकिन स्पष्ट है कि हमारा समाज बदल रहा है. हर क्षेत्र में बदलाव हो रहा है. हर तरह की परीक्षाओं में मेहनत मजदूरी करने वालों के बेटे और बेटियां ऊपर के दस स्थानों में ज़रूर नजर आते हैं. खेलों में भी यह बदलाव दिखाई दे रहा है. क्रिकेट एक जमाने में ख़ास तबके के लोगों का खेल माना जाता था. लेकिन आज उसका भी चरित्र बदल गया है. टेलीविजन के नाच गाने के कार्यक्रम में उनको देखिए ! जिसमें जो प्रतिभा है उसको माँज रहा है. अपनी हालत से बाहर निकलने की उनके अंदर बेचैनी है. इसी के ज़रिए वह अपनी हालत से बाहर निकलना चाहता है.

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