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*“शिक्षा दुर्दशा” में अभी भी कुछ बाकी है क्या!* 

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 -प्रियांशु कुमार 

कभी दिल्ली यूनिवर्सिटी, बॉम्बे यूनिवर्सिटी, पटना यूनिवर्सिटी और जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) जैसी संस्थाएं केवल डिग्री नहीं देती थीं  वे विचार देती थीं, दिशा देती थीं और देश को जगाने का कार्य करती थीं। उन विश्वविद्यालयों के क्लासरूम केवल ज्ञान अर्जन के केंद्र नहीं थे, बल्कि सामाजिक और राजनीतिक बदलाव के अड्डे हुआ करते थे। हर विश्वविद्यालय की अपनी आत्मा, अपनी संस्कृति और एक वैचारिक पहचान होती थी। लेकिन आज यह विविधता और स्वतंत्रता एकरूपता में बदल दी गई है। हर संस्थान को एक ही ढांचे में ढाला जा रहा है, पाठ्यक्रम वही, सोच वही, पद्धति वही। सिर्फ नाम और इमारतें अलग हैं, लेकिन शिक्षा का मूल उद्देश्य धीरे-धीरे विलीन होता जा रहा है।

इसका परिणाम स्पष्ट है। 2025 की क्यूएस   वर्ल्ड यूनिवर्सिटी रैंकिंग में भारत की एक भी यूनिवर्सिटी शीर्ष 100 में शामिल नहीं है। जबकि टॉप 10 में शामिल हैं ।  एम आई टी , स्टैनफोर्ड, ऑक्सफोर्ड, हार्वर्ड, कैम्ब्रिज, इंपीरियल कॉलेज लंदन और स्विट्ज़रलैंड का ईटीएच ज्यूरिख। ये वो संस्थान हैं जहाँ सरकारें शिक्षकों और छात्रों की सोच को नियंत्रित नहीं करतीं, बल्कि उन्हें संभालती हैं, उन्हें प्रोत्साहित करती हैं। वहीं भारत में, विश्वविद्यालयों में अब विषयों से ज़्यादा यूजीसी के सर्कुलर पढ़े जाते हैं। स्वतंत्र शोध और विचार-प्रकाशन की जगह अब निर्देशों और मंजूरियों ने ले ली है। यह विडंबना ही है कि जिस सेंट्रल विस्टा परियोजना के पुनर्विकास पर ₹20,000 करोड़ से अधिक का बजट स्वीकृत है, जो मूलतः ब्रिटिश शासनकाल के दौरान एडविन लुटियंस और हर्बर्ट बेकर द्वारा डिज़ाइन किया गया था, वह इलाका आज सत्ता का प्रतीक है। मगर सवाल यह है कि क्या हम केवल इमारतों की भव्यता से देश को आधुनिक बना सकते हैं, या फिर हमें देश की सोच, विचार और शिक्षा को भी उतना ही समृद्ध और स्वतंत्र बनाना होगा?  दूसरी ओर, विश्वविद्यालय अनुदान आयोग  जो देश की उच्च शिक्षा की रीढ़ है,

उसका बजट वर्ष 2023-24 में मात्र ₹5,360 करोड़ रहा। यह वही संस्था है जो देशभर के विश्वविद्यालयों को मान्यता देती है, पाठ्यक्रमों का समन्वय करती है और उच्च शिक्षा के मानकों को निर्धारित करती है। इसकी स्थापना यूजीसी अधिनियम, 1956 के तहत हुई थी और इसका मुख्यालय दिल्ली में है, जबकि छह क्षेत्रीय केंद्र पुणे, भोपाल, कोलकाता, हैदराबाद, गुवाहाटी और बेंगलुरु में कार्यरत हैं। लेकिन अफसोस की बात यह है कि जिन विश्वविद्यालयों को विचारों की प्रयोगशाला होना चाहिए था, वे अब केवल “निर्देश पालन कार्यालय” बनकर रह गए हैं। न तो प्रोफेसरों को स्वतंत्रता है कि वे अपने ढंग से शोध कर सकें, और न ही छात्रों को वह वातावरण मिल रहा है जिसमें वे स्वतंत्र रूप से सोच सकें, सवाल उठा सकें, या नई दिशा खोज सकें। आज विश्वविद्यालयों में सबसे बड़ा डर यह नहीं है कि छात्र कुछ गलत कह देंगे, बल्कि यह है कि कहीं वे कुछ पूछ न लें। हम अक्सर पूछते हैं – “हमारी यूनिवर्सिटी दुनिया की टॉप रैंकिंग में क्यों नहीं हैं?” लेकिन शायद असली सवाल यह है कि  क्या हम वाकई टॉप पर पहुंचना भी चाहते हैं? या फिर हम अब उस स्थिति में आ चुके हैं, जहाँ रैंकिंग को भी राष्ट्रविरोधी मान लिया जाता है। तो सवाल यही है,  क्या हमें स्वतंत्र सोच चाहिए या सिर्फ सरकारी स्वीकृति? क्या हमें ज्ञान का विस्तार चाहिए या केवल मंत्रालय की मंज़ूरी? क्या हमें वास्तव में विश्वविद्यालय चाहिए या केवल आदेश पालन केंद्र।

लेखक: महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा के स्नातक के छात्र हैं।

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