अग्नि आलोक

*आरएसएस:तारीफ और तोहमतों के 100 साल*

Share

मुस्ताअली बोहरा

साल 2025 में विजयादशमी पर आरएसएस शतायु हो रहा है। इन 100 सालों में संघ की प्रार्थना की भाषा से लेकर गणवेश और तिरंगे से लेकर इस्लाम तक संघ की सोच में बदलाव आया है। जब 1925 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की यात्रा का शुभारंभ हुआ, तब संघ की गणवेश खाकी निकर, खाकी कमीज, बूट, दंड, खाकी टोपी हुआ करती थी। गुजरते वक्त के साथ संघ की सोच ही नहीं बदली बल्कि संगठनात्मक विस्तार और गणवेश में भी बदलाव आया। खाकी कमीज की जगह सफेद कमीज, खाकी टोपी की जगह काली टोपी, बूट की जगह फीतेवाले काले रंग के कैनवस के साधारण जूते, चमड़े की बेल्ट की जगह प्लास्टिक के बैल्ट ने ले ली। खाकी निकर की जगह 2016 में गहरे भूरे रंग की पैंट को गणवेश में शामिल किया गया।
केन्द्र में बीजेपी की सत्ता से लेकर देश भर में आज जो इसका राजनीतिक रसूख है उसके पीछे संघ का बहुत बड़ा हाथ है। लेकिन सच ये भी है कि भाजपा के साथ ही संघ भी मजबूत हुआ है। पिछले एक शतक के वक्त में आरएसएस से बहुत से उतार-चढ़ाव देखे, राजनीतिक दलों का शीर्ष से लेकर अवसान तक देखा और भाजपा को शून्य से लेकर शिखर तक पहुंचते देखा। इस दौरान संघ और भाजपा के बीच भी रिश्ते उतरते-चढ़ते रहे। इसी साल जब जश्न-ए-आज़ादी के मौके पर जब दिल्ली के लाल किले की प्राचीर से प्रधानमंत्री नरेन्द्र दामोदरदास मोदी ने आरएसएस की तारीफ की तो सियासी भूचाल आ गया। अब जब बात निकली है तो दूर तलक जाएगी ही…लिहाजा आजादी के पहले से लेकर अब तक की संघ की गतिविधियों की उधेड़बुन भी शुरू हो गई है। संघ पर लगने वाली तोहमतों की जद में विनायक दामोदर सावरकर से लेकर अटल बिहारी वाजपेयी तक आ गए हैं। संघ के शताब्दी वर्ष के मौके पर हाल ही में दिल्ली में 100 वर्ष की संघ यात्रा: नए क्षितिज शीर्षक से तीन दिवसीय व्याख्यान माला हुई। इसके अंतिम दिन मोहन भागवत ने पत्रकारों से हर मुद्दे पर चर्चा की। इससे साफ जाहिर हुआ कि संघ अपना नजरिया बदल रहा है। मोहन भागवत ने संघ की कार्यशैली को चार मूलभूत सिद्धांतों पर आधारित बताया। मैत्री-जो हमारे साथ हैं, उनसे मित्रता, करुणा-जो भटक गए हैं, उनके प्रति सहानुभूति, मुदिता-जो अच्छा कर रहे हैं, उनके लिए प्रसन्नता, उपेक्षा-जो संघ और समाज के विरुद्ध नकारात्मकता फैला रहे हैं, उनकी उपेक्षा।
इन 100 सालों में कभी आरएसएस अपनी गतिविधियों तो कभी भारत को हिंदू राष्ट्र बनाने की बात तो कभी भारतीय तिरंगे के रूख को लेकर तो कभी नाथूराम गोडसे से ताल्लुकात को लेकर चर्चित रहा। सन 1925 में कोई डेढ़ दर्जन अनुयायियों के साथ केशव बलिराम हेडगेवार ने नागपुर में संघ की स्थापना की थी। माना जाता है कि विनायक दामोदर सावरकर के विचारों से प्रेरित होकर इसकी नींव रखी गई थी तब से लेकर अब तक ये संगठन लगातार विस्तृत होते रहा। संघ से जुड़े लोगों का कहना है कि संघ स्वयंसेवकों के बीच भाईचारे की भावना को बढ़ावा देता है। दूसरी तरफ, संघ की आलोचना में कहा जाता है कि ये भारत के अल्पसंख्यकों, खासकर मुसलमानों और ईसाइयों के प्रति कट्टरता और अलगाववाद को