(11 अक्तूबर लोकनायक जयप्रकाश नारायण की जयंती पर विशेष)

निमिषासिंह
5 जून 1974 पटना का गांधी मैदान। मंच पर विराजमान जयप्रकाश नारायण के साथ फणीश्वरनाथ रेणु और नागार्जुन। बिहार के तत्कालीन गफूर सरकार के इस्तीफे के प्रस्ताव के समर्थन में इकट्ठे किए गये तीन ट्रक हस्ताक्षर के पुलिंदे राजभवन पहुँचाकर लौट रहे आंदोलनकारियों पर बेली रोड में इंदिरा ब्रिगेड के अड्डे से गोलीबारी शुरू कर दी गई। लोकनायक जयप्रकाश नारायण ने पटना के गांधी मैदान में पांच लाख की उत्साही भीड़ के सामने सम्पूर्ण क्रांति का ऐलान किया और कहा कि सच कहना यदि बगावत है तो कह दो हम भी बागी है।
इंदिरा गांधी की सत्ता को उखाड़ फेकने का आहवान किया गया। लाखों लाख लोग जेपी के सम्पूर्ण क्रांति से जुड़ गए। 11अक्टूबर 1902 में सिताब दियारा के एक कायस्थ परिवार में जन्मे जयप्रकाश नारायण सन 1979 तक विविध रूप मे सक्रिय दिखे। स्वतंत्रता सेनानी के रूप में समाजसेवी के रूप और अन्ततः राजनेता के रूप में। इन तीनों रूपों में उन्होंने भारतीय जनमानस को गहराई से प्रभावित किया। वह उन लोगों में से थे जिन्होंने सत्ता और पद से परे रहकर समाज को अपनी सेवा के लिए चुना और राजनीति को जनता की सेवा का माध्यम बनाया।
भाईचारा स्वतंत्रता आजादी यह विचार जे पी को महात्मा गांधी से विरासत के तौर पर मिले थे। उन्होंने कॉन्ग्रेस के अंदर सोशलिस्ट पार्टी योजना बनाई थी और कॉन्ग्रेस को सोशलिस्ट पार्टी का स्वरूप देने के लिए आंदोलन भी शुरू किया था। इतना ही नहीं जेल से भाग कर नेपाल में रहने के दौरान उन्होंने सशस्त्र क्रांति भी शुरू की थी। इसके अलावा वह किसान आंदोलन छात्र आंदोलन और सर्वोदय आंदोलन सहित कई छोटे-बड़े आंदोलनों में शामिल रहे और उन्हें अपना समर्थन देते रहे। जयप्रकाश इकलौते ऐसे नेता हुए जिन्होंने देश के तीन बड़े आंदोलन में मुख्य भूमिका निभाई थी या यूं कहे कि नेतृत्व किया था।
स्वतंत्रता संग्राम के दौरान गांधी जी के साथ हर मोर्चे पर साथ खड़े दिखाई दिए। आजाद भारत के भूदान आंदोलन में जे पी विनोबा भावे के साथ कदम से कदम मिलाकर चलते दिखे। तीसरा वह आंदोलन जिसकी अगुवाई स्वयं जेपी ने की। संपूर्ण क्रांति जब इस देश के घर-घर में क्रांति का पर्याय बने थे जे पी। वह जे पी ही थे जिन्होंने उस दौर के युवाओं को सही दिशा दिखाया। यह वह दौर था जब देश के युवाओं में सरकार के प्रति असंतोष का भाव घर कर चुका था। देश इंदिरा के नेतृत्व में महंगाई भ्रष्टाचार और विकास की सुस्त गति से त्रस्त था। शैक्षणिक अराजकता का माहौल था। ऐसे में गुजरात में हुई एक राजनीतिक उथल-पुथल ने बिहार के छात्रों को काफी प्रेरित किया।
गुजरात में छात्रों के नेतृत्व में नवनिर्माण समिति द्वारा आंदोलन तीव्र हो चुका था। गुजरात विधानसभा को भंग करना पड़ा। चुनाव में चिमन भाई पटेल की सरकार की हार हुई। इस घटनाक्रम से बिहार के छात्रों का हौसला बढ़ा। बिहार प्रदेश में तत्कालीन गफूर सरकार को उखाड़ फेंकने के लिए बिहार के छात्र प्रतिबद्ध हुए।लाठी चार्ज के द्वारा छात्रों की आवाज को दबाने की कोशिश की गई। 21 जनवरी 1974 को पटना के ह्विलर सीनेट में यूथ फॉर डेमोक्रेसी के तत्वाधान में एक सभा हुई जिसमें जे पी ने संबोधित किया। 17 और 18 फरवरी को पटना में बिहार राज्य छात्र नेता सम्मेलन हुआ जिसमें साम्यवादी छात्रों को छोड़ सभी संगठनों के छात्रों ने हिस्सा लिया और बिहार छात्र संघर्ष समिति का गठन हुआ।
मुलायम सिंह यादव, लालमुनि चौबे, लालू प्रसाद यादव, नीतीश कुमार, दिवंगत रामविलास पासवान, रविशंकर या फिर सुशील मोदी, आज के सारे नेता जेपी के उसी छात्र युवा संघर्ष वाहिनी का हिस्सा थे। इनमें से कुछ ने आगे चलकर कुछ नए दल बनाए तो कुछ दूसरे स्थापित पार्टियों में शामिल हो गए। सक्रिय छात्रों के नेतृत्व में प्रदेश के हर हर नुक्कड़ चौराहे पर धरना प्रदर्शन और नुक्कड़ नाटक होने लगे। सरकार की दमनकारी नीतियां आरंभ हो गई। 16 मार्च को बेतिया और बाढ़ में गोली चली। 18 मार्च को 12 सूची मांगों को लेकर छात्रों का प्रदर्शन हुआ। सरकार ने अपनी बर्बरता दिखाई। पुलिस कारवाही में 110 छात्र मारे गए। 23 मार्च को राम बहादुर राय एवं गोविंदाचार्य जैसे बड़े नेता की मुलाकात जेपी से हुई और उन्होंने उनसे छात्र आंदोलन का नेतृत्व करने का आग्रह किया।
जयप्रकाश ने छात्रों को सही दिशा दिखाते हुए शांतिपूर्वक और अहिंसात्मक तरीके से आंदोलन करने की अपील की। उस वक्त जयप्रकाश नारायण ने युवाओं का नेतृत्व किया और उनके आंदोलन को चरम सीमा तक पहुंचाया। अगर जेपी नहीं होते तो उस आंदोलन का दमन कर दिया जाता। बड़ी संख्या में और युवा मारे जाते। भविष्य में किसी की भी हिम्मत नहीं होती कि वह सत्ता के खिलाफ अपना सर उठा सके। 8 अप्रैल 1974 को पटना से विशाल मुक प्रदर्शन हुआ जिसमें हजारों की संख्या में मुंह पर काली पट्टी बांधे और पीठ पीछे हाथ बांधे युवा छात्र सड़कों पर निकल पड़े। जीपी ने नारा दिया–हमला चाहे जैसा होगा हाथ हमारा नहीं उठेगा। अखिल विश्व भारतीय परिषद छात्र संगठनों को समाजवादी युवजन सभा का साथ मिला।
9 अप्रैल 1974 को गांधी मैदान में हुई सभा में जे पी को लोक लायक की उपाधि दी गई। बिहार के सभी विधायकों से त्यागपत्र देने की अपील हुई। 5 जून 1974 को जयप्रकाश नारायण ने बिहार विधानसभा भंग करने का आह्वाहन दिया और गांधी मैदान से ही सम्पूर्ण क्रांति की घोषणा कर डाली। जे पी की हुंकार पर नौजवानों का जत्था सड़कों पर निकल पड़ता था। देखते ही देखते बिहार से उठी संपूर्ण क्रांति की चिंगारी देश के कोने-कोने में आग बनकर भड़क उठी थी। पूरे साल भर के लिए छात्रों द्वारा कक्षा बहिष्कार तथा परीक्षा बहिष्कार कर दिया गया। विधायकों को विधान परिषद में आने से रोका जाने लगा। अगले 21 दिनों तक बिहार पुलिस प्रशासन की बर्बरता जारी रही एक समय ऐसा भी आया जब छात्रों ने विधान परिषद को चारों तरफ से घेर लिया। पुलिस की तरफ से अंधाधुंध गोलियां चलाई गई और 50 से ज्यादा युवा मारे गए।