बढ़ावा देता है। सन 1955 की एक सरकारी खुफिया रिपोर्ट में हेडगेवार के हवाले से कहा गया था कि भारत की भावी सरकार पर हिंदुओं का प्रभुत्व होगा और यह तय करना उनका काम है कि गैर-हिंदू तत्वों को कौन से राजनीतिक अधिकार और विशेषाधिकार दिए जाएं। संघ की मुखालफत करने वाले कहते हैं कि आरएसएस अल्पसंख्यकों को हाशिए पर धकेलना चाहता है। इतने सालों में आरएसएस की घुसपैठ शासन-प्रशासन सहित हर क्षेत्र में है। तमाम आलोचनाओं से इतर ये भी सच है कि सीएम से लेकर पीएम तक और बीजेपी अध्यक्ष से लेकर राष्ट्रपति-उपराष्ट्रपति तक की ताजपोशी में भी संघ की पसंद का ख्याल रखा जाता है।
साल 2014 में केंद्र में बीजेपी की अगुआई में सरकार बनने के बाद से संघ का राजनीतिक प्रभाव बढ़ गया है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की पहचान हिंदू राष्ट्रवादी संगठन के रूप में है जिसकी स्थापना साल 1925 में महाराष्ट्र के नागपुर में डॉक्टर केशव बलिराम हेडगेवार ने की थी। हेडगेवार हिंदू राष्ट्रवादी विचारक विनायक दामोदर सावरकर के विचारों से प्रभावित थे। थोड़े समय तक कांग्रेस से जुड़े रहने के बाद हेडगेवार ने वैचारिक मतभेदों की वजह से कांग्रेस छोड़ संघ की स्थापना की। भारतीय जनता पार्टी को संघ की राजनीतिक इकाई के रूप में देखा जाता है। संघ भले ही खुद को गैर राजनीतिक संगठन होने का दावा करता हो लेकिन संघ के अनेक लोग चुनावी राजनीति में सक्रिय रहे हैं। इनमें पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से लेकर मौजूदा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तक शामिल हैं। हालांकि सरसंघचालक मोहन भागवत कई मौकों पर कह चुके हैं कि संघ एक कार्य प्रणाली है और कुछ नहीं उनके मुताबिक आरएसएस व्यक्ति निर्माण का काम करता है।
आरएसएस के पूर्व सदस्य देवनुरा महादेवा ने अपनी पुस्तक आरएसएस-द लॉन्ग एंड शॉर्ट ऑफ इट में कई खुलासे किए हैं। महादेवा ने संघ का सांप्रदायिक हिंसा के साथ जुड़ाव, आरएसएस के एक पूर्व सदस्य द्वारा महात्मा गांधी की हत्या और 1990 के दशक में अयोध्या में 16वीं सदी की मस्जिद को गिराया जाने का भी जिक्र किया है। यहां बता दें कि महादेवा पहले संघ से जुड़े हुए थे लेकिन बाद में उन्होंने खुद को इससे अलग कर लिया था। महादेवा ने लिखा है कि धर्मांतरण पर कानूनों को कड़ा करना, गोहत्या पर नियंत्रण, अयोध्या में मंदिर निर्माण जैसी नीतियाँ आरएसएस के नजरिए के अनुरूप ही हैं। उन्होंने लव जिहाद के नाम पर तनाव पैदा करने और वक्फ पर सरकारी नियंत्रण की भी आलोचना की है।
सन 1940 से 1973 तक आरएसएस का नेतृत्व करने वाले माधवराव सदाशिवराव गोलवलकर नहीं चाहते थे कि आरएसएस के लोग राजनेता बनें क्योंकि वे गंदे हो जाएँगे, नियम और मूल्य भूल जाएँगे। बावजूद इसके आरएसएस के प्रभावशाली लोगों का भाजपा के जरिए सत्ता में जाना लगा रहता है। फिर भी, आरएसएस समर्थक संघ के सामाजिक कार्यों और देश निर्माण में इसके योगदान को सराहते हैं तो इसके आलोचक इसकी विचारधारा को देश के सामाजिक सदभाव और धर्मनिरपेक्षता के विपरीत बताते हैं। पिछले सौ सालों में संघ की स्थापना के मकसद से लेकर, आजादी की लड़ाई में शामिल ना होने, महात्मा गांधी की हत्या, तिरंगे को ना अपनाने, राष्ट्रीय ध्वज के रूप में भगवा ध्वज अपनाने की हिमायत करने, भारतीय संविधान की बजाए मनुस्मृति आधारित संविधान लागू करने, हिन्दु कोड बिल का विरोध करने, हिन्दु राष्ट्र की स्थापना की वकालत करने, सामाजिक सदभाव बिगाड़ने और भाजपानीत सरकारों के कामकाज में दखल देने सहित कई आक्षेप लगे। इन तोहमतों से संघ कमजोर होने की बजाए और ज्यादा मजबूत ही हुआ और इसका सबूत है संघ की पहली शाखा में महज 5 लोग थे और आज ये विश्व का सबसे बड़ा गैर सरकारी संगठन है जिसमें कोई एक करोड़ स्वयं सेवक हैं।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जश्न-ए-आजादी के मौके पर लाल किले से आरएसएस की तारीफ के बाद कई तरह की चर्चाएं शुरू हो गई थीं। उन्होंने आरएसएस को दुनिया का सबसे बड़ा एनजीओ बताया। ये भी कहा कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने देश के लिए बहुत काम किया है। भारतीय जनता पार्टी और संघ के बीच कई मुद्दों को लेकर एक राय नहीं रही है ऐसे में पीएम मोदी के स्वाधीनता दिवस पर अपने भाषण में संघ का जिक्र करने की अपनी अहमियत है। राजनीतिक हलकों में कहा जा रहा था कि साल 2024 के लोकसभा चुनावों में बीजेपी के बहुमत हासिल ना कर पाने के पीछे एक वजह संघ की कथित बेरुखी थी। यानि, संघ ने बीजेपी के लिए उस तरह से जमीनी स्तर पर काम नहीं किया जिसकी उम्मीद बीजेपी कर रही थी। पिछले लोकसभा चुनाव के बीच बीजेपी नेता जेपी नड्डा का वो बयान भी आया था जिसमें उन्होंने बीजेपी के सक्षम होने और उसे आरएसएस की जरूरत ना होने की बात कही थी। इस बयान से ये भी माना गया कि संघ के पास मोदी को समर्थन देने के अलावा कोई विकल्प है भी नहीं। हालांकि नड्डा के बयान पर प्रतिक्रिया देते हुए संघ ने इस मामले को एक पारिवारिक मामला बताया था। लेकिन पिछले लोकसभा चुनाव में संघ के स्वयंसेवकों ने जमीनी स्तर पर उतनी सक्रियता नहीं दिखाई जो कभी हुआ करती थी। संघ की इस बेरुखी को मोदी को सबक सिखाने के रूप में देखा गया। ज्यादा वक्त नहीं गुजरा है जब आरएसएस चीफ मोहन भागवत ने भाजपा नेतृत्व के खिलाफ कई बार टिप्पणियां की थी या नसीहत दी थी, हालांकि उन्होंने किसी का नाम नहीं लिया था। मोहन भागवत ने आदर्श सेवक का जिक्र कर इशारा जरूर कर दिया था। राजनीतिक गलियारों में ये भी कहा जा रहा था कि संघ, मोदी की एकला चलो नीति से नाराज था। तर्क दिया जा रहा था कि भाजपा के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ जब पार्टी अध्यक्ष के चुनाव में इतना विलंब हुआ। संघ चाहता है कि आम सहमति से पार्टी चले जबकि भाजपा आजादी चाहती है। तल्खी बढ़ने और बीजेपी की सीटे घटने का असर दिखने लगा और भाजपा-संघ के बीच रिश्ते सुधारने की कोशिशें शुरू हो गईं। संघ की मान-मनौव्वल का नतीजा हरियाणा, महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश और दिल्ली के चुनावों में दिखाई दिया। हाल ही में उपराष्ट्रपति के चुनाव में संघ की पसंद को तवज्जो दी गई। माना ये भी जा रहा है कि बिहार में विधानसभा चुनाव होने हैं, अगले साल ही पश्चिम बंगाल, असम, तमिलनाडु, केरल और पुदुचेरी में भी चुनाव होने हैं, सो संघ की इस तारीफ को इन चुनावों के नजरिए से भी देखा जा रहा है। हालांकि, मोदी के लिए ये जरूरी नहीं है कि हर मामले में संघ की पसंद या विचारों को तरजीह दें।