अक्टूबर महीने तक पूरे बिहार में धरना प्रदर्शन चलता रहा। छात्र मारे जाते रहे। 4,5 और 6 अक्टूबर 1974 को बिहार बंद का आवाह्न किया गया जो काफी हद तक सफल रहा। 1 नवंबर को जयप्रकाश नारायण और तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के बीच हुई वार्ता विफल रही। 4 नवंबर को जयप्रकाश नारायण की नेतृत्व में निकली जुलुश पर हुई लाठी चार्ज के दौरान जे पी चोट खाकर जमीन पर गिर पड़े। नानाजी देशमुख ने उन्हें बचाने की कोशिश कीजिए और इसी क्रम में उनका हाथ टूट गया। दर्जनों नेता और बड़ी संख्या में आंदोलनकारी घायल हुए। यह वाकया इंदिरा सरकार के लिए ताबूत में आखिरी कील साबित हुई। 18 नवंबर को गांधी मैदान में विशाल जनसभा में जयप्रकाश नारायण ने इंदिरा गांधी द्वारा दी गई चुनाव मैदान में उतरने की चुनौती को स्वीकार किया। अपने बिगड़ते स्वास्थ्य के बावजूद जेपी ने आपातकालीन शासन से लड़ने असमान राजनीतिक संस्थाओं का एक गठबंधन बनाकर इंदिरा गांधी की हार सुनिश्चित करने और लोकतंत्र की बहाली सुनिश्चित करने के लिए अड़े रहे डटे रहे।
जयप्रकाश नारायण गैर राजनीतिक भूमिका में रहकर भी इस देश की राजनीति का ऐसा केंद्र बने कि देश में पहली बार गैर कांग्रेसी सरकार अगर बनी तो वह जे पी के प्रयासों से बनी। वह बूढ़ा व्यक्ति जिसके पास कोई राजनीतिक पद नहीं था पर उसने अपने नैतिक बल और गांधी दर्शन के बल पर सत्ता से कांग्रेस सरकार को उखाड़ फेंका। तत्कालीन इंदिरा सरकार को अपने घुटने तक टेकने पड़े। कहा जा सकता है कि तब से लेकर अब तक भारत के लोकतंत्र ने ऐसा कोई दूसरा निर्णायक मोड़ नहीं देखा।आजाद भारत के सबसे बड़े जन आंदोलन की नींव रखने वाले जेपी ने आपातकाल के दौरान दिल्ली में नारा दिया था–सिंहासन खाली करो कि जनता आती है। दिनकर और उन जैसे तमाम कवियों की कविताओं को जिन्होंने उस दौर में राष्ट्रीय चेतना जगाने का काम किया था उनका कार्य रूप में परिणत करने का काम जे पी के आंदोलन ने किया।
लोकनायक जयप्रकाश नारायण एक सच्चे कर्मयोगी थे जिनका संपूर्ण जीवन भारतीय समाज की समस्याओं के समाधानों के लिए प्रकट हुआ। उन्होंने भारतीय समाज के लिए बहुत कुछ किया लेकिन सार्वजनिक जीवन में जिन मूल्यों की स्थापना वे करना चाहते थे वे मूल्य बहुत हद तक देश की राजनीतिक पार्टियों को स्वीकार्य नहीं थे। क्योंकि ये मूल्य राजनीति के तत्कालीन ढाँचे को चुनौती देने के साथ-साथ स्वार्थ एवं पदलोलुपता की स्थितियों को समाप्त करने के पक्षधर थे। राष्ट्रीयता की भावना एवं नैतिकता की स्थापना उनका लक्ष्य था। लोकनायक के शब्द को असलियत में चरितार्थ करने वाले जयप्रकाश नारायण अत्यंत समर्पित जननायक और मानवतावादी चिंतक तो थे ही इसके साथ-साथ उनकी छवि अत्यंत शालीन और मर्यादित सार्वजनिक जीवन जीने वाले व्यक्ति की भी थी। जेपी वह गांधी हैं जिनकी भारत को 20वीं सदी के उत्तरार्ध में भी जरूरत थी,और आज भी है। आज फिर देश में 1970 जैसे हालात बनते दिख रहे है।
देश के युवाओं में बेरोजगारी और भ्रष्टाचार से असंतोष पनप रहा है। कोई शक नही कि युवकों की लाचारी या उनके गुस्से का दबा रहना देश के लिए बहुत ही खतरनाक साबित हो सकता है। यह एक ऐसी वास्तविकता है जिसे हम अग्निपथ जैसी योजनाओं के विरुद्ध हुई आगजनी के रूप में देख चुके हैं। यकीनन आज फिर देश को लोकनायक जयप्रकाश रूपी महात्मा की आवश्कता है।