एक पुरानी कहावत है कि घुटना हमेशा पेट की तरफ ही मुड़ता है….कहने का आशय ये है कि संघ और भाजपा नेताओं के बीच चाहे जिस तरह मतभेद हो या किसी बात को लेकर विरोधाभास हो लेकिन आखिरकार दोनों को एक-दूसरे की जरूरत है। आज संघ पहले से कहीं ज्यादा मजबूत हुआ है। भले ही राजनीतिक विथिकाओं में ये सवाल भी कौंधता रहा है कि आखिर असली बॉस कौन है पीएम मोदी या संघ सुप्रीमो मोहन भागवत ? प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और आरएसएस के सरसंघचालक मोहन भागवत सार्वजनिक तौर पर एक साथ या एक ही मंच पर कम ही नज़र आए हैं। साल 2020 में अयोध्या में राम मंदिर के भूमि पूजन पर दोनों साथ दिखे थे। इसके बाद राम मंदिर के प्राण प्रतिष्ठा समारोह के दौरान फिर एक बार मोदी और भागवत एक साथ नजर आए। राम मंदिर के गर्भगृह में भागवत, मोदी के साथ पहले पूजा अर्चना करते दिखे थे। इसके बाद भागवत ने भाषण भी दिया। भागवत ने कहा था कि जोश में होश रहना जरूरी है, यानि उन्होंने इशारा कर दिया था कि सभी को अनुशासन में रहना होगा। इधर, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी संघ के सक्रिय प्रचारक भी रहे हैं। संघ और मोदी के बीच रिश्तों को लेकर भी तरह-तरह की खबरें तैरतीं रहीं हैं। वो भी तब से जब मोदी गुजरात के सीएम थे, सीएम से लेकर पीएम तक की इस यात्रा में संघ से उनके ताल्लुकात को लेकर हमेशा सकारात्मक खबरें ही आतीं रहीं हो ऐसा भी नहीं है। जब मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री थे तो संघ के बड़े पदाधिकारियों को ये उम्मीद थी कि मोदी संघ के प्रचारक भी हैं इसलिए उन्हें संघ कार्यालय में आकर रिपोर्ट करना चाहिए लेकिन मोदी संघ कार्यालय नहीं गए। मोदी का मानना है कि निवार्चित जनप्रतिनिधि को संघ कार्यालय में नहीं जाना चाहिए। संघ जानता है कि मोदी की छबि हिन्दू नेता के रूप में है और फिलहाल उनकी लोकप्रियता के मुकाबले कोई नहीं है। इसी तरह बीजेपी और मोदी भी जानते हैं कि संघ के जमीनी स्तर पर काम करने वाले स्वयं सेवक के बिना राजनीतिक रसूख बरकरार नहीं रखा जा सकता। लिहाजा दोनों को एक दूसरे की जरूरत है। संघ ही बीजेपी मातृ संगठन है और भागवत इसका अहसास भी समय-समय पर कराते रहे हैं। अटल बिहारी वाजपेयी जब प्रधानमंत्री थे तब उनके और तत्कालीन सरसंघचालक केएस सुदर्शन के बीच भी संबंध ज्यादा अच्छे नहीं थे। जब बीजेपी ने सन 2014 का चुनाव जीत कर सरकार बनाई और नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बने तो तब भी यही माना जाता रहा कि सरकार का रिमोट आरएसएस के हाथ में रहेगा। तब मोदी सरकार के कई मंत्री भी आरएसएस के दिल्ली स्थित कार्यालय पहुंचकर अपने मंत्रालयों के कार्यों की जानकारी देते थे। लेकिन वक्त के साथ ये सिलसिला भी कम होता गया। मोदी का प्रभाव ऐसा बना कि संघ चीफ कभी भी उन्हें निर्देश देने की स्थिति में नहीं रहे। हालांकि, मोदी ने भी संघ के सिद्धांतों का उल्लंघन नहीं किया। वैसे भी मोदी राज में संघ ज्यादा उत्साहित है। वाजपेयी के वक्त सत्ता और संगठन बनिज़ब्त इतना मजबूत नहीं था जितना मोदी के वक्त है। मोदी आरएसएस के एजेंडे पर चल रहे हैं तो वहीं आरएसएस भी मोदी को फ्री हैंड दे रहा है।
इसी साल 28 अगस्त को दिल्ली में तीन दिवसीय व्याख्या श्रृंखला में संघ प्रमुख मोहन भागवत था कि संघ और भारतीय जनता पार्टी के बीच किसी तरह का विवाद नहीं है। उन्होंने कहा कि संघ किसी भी मुद्दे पर सलाह दे सकता है, लेकिन अंतिम फैसला बीजेपी का ही होगा। भागवत ने यह भी कहा था कि नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार से संघ का अच्छा तालमेल है। बीजेपी और संघ के बीच विवाद के मसले पर भागवत ने कहा कि कभी-कभी संघर्ष हो सकता है, लेकिन यह झगड़ा नहीं है। मोहन भागवत ने स्पष्ट किया कि यह कहना कि संघ हर चीज तय करता है, बिल्कुल गलत है। मैं कई सालों से संघ चला रहा हूं और वे सरकार चला रहे हैं इसलिए हम केवल सलाह दे सकते हैं, फैसला नहीं ले सकते। काशी-मथुरा को लेकर चल रहे आंदोलन पर उन्होंने कहा था कि राम मंदिर एकमात्र ऐसा आंदोलन रहा जिसका आरएसएस ने समर्थन किया है वह किसी अन्य आंदोलन में शामिल नहीं होगा। उन्होंने कहा काशी-मथुरा आंदोलन का संघ समर्थन नहीं करेगा लेकिन स्वयंसेवक इसमें शामिल हो सकते हैं।
संघ से जुड़े ऐसे कई लोग हैं जो सत्ता के शिखर के तक पहुंचे। इनमें रामनाथ कोविंद, अटल बिहारी वाजपेयी, एकनाथ रानडे, नरेंद्र मोदी, मनोहर पर्रिकर, नितिन गडकरी, राजनाथ सिंह, मुरली मनोहर जोशी, वेंकैया नायडू, विजय रूपाणी, देवेंद्र फडणवीस, राम माधव, अमित शाह शामिल हैं। भारत के प्रधानमंत्री बनने वाले पहले स्वयंसेवक अटलबिहारी वाजपेयी, पीएम बनने वाले दूसरे स्वयंसेवक नरेंद्र मोदी हैं। राष्ट्रपति बनने वाले पहले स्वयंसेवक रामनाथ कोविंद हैं। उपराष्ट्रपति बनने वाले पहले स्वयंसेवक वेंकैया नायडू थे।
बहरहाल, संघ प्रमुख मोहन भागवत 75 बरस के हो गए हैं और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी भी 75 साल के होने वाले हैं। भागवत और मोदी के बीच 75 साल की उम्र में रिटायरमेंट को लेकर चल रहा गतिरोध भी शांत हो गया है। वैसे भी मोदी की सामने 75 साल की उम्र के बाद पीएम पद छोड़ने को लेकर कोई चुनौती नहीं थी, लिहाजा माना जा रहा है कि लाल किले की प्राचीर से मोदी की, संघ की सराहना के बाद भागवत ने भी अपने बयान पर ही नरमी दिखा दी। लाल किले की प्राचीर से पीएम मोदी के संघ की तारीफ की एक वजह भागवत को वो बयान बताया जा रहा था जिसमें उन्होंने कहा था कि नेताओं को 75 साल की उम्र का हो जाने पर अपने पदों को छोड़ देना चाहिए। 15 अगस्त को मोदी ने संघ की तारीफ की और 28 अगस्त को नई दिल्ली में तीन दिवसीय व्याख्यानमाला के अंतिम दिन संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत ने कहा कि वे 75 साल की उम्र में रिटायर नहीं होंगे और न ही किसी और को रिटायर होने के लिए कहेंगे। मोदी-भागवत के बयानों के बाद यही कहा जा सकता है कि तेरी भी जय-जय….मेरी भी जय-जय।

Exit mobile version